स्वस्थ भारत मीडिया
नीचे की कहानी / BOTTOM STORY

The thermometer-होम्योपैथी में रोग को मिटाने वाली शक्ति: डॉ. अग्रवाल

The thermometer—इलाज का दूसरा च्वाइस है होम्योपैथी: डॉ. अग्रवाल

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। यू—ट्यूब के The thermometer के 8वें एपिसोड में होम्योपैथ के जाने माने डॉक्टर पंकज अग्रवाल के साथ स्वस्थ भारत मीडिया के समूह संपादक आशुतोष कुमार सिंह से लंबी बातचीत हुई। ये दिल्ली में क्लिनिक चला रहे हैं। पिछले 60 से अधिक सालों से इनका पूरा परिवार इस पैथी में लगा हुआ है। उनसे बातचीत का केंद्र रहा होम्योपैथी को लेकर लोगों के मन में बैठी भ्रामक अवधारणाएं, कठिन माने जाने वाले रोगों का उपचार, इस पैथी में रिसर्च आदि। प्रस्तुत है उनसे बातचीत का पहला हिस्सा…

आशुतोष: मैं जानना चाहता हूं कि होम्योपैथी बाकी पैथियों से कैसे अलग है? ये क्या है?
डॉ. अग्रवाल: आमतौर पर कहा जाता है कि लोहे को लोहे से काटा जाता है और जहर को जहर से मारा जाता है। बस यही होम्योपैथी है। विज्ञान की भाषा में कहें तो इसका मतलब यह है कि हर बीमारी के लिए उसी समय मरीज की एक वैक्सीन तैयार कर ली जाए। तो होम्योपैथी का मतलब ये है कि एक ऐसी चिकित्सा पद्धति जो आपके लिए एक अनोखी वैक्सीन बना दे जिससे बीमारी जड़ मूल से छूट जाए। इस तरह से होम्योपैथी बीमारी को जड़ से ख़त्म करने वाली पैथी है।

#Thethermometer

आशुतोष: ये तो नई बात आप बता रहे हैं। अन्य लोगों में होम्योपैथी को लेकर कोई बहुत अच्छी अवधारणा नहीं है। लोग कहते हैं कि होम्योपैथी तो कोई पैथी ही नहीं है। मरीज का इलाज ही नहीं होता। वो तो कोई मीठी गोली आप देते हैं।
डॉ. अग्रवाल: बिल्कुल ठीक बात है कि हम मीठी गोली देते हैं। पर इसके अंदर शक्ति है। इस गोली से मरीज के अंदर ऊर्जा का विस्फोट होता है। इससे मरीज पूरी तरह से ट्रांसफॉर्म हो जाता है। बीमारी से स्वास्थ्य की ओर यह ले जाता है। होम्योपैथी के बारे में यह धारणा गलत है कि यह धीरे-धीरे काम करता है। यह पहली खुराक से काम चालू कर देता है।

आशुतोष: इसके बारे में बहुत सी सारी भ्रांतियाँ फैली हुई हैं। उसका कारण क्या है?
डॉ. अग्रवाल: WHO का कहना है कि पूरी दुनिया में होम्योपैथी चिकित्सा की एक ऐसी प्रणाली है जो दूसरी पसंद है। पहली पसंद पश्चिमी चिकित्सा पद्धति है जिसे हम एलोपैथी कहते हैं। इसके बाद दूसरी चॉइस होम्योपैथी है और वह बहुत लंबे समय से इस बात को कह रही है। वह ऐसा क्यों कह रही है, ये भी तो जरूरी है।

#Thethermometer

आशुतोष: लेकिन होम्योपैथी के डॉक्टर अक्सर अलग-अलग पैथियों की दवा भी देते हैं। दूसरी पैथी के लोग यह भी कहते हैं कि आप लोगों की दवा में अल्कोहल होता है।
डॉ. अग्रवाल: नहीं…नहीं…ऐसी कोई बात नहीं है। कोई अल्कोहल नहीं दिया जाता है। ये बिल्कुल ठीक है कि हमारी दवाओं का संरक्षण अल्कोहल में होता है। लेकिन जब मरीज को दिया जाता है तो उसके अंदर इसका एक अंश हिस्सा भी नहीं होता है। यही नियम है। अगर कोई देता है तो उसे सज़ा का भागी होना पड़ता है। हमारे यहां जो दवा बनाई गई है उसे प्रॉपर ब्लॉटिंग पेपर पर सुखा कर दी जाती है। हम किसी को अल्कोहल नहीं बेच रहे हैं।

आशुतोष: मैं ये जानना चाहता हूं कि होम्योपैथी के बारे में इतनी बात क्यों होती है?
डॉ. अग्रवाल: इसका मतलब यह है कि इससे किसी को नुकसान हो रहा है, ऐसा मुझे लगता है। आखिर क्यों मेरी क्लीनिक चल रही है? मेरी तरह से लाखों होम्योपैथिक चिकित्सकों की पूरे देश में हर जगह क्लीनिक क्यों चल रही है? हो सकता है कुछ डॉक्टर अंग्रेजी दवा भी दे देंते होंगे। एक बात मान कर चलें कि हर सिस्टम और मेडिसिन में 5 से 10 फीसद लोग ऐसे होते हैं जो गलत काम करते हैं। ये संख्या सभी पैथियों में होगी। विज्ञान के जो काम होम्योपैथी में हुए, उसकी जांच, उसके नतीजे पर आकलन करना चाहिए। होमियोपैथी के अंदर भी ऐसे 5-10 फीसद लोग होंगे। आकलन करना है तो उसके नतीजे पर करें। सही काम करने वाले हैं 90 फीसद सही काम करने वाले हैं।

#Thethermometer

आशुतोष: एक आरोप और है कि होम्योपैथी के प्रैक्टिशनर रिसर्च तो करते नहीं है। एविडेंस तो है ही नहीं।
डॉ. अग्रवाल: आप डाटा बेस ढूंढिए ना। हमारे यहां हर तरह का रिसर्च है। बेसिक रिसर्च है। जैसे ये देखा जा रहा है कि कैंसर के सेल को। लेबोरेटरी की डिश प्लेट के अंदर हमने कैंसर ट्यूमर का सेल रख दिया। कैंसर की दवा उसके अंदर डाल दी और उसको जो प्रक्रिया है, उसके मुताबिक उसको परखा गया तो दवा के असर का पता चलता है। जब रिजल्ट शो हो रहा है तो आप कैसे कहेंगे कि सिर्फ सादा गोली है या प्लेन अल्कोहल है। कैसे कह सकते हैं?

आशुतोष: मतलब आप कह रहे हैं कि कैंसर जैसे असाध्य रोग या अन्य भयावह रोगों का भी इलाज आप करते हैं?
डॉ. अग्रवाल: हां। उसका भी इलाज हम करते हैं और बहुत ही सुखद और पक्का इलाज होता है। हम दावे के साथ ये बात कर रहे हैं। हम अपने तजुर्ब के साथ भी बात कर रहे हैं, किताब से पढ़ कर नहीं। अपनी क्लीनिक में भी ऐसे मरीजों का होम्योपैथिक इलाज किया और वो पिछले 10—15 सालों से बिल्कुल अच्छे हैं।

#Thethermometer

आशुतोष: क्या वैसे मरीज भी आये जिनको कीमोथेरेपी की सलाह दी गई हो?
डॉ. अग्रवाल: ऐसे ही आते हैं। अगर मैंने किसी को रोगी को देखा और मुझे शक हुआ कि शायद इसे कैंसर जैसा रोग हो सकता है। तो मैंने उनको टेस्ट बताई। जांच में अनफॉर्चूनेटली वह बीमारी निकल गई तो वो मेरा इलाज नहीं कराते हैं। पहले वो राजीव गांधी या किसी अच्छे बड़े कैंसर संस्थान में इलाज करते हैं। जब वो वहां पर इलाज लेते हैं और कई राउंड की प्रक्रिया से गुजरते हैं। लेकिन उसके कुछ समय के बाद उनकी बीमारी फिर सामने आ जाती है। अब उनका शरीर जल गया। उनकी जेब जल गई। सब कुछ जल गया। तो निराश हो जाते हैं कि अब कुछ नहीं होने वाला। तो अब उसके बाद होम्योपैथी में आते हैं। जब वो होम्योपैथी में आते हैं। सबसे बुरी हालत में पहुंचकर वापस आते हैं। उसके बाद धीरे—धीरे रिजल्ट आता है। फर्स्ट हैंड तो कोई आता ही नहीं। फर्स्ट हैंड यदि कोई आ जाए तब तो और बेहतर रिजल्ट होगा। लेकिन क्या होता है कि जो भी दूसरा इलाज लेकर आए, वे सर्जरी करके आए थे। उसकी वजह से हुआ नुकसान कुछ ना कुछ मरीज में रह जाते हैं। जैसे एक रोगी को उसके शोल्डर में हुआ, शोल्डर से लंग में चला गया, वहां से रेक्टम में चला गया। अब ऑपरेशन हुए तो उसके बाद कहीं लिंफेमा हो गया। बाजू उसकी सूज गई है। अब वो सूजी हुई बाजू लेकर घूमता है। बाकी इलाज बहुत अच्छा होता है। रिसर्च के अंदर डाटाबेस भरा पड़ा है। सभी तरह के रिसर्च डाटाबेस में है। होम्योपैथी से सभी तरह के रोगों के लिए, एलर्जी के लिए, कैंसर के लिए, बहुत सारी बीमारियों के लिए जो एक लाइलाज की कैटेगरी में मानी जाती है, उन सबके रिजल्ट शो किए हुए हैं।

आशुतोष: जब आपने कैंसर की चर्चा की तो माना जाता है कि कई तरह के कैंसर होते हैं। तो क्या ये जितने प्रकार के कैंसर होते हैं, उन सबका इलाज आप लोग करते हैं या किसी खास का? कोई स्पेसिफिक रिसर्च तो हुआ होगा?
डॉ. अग्रवाल: अभी तक ये देखा गया है कि इंसान के नाखूनों और बालों में कैंसर नहीं होता है। बाकी शरीर के हर अंग और हर सेल और हर टिश्यू में किसी ना किसी वजह से कैंसर हो सकता है। होम्योपैथी में सभी तरह के कैंसर का इलाज होता है और बहुत ही कामयाब इलाज होता है। इस पर रिसर्च पेपर है। लोगों के तजुर्ब मिलेंगे, पेशेंट मिलेंगे, डॉक्टर मिलेंगे होम्योपैथी के जो इस तरह का इलाज करते हैं और बहुत सफलतापूर्वक इलाज करते हैं।

#Thethermometer

आशुतोष: क्या होम्योपैथी में भी आन्कोलॉजिस्ट होते हैं? कुछ अलग स्पेशलाइज या जो जनरल एमडी?
डॉ. अग्रवाल: ऐसा है कि जब हम किसी तरह के स्पेशलाइजेशन की बात करते हैं तो हमारे यहां भी ये स्पेशलाइजेशन की बातें शुरू हुई। हमारे यहां मेडिसिन के स्पेशलिस्ट के एमडी होते हैं। पीडिएट्रिक्स की एमडी होती है। बाकी विषयों में भी एमडी स्टार्ट हो रही है। अलग-अलग विषयों में पीएचडी भी स्टार्ट हो चुकी है। मैंने भी पीएचडी किया है। मेरा इस विषय में मत ये है कि होम्योपैथी किसी रोग के स्पेशलाइजेशन पर काम नहीं करता। हम रोगी के स्पेशलाइजेशन पर काम करते हैं जिससे वो ठीक हो सके। बीमारी की स्टडी उस सोच से की जानी चाहिए कि एक रोगी ठीक हो सके। मेरी स्टडी तो बहुत अच्छी है। मैं कैंसर के विषय में बहुत कुछ जानता हूं। रोगी नहीं ठीक हो पाता है। रोगी कुछ समय के लिए ठीक हुआ और उसके बाद उसको दोबारा हो गया। तो ऐसी परिस्थिति में स्पेशलिस्ट कहने से लाभ क्या है? स्पेशलिस्ट तो रोगी का होना चाहिए, इलाज का होना चाहिए। ये मेरा सोच है।

आशुतोष: आपने कैंसर को लेकर बहुत नायाब जानकारी दी। मैं भी नहीं जानता था कि होम्योपैथी में इस लेवल पर काम हो रहा है, रिसर्च हो रहे हैं। और भी बहुत सी बीमारियां होंगी जिनका उपचार आपके यहां होता होगा। ऐसी कौन-कौन सी बीमारियां है जिनका उपचार आप दावे के साथ करते हैं।
डॉ. अग्रवाल: ऐसी बीमारियां को कैटेगराइज कर दिया गया है कि यह असाध्य रोग है, क्रॉनिक डिजीज है, यह ना ठीक होने वाली बीमारी है। जो किसी भी रूप में सर्जिकल नहीं है, ऐसी सभी बीमारियों में होम्योपैथी बहुत कारगर है। अब हम कुछ उदाहरण लेते हैं। जितने भी नॉन कम्युनिकबल डिजीज है जिसमें लाइफस्टाइल डिसऑर्डर, डायबिटीज, हाइपरटेंशन, ओबेसिटी, पीसीओडी, पीसीओएस है। ये जितने भी सारे तरह के रोगों की एक पूरी कैटेगरी है, उसमें होम्योपैथी से बहुत ही अच्छे तरीके से पेशेंट ठीक होता है। ठीक होने का मतलब समझिए कि कुछ समय के इलाज के बाद आप ठीक हो गए। अब वो रिस्क भी नहीं होता है कि दवा न लेने पर बीमारी लौटे। उसको ठीक होना कहते हैं। जीवन भर दवा नहीं लेनी होती। जैसे किसी को थायराइड हो गया। मैंने अपना एक इंटरनेशनल पेपर प्रेजेंट किया था जो हाइपोथायरिडिज्म हो जाता है जिसके अंदर टीएसएच लेवल बढ़ जाता है। 116 पेशेंट का मैंने डाटा पब्लिश किया था। उसमें कम से कम 100 मरीज ऐसे थे जिनको कि मैंने बहुत लंबे समय तक फॉलो किया और उनका टीएसएच दोबारा से नहीं बिगड़ा। मेरी दवा बंद होने के बाद भी मैंने बड़े लंबे समय तक स्टडी किया था। अदरवाइज क्या है थायराइड के बारे में कि जीवन भर दवा आपके साथ जुड़ जाएगा। मजेदार बात ये है कि एकेडमिक स्ट्रेस, फैमिली स्ट्रेस आदि बहुत सारी वजह से छोटे बच्चों में ये बहुत रोग आने लगा है।

(जारी)

प्रस्तुति: अजय वर्मा

Related posts

नई बहस : फार्मासिस्ट चाहते हैं दवा के रैपर में बदलाव

Ashutosh Kumar Singh

स्वास्थ्य प्रबंधन : आवश्यकता एवं मार्ग

Ashutosh Kumar Singh

अंग और देह दान भारत की सदियों पुरानी परंपरा

admin

Leave a Comment