नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। संडे हो या मंडे, रोज खाओ अंडे…इस मुहावरे की अब वाट लगने वाली है। ऐसा अंडों में नाइट्रोफ्यूरान (Nitrofuran) नाम के प्रतिबंधित एंटीबायोटिक मिलने के बाद हुआ है। इसको लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने तुरंत एक्शन लिया। उसने सभी राज्यों को निर्देश दिया गया कि वे ब्रांडेड और अनब्रांडेड, दोनों तरह के अंडों के सैंपल इकट्ठा कर जांच कराएं।
अंडा: भारत में बैन
बताया जाता है कि नाइट्रोफ्यूरान एक तरह का एंटीबायोटिक है, जो मुर्गियों और दूसरे खाद्य पशुओं में इस्तेमाल करने के लिए भारत में पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसका कारण यह है कि इसके अवशेष अंडों और मीट में लंबे समय तक रह सकते हैं। ज्यादा मात्रा में या लंबे समय तक संपर्क में आने से यह कैंसर का खतरा बढ़ा सकता है। इसके अलावा एलर्जी, सांस की तकलीफ, उल्टी-दस्त, लीवर और किडनी को नुकसान पहुंच सकती है। मुर्गियां बीमार न हों, अंडों व चिकन का बढ़िया उत्पादन हो, इसके लिए मुर्गी फार्म वाले इसका इस्तेमाल करते हैं। यह दवा है जो भारत में प्रतिबंधित है क्योंकि वो जीन टॉक्सीसिटी से जुड़ा है यानी डीएनए को नुकसान पहुंचा सकता है। FSSAI के मुताबिक इस केमिकल की थोड़ी सी भी मात्रा की अनुमति नहीं है।
अंडा: सतर्कता के आदेश
मालूम हो कि दिल्ली में अंडों में हानिकारक नाइट्रोफ्यूरान पाए जाने के बाद केंद्र सरकार ने देशभर में सैंपल लेने व जांच के आदेश दिए हैं। इसके बाद जिलों में सतर्कता के तौर पर जांच अभियान चलाया जा रहा है। मुंबई के सर्जन डॉ. मनन वोरा बताया कि एक खास ब्रांड के अंडों की जांच में नाइट्रोफ्यूरान और नाइट्रोइमिडाजोल जैसे प्रतिबंधित पदार्थ मिले हैं। पोल्ट्री फार्मिंग में इन रसायनों का इस्तेमाल गैरकानूनी है। इनका इस्तेमाल मुर्गियों को संक्रमण से बचाने और ज्यादा से ज्यादा अंडों के उत्पादन लिए उन्हें स्थिर रखने के लिए किया जाता है, जो कि पूरी तरह गलत है। उनके मुताबिक रिपोर्ट में ‘नाइट्रोफ्यूरान मेटाबोलाइट’ का स्तर 0.7 पाया गया, जबकि आदर्श रूप से यह 0.4 से कम या बिल्कुल शून्य होना चाहिए था। उन्होंने कहा कि जहां दूसरे देशों में इन केमिकल्स के लिए ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति है, वहीं भारत में FSSAI कुछ हद तक (1.0 तक) इनकी अनुमति देता है।
