नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। रूमेटोलॉजिस्ट डॉ. उमा कुमार के साथ बातचीत की पहली कड़ी में आपने जाना कि गठिया रोग बहुत सारी बीमारियों का लक्षण है। इस दूसरी कड़ी में नए दौर के बच्चों और बुजुर्गों की सेहत के बारे में डॉ. साहिबा ने विस्तृत जानकारी दी है। डॉ. उमा कुमार दिल्ली एम्स में इस विभाग की अध्यक्ष हैं। अब पढें The thermometer में उनसे अंतिम हिस्से की बातचीत।
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आशुतोष: बिना डॉक्टर की राय लिए खुद दवा खाने की प्रवृत्ति को आप किस रूप में देखती हैं और इससे कितना खतरा है?
डॉ. उमा: ओवर द काउंटर मेडिसिन नहीं लेनी चाहिए लेकिन यह भी असंभव है कि हर आदमी मेडिकल प्रोफेशनल से कांटेक्ट कर सके। किसी को बहुत तेज दर्द हो रहा है तो कितनी जल्दी वह कांटेक्ट कर सकता है। कभी-कभी संभव नहीं हो पाता। लोगों को यह जानना जरूरी है कि पेन किलर्स के बहुत साइड इफेक्ट्स होते हैं। भारत में किडनी फेल होने का एक बहुत बड़ा कारण पेन किलर भी है। अगर किसी को एक—आध दिन परेशानी हुई, दवा ले ली तो कोई बात नहीं। लेकिन अगर जरूरत बहुत ज्यादा पड़ रही है तो डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए। दर्द के लिए पेन किलर आप पैरासिटामॉल ले सकते हो। उसका बहुत साइड इफेक्ट नहीं है। बाकी जो बुजुर्ग हैं उनमें अल्सर बनने की संभावना बढ़ जाती है। अल्सर से उनको ब्लड लॉस होगा या खून की उल्टी या फिर लैट्रिन में खून आ सकता है। किडनी फेल होने की संभावना बुजुर्गों में बहुत ज्यादा होती है क्योंकि उम्र के साथ किडनी का फंक्शन भी बिगड़ता है। इसलिए सलाह यही रहेगी कि खुद पेन किलर ना लें। डॉक्टर की सलाह पर ही दवाएं लें। कॉम्बिनेशन की जगह इंडिविजुअल मेडिसिन ले लो। अगर किसी को मसल पुल हो गई है, मसल में स्पैजम है तो मसल रिलैक्सेंट की जरूरत है। अगर थोड़ा सा सोडियम या कोई भी उसके साथ जो कॉम्बिनेशन में ले रहे हैं तो उसकी जरूरत है।
आशुतोष्: एक पब्लिक हेल्थ से जुड़ा हुआ सवाल है और आपने कहा कि हेल्थ प्रोफेशनल्स तक पहुंचना आसान नहीं है। लोग झोलाछाप के पास चले जाते हैं। वो तीन-तीन चार—चार एंटीबायोटिक एक साथ लिख देते हैं। क्या इस तरह से दो-दो तीन-तीन एंटीबायोटिक्स एक प्रिस्क्रिप्शन पर लिखना कितना जरूरी है या इस पर विचार करने की जरूरत है?
डॉ. उमा: लोग एंटीबायोटिक अपने आप भी ले लेते हैं, डॉक्टर लिखें या ना लिखें। कोई भी विदाउट इंडिकेशन, विदाउट जस्टिफिकेशन किसी भी दवा को लिख रहा है तो वह गलत है। आज जहां हम एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की बात कर रहे हैं। ये एक बहुत बड़ा कारण है। पिछले दिनों स्टडी आई थी गंगा के पानी पर कि उसका बहुत लॉन्ग स्टैंडिंग इफेक्ट है। मानव और पशु तक प्रभावित हैं। इस पर चेकक्स एंड बैलेंससेस होने चाहिए। वो कैसे होंगे, ये पॉलिसी लेवल की बात है। यह एक दिन में नहीं हो सकते। अवेयरनेस की जरूरत है हर लेवल पर। रेगुलर अवेयरनेस प्रोग्राम्स की जरूरत है। हर लेवल पर ट्रेनिंग की जरूरत है। जहां तक बात है दो और तीन एंटीबायोटिक देना तो कुछ सिचुएशंस में वो देनी पड़ती है क्योंकि एक एंटीबायोटिक एक पर्टिकुलर बैक्टीरिया पर अच्छा काम करती है। दूसरी वाली दूसरे प्रकार के बैक्टीरिया पर कर रही होती है। लेकिन ये सिचुएशन हॉस्पिटल्स में आती है। एंटीबायोटिक्स का बहुत ही सावधानी से उपयोग करना चाहिए।
आशुतोष: एंटीबायोटिक्स को लेकर अभी जो गाइडलाइंस आयी थी उसमें कॉम्बिनेशन ड्रग्स को सरकार ने बैन कर दिया था फिर भी लिखे और बेचे जा रहे हैं। फिर सिंगल मॉलिक्यूल्स की बात कैसे समझाएंगे?
डॉ. उमा: किसी पेशेंट को अमोक्सिसलिन दे रहे हैं तो अमोक्सिलिन के असर को बढ़ाने के लिए दूसरी एंटीबायोटिक भी उसमें क्लब की जाती है। कॉम्बिनेशन अगर दिया जाता है तो वो जस्टिफाइड है। एक पेन किलर क्यों नहीं तो मेरे हिसाब से कॉम्बिनेशंस को यूनिवर्सल बैन नहीं कर सकते आप। मान लीजिए टीबी की दवा है। आमतौर पर पांच दवाइयां चलीं। अगर कॉम्बिनेशन है तो उसकी कंप्लायंस बढ़ जाएगी। ऐसे ही ब्लड प्रेशर की दवा है। अगर कोई रैशन कॉम्बिनेशन है तो उसमें क्या हर्ज है। पिल लोड कम होगा तो कंप्लायंस बढ़ेगी। कुछ ऐसे कॉम्बिनेशन है जिनका कोई जस्टिफिकेशन नहीं है। उस पर चर्चा करने की जरूरत है और वो बैन होने चाहिए।
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आशुतोष: जब तक कोई चीज उपलब्ध है और हम बोलें कि वो लेना नहीं है तो संभव नहीं है।एनपीपीए दवाइयों की एमआरपी तय करता है। उसके बाद कंपनियां उसमें एक मॉलिक्यूल बढ़ा देती है। फिर वो एमआरपी अपने हिसाब से रखती है।
डॉ. उमा: मैं तो ऐसे सोचती हूं हमेशा कि सरकार के पास कोई एक एजेंडा नहीं है। बहुत सारी चीजें हैं। लोगों को आवाज उठानी चाहिए। जैसे जेनेरिक मेडिसिन पर लोगों के बीच में अवेयरनेस हुआ था। आज जेनेरिक मेडिसिन की चर्चा खूब हो रही है और वो काम कर काम भी कर रही है लोगों को लगता था कि जेनेरिक मेडिसिन तो कुछ होता ही नहीं है जबकि भारत में तो 90% जेनेरिक मेडिसिन ही है। बस क्वालिटी अश्योरेंस की जरूरत है। अभी कफ सिरप वाला जो मामला आया वह तो एक्सट्रीम केस है। किसी को इनफेक्शन है। एंटीबायोटिक दे दी और वो असर ही नहीं करे। उसकी क्वालिटी पर ध्यान देने की बहुत ज्यादा जरूरत है।
आशुतोष: बिल्कुल। दवा बाजार का एक मैकेनिज्म है जो सरकार तय करती है। क्वालिटी कंट्रोल, ड्रग कंट्रोलर, टीआई, ड्रग इंस्पेक्टर आदि। हमें विश्वास है कि जो दवा बिक रही है वो सही ही होगी। फिर भी अमानक दवाएं बाजार में पहुंच रही हैं। मैंने एक आर्टिकल भी लिखा कि ऑपरेशन फार्मा की जरूरत है। पता नहीं आप इससे कितना सहमत होंगी लेकिन आम लोग कर रहे हैं।
डॉ. उमा: नहीं, सभी एग्री करेंगे। लेकिन अपवाद तो हर जगह है। इसीलिए मैंने कहा कि आप लोग कोशिश कीजिए और जरूर होगा क्योंकि इसमें सरकार को कोई प्रॉब्लम नहीं हो सकती है। उन तक बातें पहुंचें। जनता जागरूक हो तो जल्दी हो जाएगा।
आशुतोष: आपकी तरफ से क्या सुझाव होगा कि गठिया ना हो?
डॉ. उमा: हमारे शरीर को प्रोटीन, फैट्स, कार्बोहाइड्रेट्स, मिनरल्स, बहुत सारे कैल्शियम, मैग्नीशियम, जिंक, बोरोन आदि की जरूरत है। विटामिंस चाहिए होते हैं। लेकिन एक निश्चित मात्रा में। सबसे बेहतर तरीका है कि सप्लीमेंट ना लेकर अपना जो फूड प्रोडक्ट है वो लीजिए। कैल्शियम आपको दूध, दही, पनीर, फल, सिट्रस फल—इन सब में मिलता है। अगर आप वो ले रहे हैं तो ओवर नहीं होगा। वो उसी मात्रा में शरीर में रहेगा। आंवला में कैल्शियम होता है। उसके साथ फाइबर भी मिलेगा, दूसरे विटामिन भी मिलेंगे। अगर आप सप्लीमेंट ले रहे हैं तो आप सिर्फ कैल्शियम ले रहे हैं और मैं आपको यह बताऊंगी कि अब जो हमारे पास कुछ मरीज आते हैं जो कैल्शियम ले रहे होते हैं, उनमें कैल्शियम हायर साइड में होता है। एक रेंज होती है ना उससे भी ज्यादा होता है। तो जब कैल्शियम ज्यादा होता है तो हार्ट अटैक का खतरा बढ़ा देती है। किडनी फेल हो सकती है। मसल्स कमजोर हो सकते हैं। तो ये जो मिनरल्स या विटामिंस होते हैं, उनके जो सप्लीमेंट आप लेते हैं तो उसकी मात्रा तो बढ़ जाती है। लेकिन शरीर में सिर्फ वही दो चार चीजें नहीं है। बहुत सारी चीजें हैं। इसीलिए होल फूड की हम हमेशा बात करते हैं कि आप जो खाना खाते हैं, थाली में पूरा फल खाते हैं, जूस लेते हैं, नट्स लेते हैं, बादाम, दूध—दही लें। सप्लीमेंट्स पर ना जाएं।
आशुतोष: आप होल फूड की जब बात कर रही हैं तो आजकल मिलेट्स की बहुत चर्चा हो रही है।
डॉ. उमा: बिल्कुल लें मिलेट्स। लेकिन याद कीजिए बचपन में हमलोगों ने तो खाया तो बिल्कुल नॉर्मल प्रोसेस रहा है। दुर्भग्यपूर्ण यह है कि इसको मेन स्ट्रीम में लाने के लिए इतना कुछ करना पड़ा। हमने अपना फूड हैबिट्स बदल दिया जो हमारे भूगोल के हिसाब से नहीं बदलना था। गट माइक्रोबायोम भारतीयों की कुछ तो अमेरिकन, यूरोपियंस की अलग होगी। हम सोचते हैं कि जो वो खाते हैं वह हमसे अच्छा है। यह बिल्कुल गलत है। ज्योग्राफिकली अपने देश में भी यह भिन्न है। साउथ में चले जाए उनके लिए कुछ और सूट करता है, उत्तर भारतीयों को कुछ और। जो सूट करता है वो खाएं। मिलेट्स तो हमारा फूड है। सामान्य भाषा में हम ये कहें कि हम जिस देश के हैं वही भोजन करे। तभी हम ज्यादा मजबूत रहेंगे। मूल की ओर लौटना ही होगा।
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