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साक्षात्कारः पीरियड का मुद्दा सिर्फ ‘दाग़’ और ‘दर्द’ तक सीमित नहीं है: स्वाती सिंह

स्वस्थ समाज की कल्पना हम एक स्वस्थ माहौल के बिना नहीं कर सकते हैं, जिसकी शुरुआत हमें आज से करनी होगी| पीरियड के मुद्दे पर देखा जाए तो आज भी अधिकाँश लड़कियां पहली बार पीरियड आने पर डर जाती है, क्योंकि इसके बारे में उन्हें पहले कुछ भी नहीं बताया जाता| ऐसे में ज़रूरी है कि किशोरियों को पीरियड के बारे पहले से प्रशिक्षित किया जाए, जिससे उनके पहले पीरियड का अनुभव उनके लिए डरावना न हो। 
मृणाल वल्लरी
मासिकधर्म पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के स्वास्थ्य, विकास और स्वच्छता से जुड़ा ऐसा विषय है जिस पर शर्म करना और चुप रहना हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है| स्वाती सिंह अपने कॉलेज के समय से ही इन मुद्दों पर सक्रिय रह चुकी थीं। उत्तर प्रदेश में वाराणसी के पास 30 गांवों में मासिक स्वास्थ्य पर काम करने के लिए ‘मुहीम’ नाम की संस्था बनाकर ‘पीरियड अलर्ट’ के लिए काम करने लगी।
ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे समय से मासिक धर्म स्वास्थ्य को लेकर काम करने वाली स्वाती सिंह कहती हैं कि ‘महिला स्वास्थ्य’ की तो आज भी हमारी किताब से लेकर हमारी सोच-जुबां इस विषय पर सिर्फ गर्भवती महिला तक सीमित है। इससे इतर अगर बात होती भी है तो महिलाओं से जुड़ी बिमारियों के बारे में। लेकिन ‘पीरियड’ जैसे मुद्दे आज भी हमारी किताब और जुबां से नदारद है।

समाज में हर जगह समस्या है, लेकिन अब इसे संयोग कहें या दुर्भाग्य कि जब समाज की किसी समस्या पर कोई फिल्म बन जाती है। ऐसा ही कुछ हुआ ‘पीरियड’ के संबंधित सेनेटरी पैड के मुद्दे पर बनी फिल्म पैडमैन के भी साथ

बाज़ार में सेनेटरी पैड और उनके खरीदार तो मौजूद है लेकिन सवाल ये है कि इस विषय पर खुलकर बात करने वाले और इस खुली बात को सुनने वाले कितने है? पीरियड के मुद्दे को हमेशा से ही हमारे समाज में शर्म का विषय माना जाता रहा है। इसपर बात करना करना गंदी बात और इस दौरान ढ़ेरों परेशानियों के बावजूद चुप रहना लड़कियों की अच्छी बात मानी जाती है।
वैसे तो हमारे समाज में हर जगह समस्या है, लेकिन अब इसे संयोग कहें या दुर्भाग्य कि जब समाज की किसी समस्या पर कोई फिल्म बन जाती है। ऐसा ही कुछ हुआ ‘पीरियड’ के संबंधित सेनेटरी पैड के मुद्दे पर बनी फिल्म पैडमैन के भी साथ| चूँकि फिल्म एक नये विषय पर थी, इसलिए प्रमोशन का तरीका भी कुछ नया रहा| सोशल मीडिया के ज़रिए पैड के सेल्फी पोस्ट करने की तकनीक को अपनाया गया, जिसे फ़िल्मी जगत से लेकर आमजन ने ऐसे बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जैसे इससे पहले लोगों को पीरियड के बारे में कुछ पता ही नहीं था। लेकिन ऐसा करने से क्या वाकई सेनेटरी पैड की उपलब्धता की समस्या हल हो सकती है? या फिर पीरियड पर लोगों की झिझक खत्म हो गयी? या फिर जिन लोगों ने पैड के साथ फोटो पोस्ट की क्या वे इस विषय पर अपने घर-समाज में बात करने लगे? इन सभी पहलुओं पर गौर करना ज़रूरी है।
स्वाती कहती हैं कि अगर अपने सालभर से अधिक ग्रामीण इलाकों में इस विषय पर लगातार काम करने के अनुभव के आधार पर कहूँ तो इस फिल्म ने भले से ‘पीरियड’ और सेनेटरी पैडशब्द को फैशन में ला दिया हो लेकिन इसका सरोकार से कोई वास्ता नहीं है।

पीरियडजैसे मुद्दे आज भी हमारी किताब और जुबां से नदारद है

इसने इस समस्या का समाधान सेनेटरी पैड के इस्तेमाल को बना दिया है और इसी तर्ज पर दबे स्वर में सेनेटरी पैड से टैक्स हटवाने, फ्री पैड डिस्ट्रीब्यूशन और वेंडिंग मशीन लगवाने जैसी भी बात की, जो इस विषय को एकबार फिर एक नये दायरे में समेटने जैसा है। एकतरफ तो इस प्राकृतिक प्रक्रिया को समस्या बना दिया और उसका समाधान पैड बता दिया, जिसे खत्म कर इससे जुड़े अन्य ज़रूरी पहलुओं को समझना बेहद ज़रूरी है|
 ग्रामीण क्षेत्र से दूर है सेनेटरी पैड
अभी तक हमलोगों ने आठ सौ से अधिक महिलाओं और किशोरियों के साथ सेनेटरी पैड के इस्तेमाल पर सर्वेक्षण किया गया, जिसमें यही पाया गया है कि ज़्यादातर महिलाएं सूती कपड़े का इस्तेमाल करती है न की सेनेटरी पैड का| साथ ही, जो महिलाएं सेनेटरी पैड खरीद सकती हैं, उनके साथ समस्या इस बात की है कि उन्हें यही नहीं पता कि इसका इस्तेमाल कैसे करना है। ऐसे में हमें ये समझना होगा कि आज भी हमारा देश गांवों में बसता है। यानी कि आधे से ज्यादा हिस्सा गाँव में निवास करता है, जो लगातार गरीबी और अशिक्षा से जूझता वर्ग है। ऐसे में, इस प्रक्रिया के प्रबन्धन के लिए हमें उन उपायों को चुनना होगा जिसके लिए महिलाएं किसी और पर निर्भर न रहे। सरल शब्दों में कहूँ तो जिन लोगों के पास दो जून की रोटी के लिए पैसा नहीं है वो सेनेटरी पैड कैसे खरीद पायेंगें? इसके लिए ज़रूरी है कि हम उन्हें खुद से सेनेटरी पैड बनाने और इसके निस्तारण के लिए प्रबंध तैयार करें, जो उनके स्वास्थ्य और प्रकृति दोनों के लिए हानिकारक न हो|
पीरियड का मतलब सिर्फ सेनेटरी पैड का इस्तेमाल नहीं
अब हमें ये समझने की ज़रूरत है कि पीरियड का मुद्दा सिर्फ ‘दाग़’ और ‘दर्द’ तक सीमित नहीं है| क्योंकि महिला के माँ बनने से लेकर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का पता माहवारी से लगाया जा सकता है और कई बार ये ढ़ेरों खतरनाक बिमारियों का कारण भी बनती है| ग्रामीण क्षेत्रों में इस विषय पर काम के लिए पहला कदम पीरियड से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने के लिए उठाना चाहिए क्योंकि वास्तविकता ये है कि हमारे समाज में महिलाओं को पीरियड संबंधित जानकारियों से ज्यादा इससे जुड़ी भ्रांतियों का ज्ञान होता है और जिनका पालन भी वो उम्र भर करती है, जो न केवल उनके शरीर को बल्कि उनके जीवन को प्रभावित करता है|

स्वस्थ समाज की कल्पना हम एक स्वस्थ माहौल के बिना नहीं कर सकते हैं, जिसकी शुरुआत हमें आज से करनी होगी|

स्वस्थ चर्चा है ज़रूरी
इसके साथ ही, इस विषय पर स्वस्थ चर्चा का माहौल बनाना भी बेहद ज़रूरी है| जब हम माँ पर गर्व करते है तो माहवारी पर क्यों नहीं? आज भी मध्यमवर्गीय परिवार में अधिकतर लड़कियां पहली बार पीरियड शुरू होने पर डर जाती है, क्योंकि उन्हें इसके बारे में कुछ भी बताया ही नहीं जाता| पीरियड शुरू होने के बाद उन्हें सेनेटरी पैड या सूती कपड़ा देकर, इस दौरान उन्हें खानपान और साफ़-सफाई में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए इन सब बारे में बताने के बजाय, इस दौरान उन्हें कौन से काम नहीं करने है इसके बारे में बेहद विस्तार से बताया जाता है, जिसे खत्म करना बेहद ज़रूरी है|
छह साल की बच्ची ने कहा, पीरियड से डरूंगी नहीं
स्वाती कहती हैं कि ‘एकबार आदर्श ग्राम नागेपुर में हमलोगों ने पीरियड पर ग्रामीण किशोरियों के साथ कला-प्रतियोगिता का आयोजन किया| पीरियड पर एक दिवसीय कार्यशाला के बाद इस प्रतियोगिता का आयोजन किया गया कि जिसमें 6 साल से लेकर 25 साल तक की किशोरियों ने हिस्सा लिया| वहां छह साल की एक बच्ची (जिसे लिखना भी ढंग से नहीं आता था) ने दूसरी लड़की की मदद से पीरियड पर एक चित्र बनाया, जिसमें उसने एक पैड का चित्र बनाकर उसपर लिखवाया कि ‘जब मेरा पीरियड आएगा तो मैं डरूँगी नहीं|’ उसकी ये बात एकदम दिल को छू जाने वाली थी।’
स्वस्थ समाज की कल्पना हम एक स्वस्थ माहौल के बिना नहीं कर सकते हैं, जिसकी शुरुआत हमें आज से करनी होगी| पीरियड के मुद्दे पर देखा जाए तो आज भी अधिकाँश लड़कियां पहली बार पीरियड आने पर डर जाती है, क्योंकि इसके बारे में उन्हें पहले कुछ भी नहीं बताया जाता| ऐसे में ज़रूरी है कि किशोरियों को पीरियड के बारे पहले से प्रशिक्षित किया जाए, जिससे उनके पहले पीरियड का अनुभव उनके लिए डरावना न हो।
इसी तर्ज पर ये कहना गलत नहीं होगा कि ‘पैडमैन’ जैसी फिल्म के ज़रिए इस विषय को तो उजागर किया गया, जो बेहद ज़रूरी और सराहनीय प्रयास है| लेकिन इसे सिर्फ सेनेटरी पैड के इस्तेमाल तक सीमित कर देना ‘बाज़ार’ को बढ़ावा देना मात्र है, न कि समस्या का हल, जिसे पैडमैन का पीरियड (जिसे उन्हें खुद के समझे सांचे में प्रस्तुत किया है) कहना कहीं से भी गलत नहीं होगा| अब जब इस विषय पर बात हुई ही है तो ज़रूरी है कि अपने देश-समाज के अनुसार इस मुद्दे से जुड़े पहलुओं पर काम हो।
(यह लेख मृणाल वल्लरी ने तैयार किया है, जो इससे पहले हिंदी अखबार जनसत्ता में प्रकाशित हो चुका है|)
 

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