स्वस्थ भारत मीडिया
नीचे की कहानी / BOTTOM STORY

संपादकीय : हिंदी में मेडिकल शिक्षा गुमनामी में क्यों?

संपादकीय : हिंदी में मेडिकल शिक्षा गुमनामी में क्यों?

अजय वर्मा

हिंदी में तीन साल बाद भी स्पीड नहीं पकड़ी गई है। इसे तेजी से दाखिल करने के लिए आस्केलवने प्रॉमिस भी हो रहे हैं। मसलन मध्य प्रदेश में वार्षिक वार्षिक परीक्षा में 50 प्रतिशत की छूट, टॉप करने वालों को अधिकतम दो लाख का पुरस्कार आदि। याद रहे कि 2022 में इस कोर्स की शुरुआत हुई थी। इसके बाद इसे छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार आदि में भी लागू किया गया।
हाल यह है कि एमपी के सभी 18 सरकारी मेडिकल बैचलर में तीसरे साल तक की हिंदी किताबें उपलब्ध हैं, लेकिन केवल 10-15 प्राइवेट छात्र ही चुनते हैं। हिंदी में परीक्षा देने वाला तो कोई नहीं है। 10 करोड़ से ज्यादा खर्च किये जा चुके हैं। बिहार में पिछले साल करीब 20 राजकीय प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों ने हिंदी में कोई परीक्षा नहीं दी। छत्तीसगढ़, यूपी और राजस्थान में भी यही हाल है।
इस योजना की कम लागत का क्या कारण हो सकता है? क्या स्थानीय भाषा में पढ़ाई करने से इतिहास और लेखन सीमित हो सकता है? क्या हिंदी में कोर्स करना छात्रों के लिए जीवन भर सीमित हो सकता है?
असलियत का मकसद नए युवा छात्रों की उन कहानियों को कम करना है जो वे मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने के बाद झेलते हैं। अपनी पहली भाषा में तराजू से मिलना आसान हो सकता है।
एक तर्क यह भी है कि जब जापान, चीन, फ्रांस और जर्मनी अपनी मातृभाषा में चिकित्सा पढ़कर भी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं? तो दूसरा कि भारत की संयुक्त राष्ट्र से अलग है। कुछ इसे एक भाषा के आधारभूत चरण माना जाता है क्योंकि ग्लोबल स्केल के रोज़मर्रा के दौर में एक साझा में विचारों का समावेश-सतह बहुत आवश्यक है। यह दार्शनिकों के लिए उनके शिष्यों के बजाय उनके शिष्यों की स्थापना की जा सकती है क्योंकि विज्ञान लगातार बदल रहा है और आधुनिक चिकित्सा के विद्वानों को ऐसी भाषा में सहज होना चाहिए जिसे दुनिया भर में स्थापित करना और उपयोग करना उचित हो।
एक तर्क यह भी है कि गैर-अंग्रेजी भारतीय समुद्र तट में उपयोगी पुस्तकें या अध्ययन सामग्री तैयार करना मुश्किल है क्योंकि अधिकांश स्थानीय समुद्र तटों की संरचना और भाषा संस्कृत से काफी प्रभावित है। इसके लिए हर समाज से लेकर हर स्तर तक संचार के बारे में व्यापक सोच में बदलाव नहीं आता है, किसी एक क्षेत्र तक सीमित सुधार से प्रतिक्रिया ही होती है।
एक जरूरी और तर्क- उच्च शिक्षा में क्षेत्रीय समुद्रों का उपयोग उपयोगी बनाने के लिए उस भाषा में शोध पत्रिकाएँ भी होनी चाहिए। फ़्रेंच, जर्मन, स्वीडिश, चीनी, रूसी और जापानी में गुणवत्ता पूर्ण वैज्ञानिक जर्नल मौजूद हैं। चिकित्सा एक विकसित अस्तित्व वाली विज्ञान है और शिष्यों को लगातार अपना ज्ञान अपडेट करना है।
बोलो या दुर्भाग्य से, भारत में 20 के करीब प्रमुख भाषाएं हैं लेकिन अमेरिका में बोलने वाली एकमात्र भाषा अंग्रेजी है, जो देश की मूल भाषा नहीं है। इस बहुभाषी देश में एक और आम भाषा बनाना मुश्किल होगा। उत्तर और दक्षिण के बीच सदैव समानताएं रहेंगी। यदि हमें अपने देश में शिक्षा के माध्यम के रूप में एक ही भारतीय भाषा अपनानी है, तो हमें पहले एक सामान्य भाषा बनानी होगी। एलोपैथ जैसी विदेशी चिकित्सा धारा को हिंदी या किसी और मातृभाषा में प्रस्तुत करना कठिन और श्रमसाध्य है। चौधरी की शिक्षा के लिए जो जांच होती है, उसकी आकृति भी अजीब है। सामान्य श्रेणी के छात्रों के लिए कटऑफ अधिक से अधिक होती है। जाहिर है कि वे तकनीकी शिक्षा के अंग्रेजी परामर्श का दबाव सहने के लिए मानसिक रूप से तैयार होते हैं। जबकि ऑरिजिनल रेंज के छत्रों को कम से कम नंबर में भी चुना जाता है। उनके लिए यह दबाव अधिक होगा। इससे मुक्ति के लिए मातृभाषा में पढ़ने का विकल्प तैयार किया गया।
इस मामले में दिग्गज विद्वानों का भी मानना ​​है कि मेडिकल शिक्षा की भाषा अंग्रेजी में ही है। छात्रों के लिए आदर्श स्तर को बेहतर माना जा सकता है लेकिन सुखद परिणाम मिलना संभव नहीं है। यह सुखद परिणाम देखने के लिए 10 साल की प्रतीक्षा करनी होगी।

Related posts

नॉन कोविड-19 मरीजों को इमरजेंसी में देखना अनिवार्य नहीं तो…

Ashutosh Kumar Singh

Dr. Harsh Vardhan hails the NMC Act 2019 as historic, path-breaking and a game-changer

Ashutosh Kumar Singh

वैज्ञानिक रूप में कायम है योग का अस्तित्व

admin

Leave a Comment