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El Nino: दुनिया बन जाएगी जलता चूल्‍हा: UN चीफ

El Nino: दुनिया बन जाएगी जलता चूल्‍हा: UN चीफ

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। मौसम के मोर्चे पर मौजूदा साल और 2027 में दुनिया को बड़े संकट का सामना करना पड़ सकता है। मौसम विज्ञानियों ने अपने एक नए अनुमान के आधार पर चेताते हुए कहा है कि इस साल बनने वाला अल नीनो (El Nino) अब तक का सबसे शक्तिशाली अल नीनो हो सकता है। यह घटना दुनियाभर में तापमान को रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ाएगी, जिसका सीधा असर खेती-बाड़ी को नुकसान से लेकर पानी की कमी होने तक में देखने को मिलेगा। लाइव साइंस की रिपोर्ट के मुताबिक यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट (ECMWF) का अनुमान है कि अल नीनो के चलते इस साल दिसंबर तक मध्य भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के इलाके में समुद्री सतह का तापमान औसत से 5.4 डिग्री फारेनहाइट (3 डिग्री सेल्सियस) तक बढ़ सकता है। कुछ अनुमानों में तापमान 7.2°F (4°C) से ऊपर जाने की संभावना जताई गई है। प्रशांत महासागर में बन रहा ‘अल नीनो’ अब तक का सबसे शक्तिशाली अल नीनो हो सकता है। इसे फिल्मों से लिया गया एक निकनेम भी दिया गया है- ‘गॉडजिला अल नीनो’।

El Nino तोड़ेगा रिकॉर्ड

ECMWF के अनुमान सही साबित होने का मतलब यह होगा कि इस साल का अल नीनो (प्राकृतिक जलवायु चक्र का गर्म चरण) दुनियाभर में तापमान को बहुत ज्यादा बढ़ा देगा। यह 2015-2016 और 1997-1998 के पिछले रिकॉर्ड-धारक अल नीनो से कहीं ज्यादा शक्तिशाली होगा। पिछली दो अल नीनो घटनाओं के दौरान ‘नीनो 3.4 इंडेक्स’ में तापमान औसत से 4.1°F (2.3°C) ऊपर चला गया था। वॉशिंगटन पोस्ट के मौसम विज्ञानी और ग्लोबल वेदर राइटर बेन नोल ने सोशल प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा है कि अब तकरीबन हर अनुमान +3°C से ऊपर जा रहा है और कुछ अनुमान तो +4°C से भी ज्यादा तापमान दिखा रहे हैं। यह अनुमान अब तक के सबसे शक्तिशाली अल नीनो की ओर इशारा करता है। इसे दुनिया को निश्चित ही एक चेतावनी की तरह लेना चाहिए।

El Nino: लगातार बढ़ रही गर्मी

अल नीनो की घटनाएं प्रशांत महासागर में अल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन (ENSO) प्राकृतिक जलवायु चक्र के रूप में हर दो से सात साल में होती हैं। अल नीनो के दौरान मध्य और पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान बढ़ता है। इससे ट्रेड विंड्स कमजोर पड़ती हैं और दुनियाभर में तापमान और बारिश के पैटर्न पर असर पड़ता है। पृथ्वी पर पिछली अल नीनो घटना जून 2023 से अप्रैल 2024 तक चली थी। इसने पहले से ही गर्म हो रही दुनिया में और गर्मी बढ़ाई, जिससे 2024 अब तक का सबसे गर्म साल बन गया और यह पहला ऐसा साल रहा जब तापमान में बढ़ोतरी ने 1.5°C (2.7°F) की सीमा को पार कर लिया। अल नीनो का एकमात्र असरदार जवाब संकट के बराबर क्लाइमेट एक्शन है। यानी फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता खत्म करना, रिन्यूएबल एनर्जी की ओर तेजी से बढ़ना, ज्यादा खतरे वाले लोगों की सुरक्षा करना और सभी के लिए अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लागू करना जरूरी है।

El Nino: यूएन चीफ ने दुनिया को चेताया

वर्ल्ड मेटियोरोलॉजिकल ऑर्गनाइजेशन (WMO) ने चेतावनी दी है कि इस क्लाइमेट पैटर्न के सितंबर से पहले बनने की संभावना 80 फीसद और नवंबर से पहले 90 फसद है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा है कि अल नीनो 90 फीसद निश्चितता के साथ आने वाले महीनों में हमारे दरवाजे पर दस्तक देने वाला है। दुनिया को इसे क्लाइमेट चेतावनी के तौर पर लेना चाहिए। गुटेरेस ने इस बात पर जोर दिया है कि यह पहले से ही खतरनाक रूप से गर्म हो रही धरती पर ज्यादा गर्मी बढ़ाएगा। उन्होंने कहा कि अल नीनो की स्थितियां गर्म होती दुनिया की आग में घी का काम करेंगी। इसके असर दूर-दूर तक फैलेंगे और बहुत तेजी से सीमाओं को पार करेंगे। ऐसे में एहतियाती कदम उठाना जरूरी है।

El Nino: भारत होगा प्रभावित

भारत के लिए मानसून सिर्फ एक मौसम नहीं है। भारत में सालाना बारिश का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा इसी से मिलता है और देश की आधे से ज्यादा खेती वाली जमीन सिंचाई के लिए बारिश पर ही निर्भर है। पिछली बार जब 2015-2016 में जबरदस्त अल नीनो आया था, तो भारत में औसत बारिश का सिर्फ 86 प्रतिशत ही हुआ था और देश सूखे की चपेट में आ गया था। देश के करीब 60 प्रतिशत किसान अपनी गर्मियों की फसलों के लिए इसी बारिश पर निर्भर हैं। कमजोर मानसून का असर सबसे पहले मिट्टी पर और उसके तुरंत बाद खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर दिखता है। देश में आज भी खाने-पीने की चीजों की कीमत बारिश से तय होती है। बारिश बेहतर होगी तो फसलों को सही मात्रा में पानी मिलेगा और देश में खाने-पीने की चीजें सही मात्रा में उपलब्ध हो सकेंगी।

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