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विमर्श : बीमारी देकर उसका प्रबंधन करना कितना उचित?

विश्व कैंसर दिवस पर खास
डॉ. अभिलाषा द्विवेदी

नयी दिल्ली। आज विश्व कैंसर दिवस है। थीम के अनुसार कैंसर ट्रीटमेंट और केयर की कमी दूर करने की योजनाओं पर कार्य होगा। जितनी आधुनिक सुविधाएं, जितना बाजारवाद, उतनी ही लाइलाज बीमारियां। फिर उनके इलाज का बाजार। किसी भी चिकित्सा पद्धति में शरीर को जिन विजातीय तत्वों से बचाने की अनुशंसा की जाती है, आज बाजार उन्हीं सब का घालमेल परोस रहा है। डिब्बाबंद, प्रॉसेस्ड भोजन, अल्कोहल, कार्बाेनेटेड पेय रसायन युक्त अनाज, फल और सब्जियाँ , कृत्रिम हॉर्माेन युक्त डेयरी उत्पाद। प्रॉसेस्ड मीट का कार्सिनोजेन कम्पाउंड, पेट और कोलोरेक्टल कैंसर का खतरा बढ़ा सकता है। फार्म में कृत्रिम हॉर्माेन देकर तैयार एनिमल प्रोडक्ट भी कैंसर रिस्क का महत्वपूर्ण कारण हो सकते हैं।
कई प्रतिष्ठित संस्थाओं में हुए कैंसर संबंधी शोध यह भी कहते हैं कि अत्यधिक रिफाइंड चीनी और कार्ब्स का प्रयोग भी कैंसर को दावत देने के समान हैं। जो कई मरीजों में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन को बढ़ाने के कारक पाए गए हैं। अधिकतर रेडी टू कुक खाद्य पदार्थों के पैकेट्स में केमिकल बिस्फेनॉल ए (BPA) होता है। जो उस भोजन के पकने पर घुल जाता है। यह कंपाउंड न सिर्फ व्यक्ति के लिए हार्माेनल असंतुलन का कारण बन सकता है बल्कि यह व्यक्ति के डीएनए में बदलाव और कैंसर का कारण बन सकता है जो लगातार देखने में आ ही रहा है।
मात्र आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं बढ़ाना उद्देश्य क्यों है?
व्यक्ति को कंज्यूमर कहने वाला बाजार, व्यक्ति को ही कंज्यूम कर रहा है।
हालाँकि आयुर्वेद में उर्बुद, कर्कट रोग का उल्लेख है जिसमें आत्म संयम, नियम, आहार, उपचार की बात कही गई है। आज भी कैंसर के कारकों में शारीरिक और मानसिक दोनों समान रूप से उत्तरदायी माने जाते हैं।
समस्या के मूल का समाधान होना चाहिए न कि समस्या बढ़ाकर उसका प्रबंधन किया जाना चाहिए।

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