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पटना से मुजफ्फरपुर पहुंचने में नीतीश को लगे 328 घंटे, लोगों ने कहा वापस जाओ

चमकी बुखार से अब तक 139 बच्चों की हो चुकी है मौत

नई दिल्ली/ मुजफ्फरपुर (आशुतोष कुमार सिंह)

लोकलाज एवं जनदबाव के आगे बिहार के सुशासन बाबू ने अपना माथा टेकते हुए अपनी व्यस्त दिनचर्चा में से मुजफ्फरपुर जाने का समय निकाल ही लिया। पटना से मुजफ्फरपुर की दूरी  अलग-अलग मार्गों से 72 किमी से 87 किमी के बीच है। पटना से मुजफ्फरपुर पहुंचने में सड़क मार्ग से 2 घंटा 5 मिनट से लेकर 2 घंटा 48 मिनट लगते हैं। लेकिन चमकी बुखार या एक्यूट इंसेफलाइटिस से मर रहे शिशुओ को देखने पहुंचने में सूबे के मुखिया नीतीश कुमार को 14 दिन यानी 328 घंटे लग गए। इस बीच दिल्ली से स्वास्थ्य मंत्रालय की टीम उनसे पहले पहुंच गई वहां पर। सूबे के स्वास्थ्य मंत्री को भी पहुंचने में 10 दिन से ज्यादा समय लग गया। और मरने वाले शिशुओं की संख्या बढ़कर 139 तक जा पहुंची है।

जान गवाने वाले बच्चों के परिजनों को मिलेगा मुआवजा

नीतीश ने एईएस और लू से निपटने के लिए सोमवार को आपात बैठक बुलाई थी। इसमें मुजफ्फरपुर में एसकेएमसीएच परिसर में 100 बेड का नया पीडियाट्रिक आईसीयू बनाने का फैसला किया गया। साथ ही एईएस से जान गंवाने वाले बच्चों के परिजन को 4-4 लाख रुपए मुआवजा देने का भी निर्णय लिया। ध्यान रहे कि रविवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन, राज्यमंत्री अश्वनी चौबे, बिहार सरकार के मंत्री मंगल पांडे मुजफ्फरपुर पहुंचे थे। नीतीश कुमार के न पहुंचने को लेकर लोगों तरह-तरह की बाते कर रहे थे।

मुजफ्फरपुर के दो बड़े अस्पतालों में 151 बच्चे भर्ती

मस्तिष्क ज्वर से सोमवार को 6 और बच्चों की मौत हो गई। 21 की हालत गंभीर बनी हुई है। एसकेएमसीएच समेत मुजफ्फरपुर के दो बड़े अस्पताल में 151 बच्चे भर्ती हैं। इलाज के अभाव में मासूमों की मौत का सिलसिला जारी है। पर बीमारी क्या है? इस बारे में डाॅक्टर अब तक कुछ भी स्पष्ट नहीं कर पा रहे। डॉक्टर यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि बच्चों को दवा किस बीमारी की दें। औसतन यहां हर तीन घंटे में एक बच्चे की मौत हुई।

मेघराज के भरोसे बिहार के नौनिहाल

अभी तक सरकार ने दिमागी बुखार से निजात पाने का उपाय नहीं ढूढा है। चिकित्सकों का मानना है कि अब तो बारिश का मौसम आयेगा तभी जाकर इस बीमारी में कमी आएगी। एसकेएमसीएच, मुजफ्फरपुर के शिशु रोग विभाग के प्रमुख डॉ. गोपाल शंकर साहनी ने मीडिया को बताया है कि, ‘‘यह बीमारी न तो वायरल है और न ही इंसेफेलाइटिस। पुणे, दिल्ली या देश ही नहीं, अटलांटा के बेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में भी इसकी जांच हो चुकी है। कहीं भी वायरस नहीं मिला। लीची से भी कुछ लोग इस बीमारी को जोड़ते हैं, लेकिन इससे संबंध साबित नहीं हुआ। 2005 में मैंने इस पर रिसर्च किया। मैंने यही पाया कि जब भी तापमान 38 डिग्री से ज्यादा और आर्द्रता 60-65% पर पहुंचती है, इस बीमारी के मामले सामने आने लगते हैं। मौसम इस बीमारी की मुख्य वजह है।’’

आइसीयू में स्वास्थ्य व्यवस्था

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि राज्य सरकार शुरू से ही इस बीमारी पर ध्यान देती तो मामला इतना नहीं बिगड़ता। साथ ही लचर ढ़ाचागत व्यवस्था को भी इस बीमारी को नहीं रोक पाने का कारण बताया जा रहा है। देखना यह है कि सरकार सही मायने में बिहार के स्वास्थ्य व्यस्था को कब आइसीयू से बाहर निकाल पाती है।

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