नयी दिल्ली। हार्ट (Heart) के बारे में आम जन में अनेक भ्रांतियाँ हैं। इन्हीं भ्रांतियों का लाभ उठाकर आज के धन लोभी डॉक्टर उन्हें मृत्यु का भय दिखाकर बिना किसी जरूरत के सर्जरी और स्टेण्ट की ओर ढकेल कर उनका आर्थिक शोषण तो करते ही हैं, साथ ही उनके शरीर को जर्जर करके उनको असमय ही मौत के मुँह में झोंक देते हैं। स्टॉकहोम के कैरोलिसा इंस्टिट्यूट में अभी हाल में ही हुए एक शोध अनुसार ज्ञात हुआ है कि हृदय की मांसपेशीय कोशिकाएँ अपना पुन: निर्माण कर लेती हैं। इसका एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि पुनर्निर्माण की यह प्रक्रिया काफी धीमी गति से होती है। 70 वर्ष की उम्र तक पहुँचते पहुँचते यह दर 40 प्रतिशत के आसपास होती है। 25 वर्ष की आयु तक एक प्रतिशत कोशिकाएँ बदलती रहती हैं। इस शोध से उस तथ्य को चुनौती मिलती है जिसमें कहा जाता था कि हृदय कभी मांसपेशीय कोशिकाएँ निर्मित नहीं करता।
Heart: आयुर्वेद के आचार्यों का कथन
चित्रकूट स्थित आयुष ग्राम चिकित्सालय के आचार्य डॉ. मदनगोपाल वाजपेयी के अनुसार आयुर्वेद के महान् आचार्य क्या इस सम्बन्ध में कहते हैं-
तासां प्रथमं मांसधरा, यस्यां मांसे सिरास्नायुधमनीस्रोतसां प्रताना भवन्ति।। सु .शा. 4/8।।
शरीर की मांसधरा कला की मांस में शिराएँ, स्नायु, धमनियाँ और स्रोतों के जाल इस प्रकार फैले होते हैं जिस प्रकार मुलायम कीचड़ में कमलनाल फैली रहती है।
यथा- वृष मृणालानि विवर्धन्ते समन्तकः।
तथा मांसे सिरादय।। सु.श. 4/9।।
यानी जिस प्रकार कमल की नाल को चारो ओर फैलने के लिए मिट्टी का कीचड़ होना चाहिए उसी प्रकार सिरा धमनी को सही कार्य करने और स्वस्थ रहने के लिए स्वस्थ और दोषरहित मांस धातु होना चाहिए।
यथा-स्वभावतः खानि मृणालेषु बिशेषु च।
धमनीनां तथा खानि रसौ यैरुपचीयते।। सु.श. 9/10।।
जिस प्रकार कमल की डंठल और मूल में प्राकृतिक रूप से सूक्ष्म अतिसूक्ष्म दृश्य और अदृश्य नालियाँ बनी होती हैं उसी प्रकार से धमनियों में दृष्य अदृष्य सूक्ष्म अति सूक्ष्म रास्तों की नालियाँ बनी होती हैं। यदि आयु और काल के प्रभाव के कारण से धमनियों के कुछ छोटे या बड़े रास्ते अवरुद्ध हो भी जाते हैं तो भी धमनियों में दूसरे सूक्ष्म अतिसूक्ष्म मार्ग रस रक्त प्राणवायु का संचालन करते रहते हैं।
पुण्डरीकेंण सदृशं हृदयं स्यादधोमुखम।
जाग्रस्तद्विकसति स्वपतश्च निमीलति।। सु.शा. 4/32।।
कमल की ही तरह हृदय विकसित होता है खुलता और बन्द होता है यानि हृदय की क्रियाएँ कमलवत होती हैं। कीचड़ के सूखने से कमलनाल का निष्क्रिय होना और जल से तृप्त कीचड़ होने पर कमलनाल का पुन: विकसित होना भी हृदय सादृश्य ही होता है।
Heart: सुश्रुत में धमनी पर राय
यदि धमनी बहुत अधिक अवरोध है तो भी घबराने वाली बात नहीं देखिए सुश्रुत क्या कहते हैं :-
यथार्थ मूष्मणा युक्तो वायु स्रोतांसि दारयेत।। सु.शा. 4/28।।
अर्थात् यदि शरीर में अन्दर-बाहर विचरण करने वाली वायु को ऊष्मा से युक्त कर उसकी संचरण क्रिया आवश्यकतानुसार तीव्र, मध्यम या मन्द की जाय तो बन्द हुए मार्गस्रोत खुलने लगते हैं और हृदय सामान्य कार्य करने लगता है। यह कार्य औषधीय थेरापी और औषधियों के प्रयोग से सम्भव होने लगता है। यही है आयुर्वेदिक कार्डियोलॉजी प्राकृतिक बायपास। धमनी अवरोध होने मात्र से किसी की मृत्यु नहीं होती देखिए इस बात के लिए सुश्रुत क्या कहते हैं-
पंचाभि भुतास्त्वथ पँचकृत्वा पंचेंद्रियं पंचसु भावयन्ति।
पंचेंद्रियं पंचसु भावयित्वा पंचतत्वमायान्ति विनाशकाले।। सु.शा. 9/11
अर्थात् जिस प्रकार शरीर की उत्पत्ति पंचभूतों से होती है तो धमनियां भी पंचभूतात्मक होती हैं। इन पंचभूतों का संबन्ध पाँचों ज्ञानेंद्रियों से होता है तो धमनियों का संबन्ध भी पंचभूतों से होने के कारण ज्ञानेंद्रियों से भी होता ही है। यह संबन्ध निरन्तर बना रहता है। जब मृत्यु होती है तो सबसे पहले इन धमनियों का सम्बन्ध ज्ञानेंद्रियों से टूटता है इसके बाद इन्द्रियों का सम्बन्ध मन से टूटता है फिर ये घटक पंचमहाभूतों में मिल जाते हैं तब मृत्यु होती है। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर आचार्य सुश्रुत बताते हैं कि चिकित्सक के पास रोगी को बचाने के 3 अवसर होते हैं।
1. यदि धमनियों का इन्द्रियों से संयोजन बिगड़ रहा है तो उसे ठीक करें।
2. यदि धमनियों का संयोजन बिगड़ चुका है किन्तु मन का संयोजन नहीं टूटा है तो पहचान कर उसका उपचार करें और रोगी को बचायें।
3. यदि धमनी इन्द्रिय मन और आत्मा का सम्बन्ध नहीं टूटा है तो अभी भी कठिन प्रयास से रोगी बच सकता है।
हजारों साल पहले सुश्रुत ने बताया था-
हृद्यमिति कृतवीर्यो बुद्धेर्मनसश्च स्थानत्वाद।। स.शा.।।
हृदय का मौलिक सम्बन्ध बुद्धि और मन से होता है। फिर वाग्भट्ट ने पाया बुद्धि और मन बहुत ही नजदीकी सम्बन्ध रखते हैं-
सत्वादिधाम हृदयं स्तनरोकोष्ठ मध्यमम।। अ.हृ.शा.4/13।।
अमेरिका के एक जर्नल न्यूरोलॉजी में अमेरिकी हॉर्ट एसोसिएशन ने स्पष्ट लिखा है कि जो कारण दिल को बीमार करते हैं वे मन और मष्तिष्क की सेहत पर भी असर डालते हैं। हार्ट के मामले में भारतीय चिकित्सा वैज्ञानिकों की खोज कितनी श्रेष्ठ है। फिर तो स्वयमेव सिद्ध हो जाता है कि यदि रोग निदान ठीक होता है तो उपचार हेतु खोजी गई आयुष औषधियाँ और तरीके भी उपयुक्त होते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी जी का कथन- 20वीं सदी पश्चिम की और चिकित्सा पद्धति एलोपैथी की थी किन्तु 21वीं सदी और आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का समय भारत का होगा, स्वयमेव बिल्कुल सही सिद्ध होता है।
