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महामारी के दौरान दो गज की दूरी जैसी सलाह पर हुआ शोध

नयी दिल्ली। छींकते या खांसने से लोग SARS-CoV-2 जैसे वायरस ले जाने वाली बूंदों को अपने आसपास के अन्य लोगों तक पहुंचा सकते हैं। लेकिन संक्रमित व्यक्ति से बात या भाषण में लार की बूंदों से भी संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है? महामारी के दौरान कहा भी जा रहा था-दो गज की दूरी, बहुत जरूरी। और इस कठिन सवाल को एक शोध दल ने सुलझाने की कोशिश की है।

छोटी बातचीत के दौरान भी कोरोना कैसे फैला?

बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ता, स्टॉकहोम में नॉर्डिक इंस्टीट्यूट फॉर थ्योरेटिकल फिजिक्स (NORDITA) और बेंगलुरु में इंटरनेशनल सेंटर फॉर थ्योरेटिकल साइंसेज (ICTS) की टीम ने उन परिदृश्यों की कल्पना की जिसमें दो नकाबपोश लोग दो, चार या छह फीट की दूरी पर खड़े हैं और लगभग एक मिनट तक एक-दूसरे से बात कर रहे हैं और फिर लार की बूंदों के एक से दूसरे में फैलने की दर और सीमा का अनुमान लगाया। उनके कंपप्यूटर सिमुलेशन से पता चला कि संक्रमित होने का जोखिम तब अधिक था जब एक व्यक्ति ने दो-तरफा बातचीत में लगे रहने की तुलना में निष्क्रिय श्रोता के रूप में काम किया।

शोध के नतीजे जर्नल में प्रकाशित

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस के साइंस जर्नल फ्लो में प्रकाशित एक शोध पत्र में अपने निष्कर्षों की रिपोर्ट करते हुए वैज्ञानिकों ने नोट किया कि दो-तरफा बातचीत एक व्यक्ति द्वारा एकालाप की तुलना में एयरोसोल एक्सपोजर को काफी कम कर देती है और कम बातचीत करने वाले व्यक्ति में असमान बातचीत से संक्रमण का खतरा काफी बढ़ जाता है। यह भी पता चला है कि बात करने वाले लोगों के बीच ऊंचाई के अंतर जैसे कारक वायरल ट्रांसमिशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सिमुलेशन में जब स्पीकर या तो एक ही ऊंचाई के थे या बहुत अलग आकार (एक लंबा और दूसरा छोटा) के थे तो संक्रमण का जोखिम ऊंचाई के अंतर की तुलना में बहुत कम पाया गया था। उनके परिणामों के आधार पर टीम का सुझाव है कि आंखों के संपर्क को बनाए रखते हुए अपने सिर को एक-दूसरे से लगभग नौ डिग्री दूर करने से वक्ताओं के जोखिम को काफी कम किया जा सकता है।

स्पर्शोन्मुख संचरण भी भी एक कारण

एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग में सहायक प्रोफेसर और संबंधित लेखकों में से एक सौरभ दीवान ने याद किया कि हालांकि COVID-19 महामारी के शुरुआती दिनों में विशेषज्ञों का मानना था कि वायरस ज्यादातर खांसने या छींकने के माध्यम से फैलता है। यह जल्द ही स्पष्ट हो गया कि स्पर्शोन्मुख संचरण भी COVID-19 का प्रसार करता है। भाषण प्रवाह का विश्लेषण करने के लिए उन्होंने और उनकी टीम ने एक कंप्यूटर कोड को संशोधित किया जिसे उन्होंने शुरू में क्यूम्यलस बादलों की गति और व्यवहार का अध्ययन करने के लिए विकसित किया था। सूजे हुए कपास जैसे बादल जो आमतौर पर धूप वाले दिन दिखाई देते हैं।

वायरल ट्रांसमिशन पर भी शोध की तैयारी

आईआईएससी के मुताबिक टीम की योजना है कि वक्ताओं की आवाज और उनके आसपास के वेंटिलेशन स्रोतों की उपस्थिति में अंतर का अनुकरण करने पर ध्यान केंद्रित किया जाए ताकि यह देखा जा सके कि वायरल ट्रांसमिशन पर उनका क्या प्रभाव हो सकता है। उन्होंने उचित दिशानिर्देश विकसित करने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति निर्माताओं और महामारी विज्ञानियों के साथ चर्चा करने की भी योजना बनाई है। अध्ययन दल में दीवान और रविचंद्रन के अलावा आईआईएससी के रोहित सिंघल और अंतर्राष्ट्रीय सैद्धांतिक विज्ञान केंद्र के राम गोविंदराजन शामिल थे।

इंडिया सायंस वायर से साभार

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