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Face transplant: भारत में पहली बार एम्स में तैयारी

फेस ट्रांसप्लांट: भारत में पहली बार एम्स में तैयारी
नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। AIIMS दिल्ली ने चेहरा प्रत्यारोपण कार्यक्रम शुरू कर उन्नत सर्जरी की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। गंभीर चोट, जलन या जटिल बीमारियों की वजह से चेहरे को नुकसान होने वाले मरीजों के लिए यह वरदान साबित होगा। इसकी तैयारी के लिए पिछले महीने बर्न्स और प्लास्टिक सर्जरी ब्लॉक में ट्रेनिंग वर्कशॉप हुई जिसमें ब्रेन डेड डोनर से चेहरे की त्वचा लेकर सर्जरी की तैयारी की गई। इसका नेतृत्व डॉ. मनीष सिंघल और एम्स की प्लास्टिक सर्जरी टीम कर रही है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के डॉ. इंद्रनील सिन्हा ने इसका मार्गदर्शन दिया। वैसे भारत में पहला फेस ट्रांसप्लांटेशन (Face transplant) अभी होना बाकी है, लेकिन मरीजों के लिए अपनी पहचान और चेहरे को वापस पाने का दिन अब पहले से कहीं ज्यादा करीब है।

फेस ट्रांसप्लांट: प्रक्रिया काफी जटिल

रिपोर्ट के अनुसार फेस ट्रांसप्लांट कोई साधारण सर्जरी नहीं है। यह अत्यंत जटिल और कई विभागों के समन्वय से संभव होती है। इस कार्यक्रम में जिन विभागों की भागीदारी रहेगी, उनमें शामिल हैं—एनेस्थीसियोलॉजी, पेन मेडिसिन और क्रिटिकल केयर,एनाटॉमी, ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जरी, ऑर्गन रिट्रीवल एंड बैंकिंग ऑर्गनाइजेशन, ईएनटी, पैथोलॉजी प्लास्टिक, रिकंस्ट्रक्टिव और बर्न्स सर्जरी, साइकियाट्री, ट्रांसप्लांट इम्यूनोलॉजी। विशेषज्ञों के मुताबिक फेस ट्रांसप्लांट में सिर्फ सर्जरी ही नहीं, बल्कि डोनर चयन, इम्यूनोलॉजिकल मैनेजमेंट, मानसिक स्वास्थ्य मूल्यांकन और लंबे समय तक फॉलो-अप बेहद अहम होते हैं। यह एक कम्पोजिट टिश्यू एलोग्राफ्ट प्रक्रिया है, जिसमें त्वचा, मांसपेशियां, नसें, रक्त वाहिकाएं और कभी-कभी हड्डियां भी प्रत्यारोपित की जाती हैं। सर्जरी कई घंटों तक चल सकती है और इसके बाद मरीज को जीवन भर इम्यूनोसप्रेसिव दवाओं पर रहना पड़ सकता है ताकि शरीर नया चेहरा स्वीकार कर सके।

फेस ट्रांसप्लांट: नई जिंदगी देने का प्रयास

इस प्रक्रिश के लिए मरीज का चयन अत्यंत सावधानी से किया जाएगा। मेडिकल फिटनेस के साथ-साथ साइकोलॉजिकल असेसमेंट भी अनिवार्य होगा। इसका उद्देश्य केवल सर्जरी करना नहीं है, बल्कि मरीजों को सामाजिक और मानसिक रूप से पुनर्स्थापित करना है। यह उन्हें नई जिंदगी देने का प्रयास है। जहां वे आत्मसम्मान के साथ समाज में फिर से खड़े हो सकें। दुनिया के कुछ चुनिंदा देशों में ही फेस ट्रांसप्लांट की सुविधा उपलब्ध है। ऐसे में एम्स, नई दिल्ली का यह कदम भारत को उन्नत ट्रांसप्लांट सर्जरी के वैश्विक मानचित्र पर और मजबूत करता है। यह पहल न केवल चिकित्सा अनुसंधान को बढ़ावा देगी, बल्कि देश में ऑर्गन डोनेशन के प्रति जागरूकता भी बढ़ाएगी।

फेस ट्रांसप्लांट: आगे होगा विस्तार

चेहरे की विकृति सिर्फ शारीरिक समस्या नहीं होती। कई मरीज अवसाद, आत्मग्लानि और सामाजिक अलगाव का शिकार हो जाते हैं। इसलिए इस कार्यक्रम में साइकियाट्रिक और साइकोलॉजिकल सपोर्ट को विशेष महत्व दिया गया है, ताकि मरीज सर्जरी के बाद नई पहचान को मानसिक रूप से स्वीकार कर सकें। एम्स प्रशासन ने संकेत दिया है कि आने वाले समय में इस कार्यक्रम को और विस्तार दिया जाएगा। डोनर मैनेजमेंट, ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेशन और रिसर्च को और सशक्त बनाने की योजना भी तैयार की जा रही है। यह अगर संभव हो जाता है तो भारतीय स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

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