नयी दिल्ली स्वस्थ भारत मीडिया। गाजियाबाद के हरीश राणा को दिल्ली के एम्स में इच्छामुत्यु (Passive Euthanasia) मिल गयी हालांकि वह बहुत कष्टकारी रहा। वे बीते 13 साल से कोमा में थे। सुप्रीम कोर्ट ने बीते दिनों उन्हें इच्छामृत्यु की इजाजत दी थी। वे एक सप्ताह से बिना खाना और पानी के जीवित थे। यह एक जटिल और संवेदनशील मामला था। भारत में इस तरह का यह पहला मामला रहा जब इच्छामृत्यु की इजाजत कोर्ट ने दी हो हालांकि इसके लिए लंबे समय से संघर्ष चल रहा था।
इच्छामृत्यु: 13 साल कोमा में
मालूम हो कि हरीश चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। 2013 में वह अंतिम वर्ष के छात्र थे। इसी दौरान अगस्त 2013 में रक्षाबंधन वाले दिन बहन से मोबाइल फोन पर बात करते हुए पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे। गंभीर रूप से घायल हरीश को तुरंत पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती कराया गया। बाद में दिसंबर 2013 में उसे दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने बताया कि वह क्वाड्रिप्लेजिया से ग्रसित है। इस स्थिति में उसके हाथ-पैर पूरी तरह निष्क्रिय हो गए और वह जीवन भर बिस्तर पर रहने को मजबूर हो गए। हरीश के असहनीय दर्द और शारीरिक अक्षमता के कारण माता-पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की अपील की जिसे 8 जुलाई 2025 को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। इसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। करीब आठ महीने बाद 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी।
इच्छामृत्यु: 42 साल रही अरुणा
यहां इस इच्छामृत्यु के अधिकार को लेकर चले संघर्ष की चर्चा करना प्रासंगिक होगा। 2011 में अरुणा शानबाग केस ने देश में इच्छामृत्यु को लेकर पहली बार प्रयास किया गया क्योंकि 2009 में एक पत्रकार में अरुणा शानबाग की तरफ से इच्छा मृत्यु की याचिका दायर की गई थी पर चूंकि वो बिना मशीनों के भी प्राकृतिक रूप से सांस लेने में सक्षम थी इसलिए न्यायालय ने उनकी याचिका अस्वीकार कर दी पर सवाल ये उठता है कि क्या केवल साँस लेने को जीवित होना मान सकते हैं…? अरुणा शानबाग निर्दोष होते हुए भी शापित जीवन जीने को मजबूर थी। 1973 में मुम्बई के KEM अस्पताल में एक वार्डबॉय सोहनलाल वाल्मीकि ने उनपर हमला किया, रेप किया और कुत्ते की चैन से गला घोंटने के प्रयास ने अरुणा शानबाग के ब्रेन को ऑक्सीजन सप्लाई बाधित कर दी। बलात्कार की पुष्टि न हो पाने के कारण वार्डबॉय 7 सालों की सजा के बाद छूट गया पर पीड़िता आजीवन सजा भोगने को मजबूर थी। 42 साल तक कोमा में रहने के बाद उनकी 2015 में प्राकृतिक मृत्यु होती है जबकि देश मे यदि एक्टिव यूथेनेशिया का प्रावधान होता तो इतने वर्ष तक जिंदा लाश बनकर जीने की बजाय एक मीठी नींद सुलाकर उनकी आत्मा को मुक्त किया जा सकता था।
इच्छामृत्यु: करिबासम्मा का संघर्ष

इस प्रसंग में कर्नाटका के दावनगेरे की एच बी करिबासम्मा का उदाहरण सामने है जो फिलहाल 86 साल की हैं। पेशे से स्कूल शिक्षक रहीं करिबासम्मा 1995 में रिटायर हुईं, 1996 में उन्हें स्लिप डिस्क की बीमारी हुई, तीन महीने से ज्यादा वो बिस्तर पर रहीं। इस तकलीफ ने ही उन्हें गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार के बारे में सोचने, जानने और इसके लिए संघर्ष करने को प्रेरित किया। इस दौरान थोड़ी बेहतर होने पर उन्होंने बिस्तर पर ही लेटे-लेटे दुनिया भर में गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार के बारे में पढ़ना शुरू किया। अरुणा शॉनबाग की कहानी भी उनके सामने थी, जो कर्नाटका से ही थीं। उन्होंने ऐसी ही अवस्था में गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार के बारे में लिखना शुरु किया जो अखबारों वगैरह में छपता रहा। फिर उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता प्रमिला नेसरगी जो एक जानी मानी कानूनी हस्ती रही हैं और असाध्य बीमारी से पीड़ित लोगों के अधिकारों के लिए जिसमें राइट टू डाई विथ डिग्निटी भी शामिल है, के लिए लड़ती रही हैं, उनका साथ मिला। प्रमिला नेसरगी ने उनके लिए लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़ी और पिछले 30 साल उनके साथ हैं।
इच्छामृत्यु: 98 में दायर की याचिका
फ़िलहाल करिबासम्मा दावनगेरे के निट्टुवल्ली में आश्रय फाउंडेशन ओल्ड एज केयर सेंटर में रहती हैं। 1996 से ही यह आश्रम ही उनका घर है। परिवार ने शुरु में साथ दिया लेकिन बाद में सबने उन्हें गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार की लड़ाई नहीं करने को कहा। उनके पति ने भी, जो अब नब्बे साल के हैं और चलने फिरने में असमर्थ हैं इसलिए करिबासम्मा से मिलने नहीं आ पाते। वे गांव में अपने बेटे के साथ रहते हैं। करिबासम्मा के खुद की कोई संतान नहीं है। बेटा उनके पति की दूसरी शादी से है। करिबासम्मा भारत में इस मुद्दे की प्रमुख कार्यकर्ता बनीं, खासकर 1998 में कर्नाटक हाई कोर्ट में याचिका दायर करने वाली पहली व्यक्ति के रूप में। 2025 में कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले को लागू करने वाला सर्कुलर जारी किया जिससे घातक बीमारी से पीड़ित, जीवन-रक्षक उपचार पर निर्भर और कोई सुधार की उम्मीद न होने वाले को पैसिव यूथनेशिया (लाइफ-सपोर्ट हटाने की अनुमति) का अधिकार मिला। यह एक्टिव यूथनेशिया (दवा देकर मृत्यु) नहीं है, बल्कि केवल जीवन रक्षा प्रणाली को हटाना है।
इच्छामृत्यु: आज भी संघर्ष जारी
करिबासम्मा को इस नीति का पहला लाभार्थी बनने की उम्मीद थी, लेकिन इस सन्दर्भ में जरूरी गाइडलाइंस के लिए अभी भी वह संघर्ष कर रही हैं। उन्होंने जनवरी 2026 में सरकार से अस्पतालों में मर्सी किलिंग वार्डस बनाने और दिशानिर्देश बनाने की मांग की। उन्होंने कहा कि अगर स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं आए तो वे 22 अप्रैल से आमरण अनशन शुरू कर सकती हैं। उनके अनुसार गरीब लोगों को अभी भी स्पष्टता नहीं है कि कहां जाएं, कैसे अप्लाई करें, प्रक्रिया क्या है। वे चाहती हैं कि सरकारी अस्पतालों में यह सुविधा हो, क्योंकि प्राइवेट अस्पताल महंगे हैं। अब इस डेडलाइन में 28 दिन और बचे हैं। इन बीच हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट पैसिव यूथनेशिया की मंजूरी दी। करिबासम्मा इस फैसले और दिशा निर्देश के अनुसार आगे अपना अभियान जारी रखने की बात कहती हैं।
इच्छामृत्यु: संघर्ष आज भी जारी
बड़ी बात कि करिबासम्मा के अभियान में गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार के लिए केवल कर्नाटका से 10 हजार लोगों ने हस्ताक्षर किया है। वह बताती हैं कि उनके आश्रम में 35 लोग रहते हैं जिनमें 20 की हालत ऐसी है जो बिल्कुल मृत्यु से भी बदतर है। वह खुद भी यही चाहती हैं। उन्हें हरवक्त किसी व्यक्ति की जरूरत है। सात साल पहले उन्हें गुदा कैंसर हो गया था, नित्य क्रिया उनके लिए अत्यंत कष्टदायक है, उनके बाहरी शरीर में थैली लगी है। वह कहती हैं कि गरिमापूर्ण मौत मेरी जरूरत है और मेरे जैसे लोगों की सेवा करने वाले लोगों की गरिमा के लिए भी। कहती हैं कि मैं सरकारी नौकरी में थी, मुझे पेंशन मिलती है, मैं घर से भी ठीक थी, अपना घर बेच दिया इस लड़ाई में, बाकी पैसा देश की सेना को दान किया, लेकिन मैंने गरीब लोगों का संघर्ष देखा है, उनके परिवार के लोगों का भी। सरकारें अगर ऐसे मरीजों की पूरी जिम्मेदारी लेती है क्या तब भी आप गरिमापूर्ण मौत के अधिकार के पक्ष में रहेंगी ? वह कहती हैं कि सरकारें कभी भी उतना सक्षम तरीके से काम नहीं करती।
