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वायु प्रदूषण स्वास्थ्य की समस्या, सिर्फ पर्यावरण की नहीं

वायुप्रदूषण स्वास्थ्य की समस्या, सिर्फ पर्यावरण की नहीं

धीप्रज्ञ द्विवेदी

स्वच्छ हवा की चिंता आखिर स्वास्थ्य की चिंता क्यों है?

हम हवा को देखते नहीं हैं, लेकिन उसके बिना कुछ मिनट भी जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। हम हर दिन हजारों बार सांस लेते हैं और शायद ही कभी इस बारे में सोचते हैं कि जिस हवा को हम अपने भीतर खींच रहे हैं, उसमें क्या-क्या मिला हुआ है। सामान्य परिस्थितियों में हवा जीवन देती है, लेकिन जब उसमें धुआँ, धूल, जहरीली गैसें और सूक्ष्म कण बढ़ जाते हैं तो वही हवा धीरे-धीरे स्वास्थ्य के लिए खतरा बनने लगती है। यही कारण है कि वायु प्रदूषण को केवल पर्यावरण की समस्या मानना पर्याप्त नहीं है। यह सीधे हमारे स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ प्रश्न है। फेफड़े इसका पहला सामना करते हैं, लेकिन प्रभाव केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं रहता। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से हृदय, रक्तवाहिकाओं और शरीर के दूसरे अंगों पर भी असर पड़ सकता है। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से बीमार लोगों के लिए इसका खतरा और अधिक गंभीर हो सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वायु प्रदूषण सीमाएँ नहीं देखता। प्रदूषण जिस स्थान पर पैदा हुआ, जरूरी नहीं कि उसका असर भी वहीं तक सीमित रहे। हवा चलती है, मौसम बदलता है और वातावरण में मौजूद प्रदूषक एक इलाके से दूसरे इलाके तक पहुँच जाते हैं।

दिल्ली की हवा और स्वास्थ्य का सवाल

दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र इसका हमारे सामने मौजूद उदाहरण हैं। हर वर्ष सर्दियों के दिनों में जब हवा की गुणवत्ता खराब होती है, तो लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगती है। सुबह की सैर रोक दी जाती है, बच्चों की बाहरी गतिविधियों पर रोक लगानी पड़ती है और अस्पतालों में सांस से जुड़ी शिकायतें बढ़ने लगती हैं। दिल्ली की समस्या किसी एक कारण से पैदा नहीं होती। वाहनों का उत्सर्जन, निर्माण और सड़क की धूल, औद्योगिक गतिविधियाँ, कचरा जलाना, ऊर्जा उत्पादन और आसपास के क्षेत्रों से आने वाला धुआँ—कई स्रोत मिलकर समस्या को गंभीर बनाते हैं। मौसम की कुछ परिस्थितियाँ प्रदूषकों को वातावरण की निचली परत में फँसा देती हैं और तब शहर की हवा और अधिक खराब हो जाती है। लेकिन किसी व्यक्ति के लिए यह जानना कि प्रदूषण का स्रोत क्या है, उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना यह जानना कि उसके शरीर पर इसका असर क्या हो रहा है। PM2.5 जैसे अत्यंत सूक्ष्म कण सांस के साथ शरीर के भीतर गहराई तक पहुँच सकते हैं। लगातार संपर्क से खांसी, आंखों में जलन, सांस लेने में परेशानी और अस्थमा जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं। लंबे समय तक खराब हवा के संपर्क को हृदय और रक्तवाहिकाओं से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों से भी जोड़ा गया है। इसका सबसे संवेदनशील पक्ष बच्चे हैं। बच्चों के फेफड़े अभी विकसित हो रहे होते हैं और वे वयस्कों की तुलना में अपने शरीर के आकार के अनुपात में अधिक हवा लेते हैं। इसलिए उनके लिए लगातार प्रदूषित वातावरण में रहना चिंता का विषय है। इसी तरह बुजुर्ग और पहले से सांस या हृदय संबंधी बीमारी से जूझ रहे लोगों को भी अधिक सावधानी की आवश्यकता होती है।

इतिहास दे चुका है चेतावनी

आज दिल्ली की चर्चा होती है, लेकिन वायु प्रदूषण का संकट नया नहीं है। दुनिया के कई शहर इस समस्या की गंभीर कीमत पहले चुका चुके हैं। दिसंबर 1952 का ग्रेट लंदन स्मॉग इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। पांच दिनों तक लंदन धुएँ और कोहरे की घनी चादर में ढका रहा। घरेलू चूल्हों, बिजलीघरों और औद्योगिक ईंधन से निकलने वाला धुआँ मौसम की ऐसी परिस्थितियों में फँस गया कि शहर की हवा बेहद जहरीली हो गई। उस समय हजारों लोगों की मृत्यु हुई और श्वसन तथा हृदय संबंधी समस्याओं में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। इस त्रासदी के बाद ब्रिटेन में स्वच्छ हवा के लिए कानून बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया और 1956 का Clean Air Act आया। लंदन की घटना हमें बताती है कि जब प्रदूषण को लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाता है तो एक दिन वह केवल पर्यावरणीय असुविधा नहीं रहता, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन जाता है। लॉस एंजेल्स ने दूसरी तरह का अनुभव किया। वहाँ वाहनों और औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाले प्रदूषक सूर्य के प्रकाश के साथ रासायनिक प्रतिक्रियाएँ करते थे और फोटोकैमिकल स्मॉग की समस्या सामने आई। इसने दुनिया को यह समझने में मदद की कि हर स्मॉग एक जैसा नहीं होता और प्रदूषण की प्रकृति स्थानीय परिस्थितियों, ईंधन, उद्योग, यातायात और मौसम के साथ बदल सकती है।

भोपाल: जब हवा में घुली मौत

भारत के संदर्भ में इस विषय को याद करते हुए भोपाल गैस त्रासदी को भूलना संभव नहीं है।
2–3 दिसंबर 1984 की रात भोपाल स्थित एक कीटनाशक संयंत्र से मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) गैस का रिसाव हुआ। विषैली गैस हवा में फैलती हुई आसपास के घनी आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुँची। उस समय बहुत से लोगों को यह समझने का अवसर ही नहीं मिला कि जिस हवा में वे सांस ले रहे हैं, वही उनके लिए जानलेवा बन चुकी है। भोपाल की त्रासदी सामान्य शहरी वायु प्रदूषण की घटना नहीं थी, यह एक भयावह औद्योगिक दुर्घटना और विषैली गैस के वातावरण में फैलने की घटना थी। लेकिन वायु प्रदूषण की हमारी समझ में इसका महत्व बहुत गहरा है—क्योंकि इसने दिखाया कि जब किसी खतरनाक पदार्थ को हवा का माध्यम मिल जाता है तो उसका प्रभाव किसी कारखाने की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता। भोपाल में तत्काल जनहानि के साथ-साथ लंबे समय तक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ भी बनी रहीं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने इस त्रासदी के बाद श्वसन, फेफड़ों की कार्यक्षमता, मानसिक स्वास्थ्य, गर्भावस्था, तंत्रिका तंत्र और अन्य स्वास्थ्य प्रभावों पर लंबे समय तक अध्ययन किए। भारत सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई एक ICMR-संबंधित जानकारी में गैस से प्रभावित लोगों में फेफड़ों की कार्यक्षमता से जुड़ी असामान्यताओं का भी उल्लेख किया गया था। भोपाल हमें एक बहुत कठिन लेकिन जरूरी सबक देता है—औद्योगिक सुरक्षा और पर्यावरण सुरक्षा को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। किसी उद्योग के भीतर हुई दुर्घटना बाहर रहने वाले हजारों लोगों के जीवन को प्रभावित कर सकती है। इसलिए उद्योगों में उत्पादन की क्षमता के साथ सुरक्षा व्यवस्था, गैस रिसाव की निगरानी, आपातकालीन चेतावनी और आसपास रहने वाली आबादी की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

शरीर महसूस करता है प्रदूषण

वायु प्रदूषण का सबसे खतरनाक पक्ष यही है कि हमेशा दिखाई नहीं देता। धुआँ दिखाई दे सकता है, लेकिन PM2.5 जैसे सूक्ष्म कणों को हमारी आँखें नहीं देख सकतीं। कुछ गैसें भी रंगहीन और गंधहीन हो सकती हैं। इसलिए केवल यह देखकर कि आसमान साफ दिखाई दे रहा है, यह मान लेना सही नहीं कि हवा भी साफ है। प्रदूषित हवा का असर कई बार तत्काल दिखाई देता है—आंखों में जलन, गले में खराश, खांसी या सांस फूलना। लेकिन कुछ प्रभाव धीरे-धीरे सामने आते हैं। लगातार प्रदूषण के संपर्क में रहने वाला व्यक्ति शायद हर दिन बीमारी महसूस न करे, लेकिन लंबे समय में उसके स्वास्थ्य पर इसका बोझ बढ़ सकता है। इसीलिए वायु प्रदूषण से निपटने की सबसे अच्छी रणनीति केवल बीमारी के बाद इलाज करना नहीं, बल्कि प्रदूषण को कम करना और लोगों को उसके संपर्क से बचाना है। दूसरे शब्दों में, स्वच्छ हवा स्वयं एक प्रकार की निवारक स्वास्थ्य व्यवस्था है।

घर के भीतर की हवा भी महत्वपूर्ण

हम अक्सर वायु प्रदूषण को केवल बाहर की हवा से जोड़ते हैं, जबकि घर के भीतर की हवा भी स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। धुआँ, खराब वेंटिलेशन, कुछ प्रकार के ईंधन का इस्तेमाल, धूम्रपान और अन्य स्रोत घर के वातावरण को प्रदूषित कर सकते हैं। इसलिए स्वच्छ हवा की लड़ाई केवल सड़कों और फैक्ट्रियों तक सीमित नहीं हो सकती। घर, स्कूल, कार्यालय, अस्पताल और सार्वजनिक स्थान—हर जगह हवा की गुणवत्ता महत्वपूर्ण है।

तकनीक जरूरी लेकिन ज्यादा जरूरी है कार्रवाई

आज हमारे पास वह तकनीक है जिसकी कल्पना कुछ दशक पहले कठिन थी। एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशन, सेंसर, उपग्रह, मौसम संबंधी डेटा और वास्तविक समय में प्रदूषण की निगरानी करने वाली प्रणालियाँ हमें यह बताने में सक्षम हैं कि हवा की स्थिति कैसी है। लेकिन केवल AQI का आंकड़ा जान लेना पर्याप्त नहीं है। यदि किसी शहर की हवा लगातार खराब है तो अगला सवाल होना चाहिए—प्रदूषण का स्रोत क्या है? उसे कम करने के लिए क्या किया जा रहा है? कौन-से उद्योग नियमों का पालन नहीं कर रहे? निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण क्यों नहीं है? कचरा खुले में क्यों जल रहा है? सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाने की दिशा में क्या कदम उठाए जा रहे हैं? तकनीक का असली मूल्य तभी है जब वह आंकड़े से आगे बढ़कर कार्रवाई का आधार बने।

जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं

वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार और प्रशासन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है, लेकिन समाज की भूमिका भी कम नहीं है। हम अनावश्यक रूप से वाहन का इस्तेमाल कम कर सकते हैं। सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता दे सकते हैं। कचरा खुले में जलाने से रोक सकते हैं। निर्माण कार्यों में धूल नियंत्रण के नियमों का पालन सुनिश्चित करने की मांग कर सकते हैं। पेड़ों को केवल लगाने की नहीं, उन्हें बचाने की चिंता कर सकते हैं। उद्योगों को भी यह समझना होगा कि पर्यावरणीय नियम उत्पादन में बाधा नहीं हैं। वे वास्तव में श्रमिकों और आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के नियम हैं। भोपाल जैसी त्रासदियाँ हमें यह भूलने नहीं देतीं कि सुरक्षा में थोड़ी-सी लापरवाही की कीमत कई पीढ़ियों को चुकानी पड़ सकती है।

हवा की कोई सीमा नहीं होती

दिल्ली की हवा हमें आज की चुनौती दिखाती है। लंदन का स्मॉग इतिहास की चेतावनी देता है। लॉस एंजेल्स हमें आधुनिक शहरी प्रदूषण की दूसरी तस्वीर दिखाता है। और भोपाल हमें याद दिलाता है कि औद्योगिक सुरक्षा में हुई चूक जब हवा के रास्ते बाहर आती है तो उसका असर कितना भयावह हो सकता है। इन सभी घटनाओं में परिस्थितियाँ अलग थीं, प्रदूषक अलग थे और समय अलग था, लेकिन एक बात समान थी—प्रदूषित हवा ने इंसान को उसकी सामाजिक, आर्थिक या भौगोलिक सीमाओं से अलग करके प्रभावित किया। हवा किसी सीमा पर रुकती नहीं। इसलिए वायु प्रदूषण से लड़ाई भी किसी एक शहर, राज्य या देश की समस्या मानकर नहीं लड़ी जा सकती। यह स्थानीय कार्रवाई के साथ-साथ क्षेत्रीय और वैश्विक सहयोग की भी मांग करती है।
और अंततः यह सवाल हमारे अपने जीवन से जुड़ता है। हम अपने बच्चों को कैसी हवा देना चाहते हैं? क्या हम चाहते हैं कि वे मौसम बदलने के साथ सांस लेने से डरें? क्या हम चाहते हैं कि शहरों में रहने का अर्थ लगातार खराब होती हवा के साथ समझौता करना हो? इसका उत्तर हमें आज ही देना होगा। स्वच्छ हवा केवल पर्यावरण की सुंदरता नहीं है। यह बच्चे के स्वस्थ फेफड़ों, बुजुर्ग की सहज सांस, गर्भवती महिला की सुरक्षा और हर नागरिक के बेहतर जीवन का आधार है। इसलिए स्वच्छ वायु दिवस केवल एक दिन मनाने का अवसर नहीं होना चाहिए। यह अपने आसपास की हवा को लेकर जागरूक होने, प्रदूषण के स्रोतों पर सवाल उठाने और अपनी आदतों में जरूरी बदलाव करने का अवसर होना चाहिए।

क्योंकि अंत में बात बहुत सरल है—
हवा साफ होगी, तभी जीवन स्वस्थ होगा।
और स्वच्छ हवा बचाना वास्तव में जीवन बचाना है।

(लेखक पर्यावरण विद् हैं। सभ्यता संवाद के कार्यकारी संपादक हैं और स्वस्थ भारत के फाउंडिंग ट्रस्टी हैं।)

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