स्वस्थ भारत मीडिया
नीचे की कहानी / BOTTOM STORY

The Thermometer-घर में ऐसे करें बुजुर्गों का केयर: डॉ. गोयल

The Thermometer—घर में ऐसे करें बुजुगौं का केयर: डॉ. गोयल

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। बुजुर्गों की सेहत का लेकर The Thermometer कार्यक्रम में स्वस्थ भारत मीडिया के समूह संपादक आशुतोष कुमार सिंह ने डॉ. रमेश गोयल से लंबी बात की थी। आपने उसकी पहली कड़ी में वृद्धाश्रम और डॉ. गोयल के केयर सेंटर ‘वट वृक्ष के बारे में जाना। इस दूसरी कड़ी में बुढ़ापे की बीमारी डिमेंशिया और घर में बुजुर्गों की देखभाल की गाइडलाइन के बारे में जानेंगें। प्रस्तुत है बातचीत की दूसरी कड़ी…

आशुतोष: आपने डिमेंशिया कहा। ये क्या है? कब इसमें क्लीनिकल हस्तक्षेप की जरूरत पड़ती है?
डॉ. गोयल: डिमेंशिया एक सिंड्रोम है जो विभिन्न बीमारियों की वजह से होता है। यह अपने आप में अकेली बीमारी नहीं है। खासकर अल्जिमर्स जो बीमारी है जिसमें ब्रेन असंतुलित हो जाता है, उसकी वजह से 65 फीसद लोग डिमेंशिया में कन्वर्ट हो जाते हैं। ब्रेन में इनफेक्शन हुआ या ब्रेन सर्जरी हुई या ब्रेन में प्रोटीन जमा होने लग जाता है तो लिविस टाइप ऑफ डिमेंशिया बोलते हैं। ये सब डिमेंशिया के कारण हैं। इनमें आदमी की क्षमताएं घटती है, एंटीसोशल व्यवहार विकसित हो जाते हैं। उसकी मेमोरी लॉस होने लग जाती है। मेमोरी में सबसे पहले अर्ली मेमोरी लॉस होती है। फिर धीरे-धीरे पुरानी मेमोरी लॉस होने लग जाती है। उसकी कॉग्निटिव फंक्शनंस की क्षमताएं बदल जाती है। उसको नहीं पता कि हमें अलर्ट कब होना चाहिए। मरीज भूलने लग जाता है। आमतौर पर हम सभी कुछ चीजें किसी भी उम्र में भूलते हैं। जैसे चाबियां कहां रख दी यार। पता नहीं ये पेपर रखे थे पर कहां रख दिए, वो नॉर्मल होता है। यह डिमेंशिया नहीं है। डिमेंशिया तब हम कहेंगे जब जरूरी जैसे खाना खाना ही भूल गया, उसको समय—जगह याद न रहे, दिन है या रात, सुबह है शाम है आदि। उसे बाथरूम जाना है तो उसको यह नहीं समझ आता कि बाथरूम कहां है, दरवाजा किधर है, कहां करूं। वो कपड़ों में ही बाथरूम कर देता है। उसे यह नहीं समझ में आता कि टॉयलेट में जाकर बाथरूम करना है। तीसरा, कपड़े जहां मर्जी आए, उतार देगा। उसको इसका कारण नहीं समझ में आता। पजामा पहनना है पर पैर में पहनने की बजाय वो सिर में पहनने लग जाए। तो ये जो चीजें हैं जो असामान्य व्यवहार है। यही डिमेंशिया का संकेत देता है। अगर ऐसा थोड़ा सा भी हो तो कॉग्निटिव फंक्शन असेसमेंट टेस्ट हमें कराना चाहिए। हम डॉक्टर्स के पास जाते हैं। डॉक्टर एमआरआई में भी बदलाव नहीं पकड़ पाते क्योंकि इसमें जरूरी नहीं कि वह एमआरआई में नजर आए। लेकिन कॉग्निटिव फंक्शन असेसमेंट कहती है कि 6 से 8—9 साल पहले तक हम केस को पकड़ सकते हैं। अर्ली डिमेंशिया को पकड़ने का फायदा यह है कि उसके हिसाब से हम हस्तक्षेप कर सकते हैं। अगर बोली खराब है तो स्पीच थेरेपी दे सकते हैं। गटकने, खाना खाना भूल जाते हैं। कैसे खाएंगे? तो स्वेलोइंग थेरेपी होती है। कॉग्निटिव फंक्शन भूल जाएंगे कि कोई चीज को कैसे लिखना है, कैसे पढ़ना है या क्या था या कोई ब्लॉग्स बनाने हैं। वो सब भूल जाते हैं। तो वो हम कॉग्निटिव फंक्शनंस टेस्ट उनको कराते हैं। तो ये अर्ली इंटरवेंशन से उनकी लाइफ को बेहतर कर सकते हैं। तब डिमेंशिया बढ़ना धीमा हो जाता है। डिमेंशिया का कोई उपचार नहीं है लेकिन हम उसकी प्रोग्रेस स्लो कर सकते हैं। मतलब उनका जीवन बेहतर हो जाता है।

#Thethermometer

आशुताष: ऐसे बहुत से लोग हैं जो अभी भी अपने घर में ही पेरेंट्स का ख्याल रखते हैं। तो उन्हें किन बातों का ख्याल रखना चाहिए? अगर हमारी फैमिली में 60 के बाद का कोई है तो हमें किन बातों का ख्याल रखना चाहिए? किस तरह का घर का ओरा रहे, डेकोरेशन रहे, बाकी चीज रहे?
डॉ. गोयल: देखिए, इसके 11 पावरफुल टिप्स हैं। मैं इस पर काफी चर्चा करता हूं। उसमें मैंने विभिन्न आयाम लिए हैं जो एल्डरली के साथ इश्यूज आते हैं और उनको घर पर कैसे केयर दे सकते हैं। अगर हम उनको जानेंगे तो हमारी चिंताएं भी कम होगी और हमारे पेरेंट्स की लाइफ बेहतर होगी। इसमें सबसे पहले मैंने डिमेंशिया को ही पकड़ा है। तो डिमेंशिया की केयर घर पर करनी है तो उसको हमें आइडेंटिफाई करना है। डिमेंशिया में एक वंडरिंग हो जाता है। मतलब वैसे लोग घर से बिन बताए भाग जाते हैं। उनको पता नहीं कि हम कहां जा रहे हैं। तो हमें अपने घर को सुरक्षित रखना है। दूसरी अर्ली डायग्नोसिस के लिए क्लीनिकल असेसमेंट करानी है। तीसरा, उनके लिए सुरक्षित वातावरण बनाना है यानी उनका कमरा फालतू चीजों से भरा न हो। उनकी पुरानी किताबें, फोटो आदि पर उनसे हम बार-बार बात करें, उनकी पुरानी एक्टिविटी दिखाएं। अपने जमाने के पुरानी फिल्मों के गीत ज्यादा पसंद होते हैं तो वो सुनाएं। अगर समस्या बढ़ती है तो न्यूरोलॉजिस्ट को दिखाने के बाद टेस्ट करा सकते हैं, एक्टिविटी करा सकते हैं। इनमें फिजिकल डिसेबिलिटी बहुत कॉमन होती है यानी गिर जाना। एक उम्र के बाद मसल्स कमजोर हो जाती है। बैलेंसिंग एक्टिविटीज कम हो जाती है। नजर कमजोर हो जाती है। सुनने में समस्या होती है। गिरने से उनकी हड्डी खासकर हिप बोन टूट जाती है। हेड इंजरी हो सकती है जिससे हेमीपरसिस हो जाता है। तो हमें घर पर बहुत एहतियात बरतनी चाहिए। इसमें बेड का हाइट 18 इंच से ऊपर नहीं रखें। कोशिश करें कि उसके पैर हवा में लटकते नहीं रहे। खड़ा हों तो पैर जमीन पर आ जाए। कमरे की फ्लोरिंग फिसलन वाली नहीं हो। रोशनी पर्याप्त चाहिए। रात को भी लाइट जलानी चाहिए। बाथरूम भी फिसलन वाला न हो और रोशनी पर्याप्त रहे। बाथरूम के दरवाजे अंदर ही खुलने वाले न हों। अंदर वाले में जब बुजुर्ग गिर जाते हैं तो उनको निकालना बड़ा मुश्किल होता है। अंदर लॉक भी नहीं होना चाहिए। कई मामले आते हैं कि जब तक दरवाजा तोड़ा, तब तक आदमी की मृत्यु हो चुकी होती है। कमरे में फर्नीचर कम से कम हों। उसके किनारे नुकीले न हों। उनको यह हिदायत देनी चाहिए कि वो जब उठते हैं तब इस अवस्था में पोस्टल हाइपोटेंशन काफी होता है। अचानक उठकर एकदम बाथरूम में नहीं जाएं। प्रोस्टेट बढ़ने से भी समस्या हो सकती है। उनको समझाना चाहिए कि अगर यूरिन कपड़ों में हो भी गया तो चलेगा लेकिन गिरना नहीं क्योंकि गिरना ज्यादा नुकसान देगा। जो बेड रिडन पेशेंट्स होते हैं, जिनको हेमीपरासिस हो गया, ब्रेन इंजरी हो गई, उनकी घर पर देखभाल रेगुलर करनी चाहिए। हॉस्पिटल के फाउलर बेड होते हैं जो ऊपर और नीचे किए जा सकते हैं। उसमें इलेक्ट्रॉनिक के साथ मैनुअल भी आते हैं। मैनुअल सस्ते तो इलेक्ट्रॉनिक महंगे होते हैं। अपनी क्षमता के अनुसार ले सकते हैं। इस पर एयर मैट्रसेस लगाए हैं क्योंकि बेड पर रहने से बुजुर्गों में बेड सोर हो जाता है। यह तकलीफ वाली बीमारी होती है। उससे बचाने के लिए एयर बेड आते हैं। इसका उपयोग करना चाहिए। उनकी पोजीशन को बदलते रहना चाहिए। दो-तीन घंटे पर। एक पोजीशन में होने से हड्डी स्किन पर दबाव डालती है तो वहां रक्तप्रवाह कम हो जाता है। बेड हिडन पेशेंट की डाइट कम हो जाती है तो एनीमिया हो जाता है। पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। इनफेक्शन होने के ज्यादा चांस रहते हैं। वह गीले नहीं रहे क्योंकि गीलापन इनफेक्शन लाता है। इमरजेंसी मैनेजमेंट बुजुर्गों में बहुत महत्वपूर्ण है। इमरजेंसी के लिए घर में एक चार्ट रखें जिस पर दर्ज हो कि हमें क्या-क्या करना है। सबसे पहले जिससे कांटेक्ट करना है, उसका नंबर रहे। डॉक्टर, एंबुलेंस और नजदीकी हॉस्पिटल का नंबर हो। कोशिश करें कि बुजुर्ग को ग्राउंड फ्लोर का कमरा दें ताकि इमरजेंसी हो तो आसानी से बचाव कर सकें। सांस लेना या हार्ट रुक गया है तो सीपीआर की जानकारी घर के लोगों को हो। इससे उनकी जान तत्काल बचती भी है। अगला पॉइंट है इमोशनल सपोर्ट का। बुजुर्गों में सबसे इंपॉर्टेंट होता है कि उनसे कोई बात करे, समझे जो सुनी नहीं जाती। उनको इमोशनल सपोर्ट दें। छठा पॉइंट है कि उनको गुस्सा आता है। उनके गुस्से को थामना होगा। नियमित हेल्थ चेकअप हो। कैथेटर लगा है तो उसे देखते रहें। एक पॉइंट है मेडिकल मैनेजमेंट घर पर कैसे हो? आमतौर पर बुजुर्गों की दवाइयां एक थैली में पड़ी होती है। बुजुर्ग भूल जाता है। हम भी भूल जाते हैं। तो दवा देने का चार्ट बनाकर रखें। बुजुर्गों के साथ फैमिली आउटिंग करें। उनकी क्षमता देखकर थोड़ा—बहुत काम भी करने को दें। उन्हें उम्र के हिसाब से रोज योग, मेडिटेशन, इनडोर गेम्स में भी व्यस्त रखें। हमारे सेंटर में 45 लोगों को ऐसा किया गया और नतीजे बेहतर मिले। इससे उनकी क्षमताएं बढ़ती है, याद्दाश्त लौटती है।

(जारी)

प्रस्तुति: अजय वर्मा

पहली कड़ी यहां पढ़ें—https://www.swasthbharat.in/the-thermometer-attention-must-be-paid-to-the-problems-of-the-elderly-dr-ramesh-goyal/

Related posts

रिसाइकिल बोतलों से बनेंगे परिधान, पहना पीएम ने

admin

खुशखबरीः कोविड-19 के परीक्षण के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने विकसित की पेपर-स्ट्रिप किट

Ashutosh Kumar Singh

बिलासपुर नसबंदी मामलाःएक दर्द … कुछ सवाल

Ashutosh Kumar Singh

Leave a Comment