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मन की बात / Mind Matter

बहस…डॉक्टर-मरीज संबंधों पर हो फिर से विचार

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। कुछ दिनों से लगातार social media पर डॉक्टर्स और कॉरपोरेट हॉस्पिटल के बारे में लोगो की राय देख रहा हूं। बहुत अचंभित हूं देखकर कि कितनी नेगेटिव सोच है लोगों में।

डॉक्टरी की पढ़ाई समर्पण से संभव

क्या आप जानते हैं कि डॉक्टर बनने के लिए कितने साल अपने आप को दुनिया से अलग-थलग रहकर एक तपस्वी की भांति किताबों में डूबे रहना पड़ता है? समाज से कटकर धैर्यपूर्वक ज्ञान को अर्जित करते हुए अपने जीवन को संपूर्ण समर्पित कर देना पड़ता है इस पेशा में। पेशा इसलिए कि सरकार ने इसे इसी श्रेणी में रखा है। अगर डॉक्टर लुटेरा, चोर और हत्यारा है तो कृपया कर डॉक्टर के यहां न जाएं। हमें भी ऐसे मरीजों के इलाज में कोई दिलचस्पी नहीं।

अस्पताल खोलना बड़ी चुनौती

क्या आप जानते हैं कि एक अच्छे वेंटीलेटर की कीमत 12 से 15 लाख है? ICU में छोटे-छोटे उपकरण की कीमत लाखों में होती है और एक ICU के निर्माण में करोड़ों का खर्च आता है। एक पढ़ने लिखने वाला साधारण मनुष्य जब डॉक्टर बनता है तो एक अस्पताल खोलना कितनी बड़ी चुनौती होती है? और सरकार के नियम-कानून के पचड़े में कितनी जगहों से उसे पास कराना होता है? लंबी-चौड़ी कागजी प्रक्रिया। परंतु मरीज का इलाज सस्ता हो, इसकी उम्मीद सबों को होती है। आप बड़े-बड़े multiplex, showrooms, resturents में पूरा पेमेंट करेंगे परंतु डॉक्टर के यहां तो छूट चाहिए ही। और यहां तक कि कपड़े, जूते तो ब्रांडेड लेना पसंद करेंगे परन्तु दवाई जेनेरिक हो और कम से कम खर्च में ऑपरेशन हो। यहां ICU में अगर 5000 से 7000 का खर्च आया कि आप लुटेरे हो गए। और सब कुछ के बाद सुविधाओं की शिकायत। सुविधा चाहिए 5 स्टार, तो कॉरपोरेट हॉस्पिटल तो हैं ही। बड़े अस्पताल में इलाज कराना स्टेटस सिंबल भी तो है। तो फिर शिकायत क्यों?

चयन आपका, फिर शिकायत किससे?

मैं ऐसे बहुत सारे मरीजों को जानता हूं जो बड़े गर्व से मुझे सुनाते हैं कि मैं इधर-उधर इलाज नहीं कराता। मेरा इलाज तो पारस हॉस्पिटल से होता है। आप अपनी इच्छा से अपने अस्पताल या डॉक्टर का चयन करते हैं तो फिर शिकायत किससे? अगर सुविधा खोजेंगे तो उसके लिए खर्च से डरना कैसा? और दलालों के चक्कर में तो पढ़े-लिखे लोग भी आ जाते हैं। डॉक्टर की बात न मानकर एंबुलेंस चालक, कंपाउंडर और फर्जी लोगों के बातों में आकर रोज ही लोगों को मरते देखता हूं। कुकुरमुत्ते की तरह खुले हुए फर्जी अस्पताल और फर्जी चिकित्सकों की भरमार तो है ही जिससे चिकित्सा पेशा बदनाम हो रही है। डॉक्टर बनना तो बड़ा आसान हो गया है। किसी डिग्री वाले डॉक्टर के साथ कुछ दिन काम करिए और बन जाइए डॉक्टर। पढ़ने की जरूरत कहां? मैट्रिक फेल डॉक्टर की कमी थोड़े है? और उनके पास इतना ज्ञान की समाज से कटकर धैर्यपूर्वक ज्ञान को अर्जित करते हुए अपने जीवन को संपूर्ण समर्पित कर देना पड़ता है इस पेशा में। पेशा इसलिए कि सरकार ने इसे इसी श्रेणी में रखा है। लोगों को समझाने में इतने कुशल की बड़े-बड़े ज्ञानवान पुरुष भी उनके झांसे में आ जाते हैं।

विश्वास का रिश्ता कलंकित न हो

मैं इस विषय पर डिबेट कर सकता हूं। इस पर परिचर्चा तो होनी ही चाहिए ताकि मरीज और डॉक्टर के बीच जो विश्वास का रिश्ता होता है वो कलंकित न हो। कभी कोई चिकित्सक नहीं चाहता कि उसका मरीज न बचे। हर डॉक्टर अपने ज्ञान, बुद्धि, विवेक से मरीज को बचाने का हर संभव प्रयास करता है परंतु हमेशा सफल हो, ये जरूरी नहीं। कोई अमर नही है। चिकित्सा पेशा को बदनाम करने वाले अपने बच्चों को कभी डॉक्टर बनाने की कोशिश न करें। क्यों अपने बच्चो को चोर, लुटेरा, हत्यारा बनाना चाहेंगे भला? टूटते विश्वास को देखकर दुखी होता हूं।
समाज को सोचना होगा
आज समाज को इस विषय पर पुनः सोचने की जरूरत है अन्यथा हम अपना अहित ही करेंगे।

रजनीश कुमार झा के फेसबुक वाल से

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