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Dengue की पहली वैक्सीन को भारत में मिली मंजूरी

Dengue की पहली वैक्सीन को भारत में मिली मंजूरी

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। डेंगू की रोकथाम के लिए बनी पहली वैक्सीन को भारत ने मंजूरी दे दी है। यह वैक्सीन जापान की दवा कंपनी टाकेदा फार्मास्युटिकल्स ने बलाई है जिसका नाम है QDENGA। जान लीजिए कि भारत में पिछले दो दशक में डेंगू के मामलों में 11 गुना बढ़ोतरी हुई है। निर्माता कंपनी का भी कहना है कि दुनिया में डेंगू के कुल बोझ का लगभग एक-तिहाई हिस्सा भारत में है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भी भारत डेंगू से सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल है।

डेंगू के लक्षण

आम तौर पर डेंगू के लक्षण चार से 10 दिन बाद दिखाई देते हैं और सात दिन तक रह सकते हैं। इनमें तेज बुखार, तेज सिरदर्द, आंखों के पीछे दर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द, मतली, उल्टी, शरीर पर चकत्ते और सूजी हुई ग्रंथियां शामिल हैं। दूसरी बार संक्रमण होने पर गंभीर डेंगू का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे मामलों में तेज पेट दर्द, लगातार उल्टी, तेजी से सांस चलना, मसूड़ों या नाक से खून आना, उल्टी या मल में खून, अत्यधिक प्यास, ठंडी और पीली त्वचा व कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। यह एक वायरल बीमारी है, जो संक्रमित एडीज मच्छर के काटने से फैलती है। इसका खतरा गर्म मौसम वाले देशों में ज्यादा रहता है। अधिकांश लोगों में इसके लक्षण नहीं दिखाई देते या हल्के होते हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह गंभीर रूप लेकर जानलेवा भी हो सकती है। इसका कोई विशेष इलाज नहीं है, इसलिए समय पर पहचान और सही इलाज बहुत जरूरी होता है।

दो डोज का कोर्स

डेंगू के लिए तैयार QDENGA वैक्सीन वयस्कों, किशोरों और चार साल या उससे अधिक उम्र के बच्चों को दी जा सकती है। इसमें डेंगू वायरस के चारों प्रकारों के कमजोर रूप होते हैं, जो बीमारी नहीं फैलाते, लेकिन शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को वायरस से लड़ने के लिए तैयार करते हैं। जब यह वैक्सीन लगाई जाती है, तो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली इन कमजोर वायरस को पहचानकर उनके खिलाफ एंटीबॉडी बनाती है। बाद में अगर व्यक्ति असली डेंगू वायरस के संपर्क में आता है, तो शरीर पहले से तैयार एंटीबॉडी की मदद से वायरस से तेजी से लड़ने की कोशिश करता है। कंपनी के मुताबिक, यह वैक्सीन डेंगू वायरस के चारों प्रकारों से सुरक्षा देने के लिए बनाई गई है और इसे लगवाने के लिए पहले डेंगू होना जरूरी नहीं है। वैक्सीन लगाने से पहले किसी तरह की जांच भी नहीं करनी पड़ती। इसे बांह की त्वचा के नीचे इंजेक्शन के रूप में लगाया जाता है। इसका पूरा कोर्स दो डोज का होता है और दोनों डोज के बीच कम से कम तीन महीने का अंतर रखा जाता है। अगर दूसरी डोज किसी कारण से देर से लगती है, तो दोबारा शुरुआत करने की जरूरत नहीं होती। दूसरी डोज उपलब्ध होते ही लगाई जा सकती है।

खतरा 90 प्रतिशत कम

आठ देशों में किए गए एक बड़े अध्ययन में लगभग 20 हजार बच्चों को शामिल किया गया। अध्ययन में पाया गया कि दूसरी डोज के बाद डेंगू के बुखार के मामलों में करीब 80 प्रतिशत कमी आई। वहीं डेंगू के कारण अस्पताल में भर्ती होने का खतरा 90 प्रतिशत तक कम हो गया। इस वैक्सीन के बाद इंजेक्शन वाली जगह पर दर्द या लालपन, सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, कमजोरी और अस्वस्थ महसूस होना जैसे दुष्प्रभाव हो सकते हैं। कुछ लोगों को बुखार भी आ सकता है। ये दुष्प्रभाव आमतौर पर हल्के होते हैं और कुछ दिनों में ठीक हो जाते हैं। दूसरी डोज के बाद ये दुष्प्रभाव पहले की तुलना में कम देखे गए। यह वैक्सीन उन लोगों को नहीं दी जानी चाहिए जिन्हें इसकी किसी पिछली डोज से एलर्जी हुई हो। इसके अलावा कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोग, एचआईवी संक्रमण के कारण प्रतिरक्षा क्षमता कम होने वाले लोग, इम्यून सिस्टम को दबाने वाली दवाएं लेने वाले लोग, गर्भवती महिलाएं, गर्भधारण की योजना बना रही महिलाएं और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को भी यह वैक्सीन नहीं लगाई जानी चाहिए।

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