नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु और एमएस रमैय्या मेडिकल कॉलेज के वैज्ञानिकों की नई खोज कैंसर मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आई है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जो अल्ट्रासाउंड की मदद से कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाकर खत्म कर सकती है। इसकी खूबी यह भी है कि इससे स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचने का खतरा बेहद कम होता है। कैंसर के लिए सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी जैसे इलाज मौजूद हैं, लेकिन स्वस्थ कोशिकाएं भी प्रभावित होती हैं। इससे मरीजों को दर्द, कमजोरी और स्वास्थ्य से जुड़ी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
असरदार तकनीक
रिपोर्ट के अनुसार इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस में असिस्टेंट प्रोफेसर अजय तिजारे और उनके सहयोगियों की टीम ने पाया है कि मुंह के कैंसर की कोशिकाएं अल्ट्रासाउंड से पैदा होने वाले हल्के यांत्रिक दबाव को सहन नहीं कर पातीं। इसकी वजह एक खास प्रोटीन ट्रोपोमायोसिन 2.1 का कम होना है। यह प्रोटीन सामान्य कोशिकाओं को दबाव सहने में मदद करता है लेकिन कैंसर कोशिकाओं में इसकी कमी उन्हें कमजोर बना देती है। यही कारण है कि अल्ट्रासाउंड के असर से कैंसर कोशिकाएं मरने लगीं, जबकि स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान नहीं पहुंचा। वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि अल्ट्रासाउंड कैंसर कोशिकाओं के फैलने की क्षमता को कम कर सकता है। इतना ही नहीं, यह ट्यूमर के आसपास बनी उस घनी परत को भी कमजोर कर सकता है, जो दवाओं और शरीर की प्रतिरक्षा कोशिकाओं को ट्यूमर तक पहुंचने से रोकती है। यानी यह तकनीक भविष्य में इलाज को और असरदार बनाने में मदद कर सकती है। इस खोज से जुड़े नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल मैटेरियल्स टुडे बायो में प्रकाशित हुए हैं।
फैलने से रोकना संभव
शोधकर्ताओं के मुताबिक सबसे खास बात यह रही कि अलग-अलग मरीजों से ली गई कैंसर कोशिकाओं में भी अल्ट्रासाउंड का असर लगभग एक जैसा देखा गया। करीब-करीब सभी कैंसर कोशिकाएं इसके प्रति संवेदनशील रहीं, जबकि सामान्य कोशिकाओं पर असर बहुत कम पड़ा। रिसर्च की सबसे बड़ी बात यह है कि यह तकनीक कैंसर को फैलने से रोकती है। आमतौर पर कैंसर ट्यूमर के चारों ओर कोशिकाएं एक मजबूत सुरक्षा कवच बना लेती हैं, जिससे दवाइयां या शरीर की प्रतिरक्षा कोशिकाएं कैंसर के केंद्र तक नहीं पहुंच पातीं। अल्ट्रासाउंड की मैकेनिकल ताकत इस मजबूत सुरक्षा कवच को भी छिन्न-भिन्न कर देती है, जिससे भविष्य में दवाओं का असर सीधे ट्यूमर पर हो सकेगा। यह अध्ययन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे किसी विदेशी लैब की पुरानी सेल लाइन्स पर नहीं, बल्कि भारतीय मरीजों के वास्तविक ट्यूमर सैंपल्स पर टेस्ट किया गया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि अलग-अलग स्टेज के मरीजों से लिए गए सभी कैंसर सेल्स पर अल्ट्रासाउंड का एक जैसा घातक असर हुआ, जबकि सामान्य कोशिकाएं सुरक्षित रहीं।
भविष्य के लिए खुली नई राह
चूंकि अल्ट्रासाउंड एक नॉन-इनवेसिव तकनीक है और पहले से कई चिकित्सा प्रक्रियाओं में इस्तेमाल होती है, ऐसे में इसका क्लिनिकल ट्रायल और इस्तेमाल आसान होगा। इसलिए यह खोज आगे चलकर मुंह के कैंसर के लिए ज्यादा सुरक्षित और लक्षित इलाज का रास्ता खोल सकती है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि आने वाले समय में इस तकनीक का सफल उपयोग न सिर्फ ओरल कैंसर, बल्कि ब्रेस्ट और स्किन कैंसर के इलाज को भी सुरक्षित और अचूक बनाने में किया जा सकेगा।
