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The thermometer—पब्लिक हेल्थ का दायरा बहुत बड़ा : डॉ. अनन्या अवस्थी

The thermometer—पब्लिक हेल्थ का दायरा बहुत बड़ा—डॉ. अनन्या अवस्थी

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। यू—ट्यूब के The thermometer कार्यक्रम में इस बार पोषण विशेषज्ञ डॉ. अनन्या अवस्थी थीं जिनसे स्वस्थ भारत मीडिया के समूह संपादक आशुतोष कुमार सिंह ने की लंबी बातचीत की थी। हेल्थ सेक्टर में पोषण का अपना खास महत्व है। शिशु के गर्भ में आने से लेकर बुढ़ापे तक स्वस्थ रखने में पोषण की अहम भूमिका है। प्रस्तुत है उनसे बातचीत का पहला हिस्सा…

आशुतोष: आप पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट हैं और इसे समझने के लिए हार्वर्ड पढ़ने चली गई और फिर भारत में काम। यह सब क्या?
डॉ. अनन्या: मेरी ट्रेनिंग एक डेंटिस्ट की तरह हुई। प्राइमरी क्वालिफिकेशन बीडीएस की है। जब फाइनल ईयर में थी तो मुझे लगने लगा था कि समाज में डॉक्टर्स की अहम भूमिका तो है लेकिन एक क्लीनिक के अंदर एक डॉक्टर एक पेशेंट को ही देख सकता है। तब मन में आता था कि ऐसा क्या करें कि अपनी डॉक्टरी भी आगे बढ़े लेकिन एक समय पर एक से ज्यादा लोगों से स्वास्थ्य के बारे में संवाद कर सकूं। ओरल हेल्थ से मेरी शुरुआत हुई। उसी साल एक मौका मिला वोलेंटियरिंग का। मैं सूडान गई। तब वहां वॉर क्राइसिस चल रही थी। वहां पहली बार मेरा पब्लिक हेल्थ से परिचय हुआ और खारतूम यूनिवर्सिटी से मुझे मौका मिला कि जितने भी संघर्ष वाले क्षेत्र हैं, वहां कैसे मोबाइल हेल्थ मैन के माध्यम से हम लोगों तक पहुंच सकते हैं। वो सब मेरी तरह डेंटिस्ट थे। वहां से शुरुआत हुई मेरे पब्लिक हेल्थ में इंटरेस्ट की। फिर ओरल हेल्थ के एरिया में काम किया। पहले प्री कैंसरिस्ट जो मुंह के लीजंस होते हैं और भारत में बड़ा ही महत्वपूर्ण है क्योंकि गुटखा— तंबाकू का सेवन कल्चरली नॉर्म्स में भी स्वीकार्य है। वो सब कहीं ना कहीं ओरल कैंसर की शुरुआत है। उसकी स्क्रीनिंग बहुत सस्ती है। वहां से मैंने समझा कि पब्लिक हेल्थ की भी पढ़ाई होती है। दो-तीन साल मैंने अपने अनुभव से काम किया। नेशनल इंस्टट्यूट ऑफ़ फिजिकली हैंडीकैप्ड में भी गई। उसके बाद काफी सारे अस्पतालों में ओरल हेल्थ के लिए स्क्रीनिंग में काम किया। कुछ समय मैंने गंगाराम के डेंटल डिपार्टमेंट में काम किया। पब्लिक हेल्थ में मास्टर्स करने के लिए जॉनस हॉपकिंस, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी आदि में मैंने अप्लाई किया। पब्लिक हेल्थ जमीनी चीज है और अगर जमीनी अनुभव हो तो काफी फर्क पड़ता है। मुझे लगता है कि कहीं ना कहीं वो एक कारण हो सकता है मेरे चयन में। मैंने वहां पर ग्लोबल हेल्थ में स्पेशलाइजेशन किया। बड़े इंस्टीट्यूशन में पढ़ना उतना स्पेशल नहीं होता है। लेकिन आपके जो सहभागी होते हैं, आप उनसे क्या सीखते हैं, यही सबसे बड़ी लर्निंग होती है। एक बड़ा मंच…कोई अफ्रीका से, कोई ऑस्ट्रेलिया से, कुछ यूनिसेफ से ईरान में काम करके आ रहे हैं। कुछ अमेरिकन डॉक्टर्स जो पब्लिक हेल्थ और पढ़ना चाह रहे हैं। तो यह महत्वपूर्ण अनुभव है कि पब्लिक हेल्थ का दायरा कितना बड़ा है। स्टार्टअप, एनजीओ, डॉक्टर्स भी इसमें साथ दे रहे हैं छुट्टियों के दिन कैंप लगाकर। इससे मेरा दायरा खुला।

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आशुतोष: पब्लिक हेल्थ में नीतियां और कार्यान्वयन में कितना फर्क है?
डॉ. अनन्या: पब्लिक हेल्थ में हर दिन नई लर्निंग होती है। प्रोग्राम बना लेकिन जब ग्राउंड पर लागू करने की बात होती है तब परिप्रेक्ष्य देखना होता है। स्वास्थ्य के कार्यक्रम को बिहार में कैसे लागू करना है, केरल में कैसे। सब अलग होता है। इंप्लीमेंटेशन रिसर्च में मैंने यही सीखा है कि कोई भी प्रोग्राम, कोई भी स्वास्थ्य कार्यक्रम परफेक्ट नहीं होते। उनको लगातार करके उन्नत करना होता है। यह सब उसी स्थल पर सीखा जा सकमा है। यह सोच लेना कि कोई हमने हेल्थ का कार्यक्रम शुरू कर दिया और वो बड़ा अच्छे से चल जाएगा, ऐसा जरूरी नहीं है।

आशुतोष: आप पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट हैं। लेकिन यह अपने आप में नया शब्द है। ये क्या है? पब्लिक हेल्थ के दायरे को किस नजर से आप देख रहे हैं?
डॉ. अनन्या: जब आपको बीमारी हो जाए तब आप डॉक्टर के पास जाएंगे। पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट कोशिश करते हैं कि आपको बीमारी ना हो। साफ पानी या गंदी हवा का स्वास्थ्य पर क्या फर्क पड़ रहा है, यह सब जन स्वास्थ्य के दायरे में आता है। समझ लीजिए कि जन स्वास्थ्य अपस्ट्रीम एक काम है। बहुत हद तक मेडिकल सेवाएं भी टेक्निकली पब्लिक हेल्थ के अंदर ही आती हैं। पब्लिक हेल्थ के स्टेक होल्डर्स सरकार हैं।

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आशुतोष: पब्लिक हेल्थ भारत में क्यों स्पेशल है?
डॉ. अनन्या: बाहर रहकर समझ सकी कि पब्लिक हेल्थ का असली काम भारत से ज्यादा कहां हो सकता है। यहां पर इतने जन असली लिविंग लैब हैं। बच्चे के पैदा होते ही हेल्थ रिस्क तय हो जाता है। अस्पताल में पैदा हो रहा है या घर में। यह तय कर देता है कि बच्चा आगे स्वस्थ रहेगा या नहीं। जन स्वास्थ्य वहां से शुरू हो जाता है। जब मां गर्भवती होती है तो वह क्या खाना खा रही है। असली डाइट वो है जो बैलेंस्ड हो, जिसमें सारे न्यूट्रिशंस हों। अनाज, सब्जी, फल भी खाओ। नॉनवेज, डेयरी उत्पाद भी। बच्चा जब बड़ा होता है तो उसकी फिजिकल हेल्थ और उसकी मेंटल हेल्थ भी ठीक रहे। मेंटल हेल्थ से फिजिकल हेल्थ खराब होती है और बढ़ते-बढ़ते डायबिटीज, ओबिसिटी, हाइपरटेंशन आदि के शिकार हो जाते हैं। ये सब पब्लिक हेल्थ के दायरे में आते हैं। जंक फूड्स तक इसके दायरे में आते हैं। तो इसका बड़ा व्यापक दायरा है।

आशुतोष: आप भारत सरकार के साथ मिलकर पोषण पर काम कर रही हैं। वह किस तरह का काम है और सरकार को किस तरह का सुझाव आप दे रही हैं?
डॉ. अनन्या: सच पूछिए तो हार्वर्ड से ही मेरी नौकरी लग गई। वहां उनका स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ है जहां से मैंने पढ़ाई की। वे अपना इंडिया रिसर्च सेंटर खोल रहे थे। 2015-16 में और मैं ग्रेजुएट कर रही थी। वहां पर डॉ. विश्वनाथ प्रोफेसर हैं। हेल्थ कम्युनिकेशन के हेड। उन्होंने मुझे ये अवसर दिया कि भारत में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के इंडिया रिसर्च सेंटर पर काम करूं। मैंने 5—6 साल इस पर काम किया और इस दौरान लगा कि न्यूट्रिशन, पोषण एक बहुत बड़ा एरिया है जहां फोकस की जरूरत है। आज तो यह सब मेनस्ट्रीम एजेंडे पर आ गया है। लोगों को भी बहुत ज्यादा पता नहीं था। पोषण अभियान तो 2018 में प्रधानमंत्री जी ने लॉन्च किया था। 2021 में मुझे मौका मिला कि मैं अपनी ही एक संस्था खोलूं। उसका नाम है अनुवाद। महिला बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत पोषण अभियान आता है। इसी मंत्रालय में आईसीडीएस या आंगनबाड़ी सेवाएं कहते हैं, जिसके 14 लाख केंद्र हैं। इन सब पर हम लोग अनुवाद के माध्यम से साइंटिफिक और टेक्निकल सपोर्ट देते हैं।

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आशुतोष: अनुवाद का मतलब ट्रांसलेशन है। इसे आपने स्थापित किया। लेकिन अनुवाद नाम क्यों?
डॉ. अनन्या: मेरी शुरूआत पब्लिक हेल्थ और हार्वर्ड सेंटर से हुई। बहुत सारे सीनियर प्रोफेसर्स के साथ काम करने का मौका मिला। रिसर्च को बहुत पास से देखने का मौका मिला। दूसरी तरफ देखती थी कि सरकारी प्रोग्राम कैसे चलते हैं। सीएसआर के भी कैसे प्रोग्राम चलते हैं तो मुझे लगता था कि कहीं ना कहीं कुछ छूट रहा है कि रिसर्च क्या दिखा रही है? डेटा क्या दिखा रहा है? वो एक अलग दुनिया है और यहां लागू करने वाले हैं। उनके पास रिसर्च का टाइम नहीं है। अच्छे जर्नल्स को पढ़ने का समय नहीं है। जानना तो होगा कि रिसर्च और डेटा का क्या संबंध है सरकारी योजनाओं या पब्लिक हेल्थ के प्रोग्राम्स का। मैंने उस समय अपने प्रोफेसर विश्वनाथ जी से जाना कि नॉलेज ट्रांसलेशन एक बहुत बड़ा एरिया है। अनुवाद में हम लोग यही कोशिश करते हैं कि जितनी साइंस है, जितना डाटा है, उसको हम इस तरह से अनुवाद कर पाएं कि भारतीय परिप्रेक्ष्य, सामाजिक—सांस्कृतिक परिवेश में फिट हो सके। उसमें जो समस्याएं हैं, उसका समाधान देने वाला रिसर्च भी हो। दोनों तरीके से कि हमें किस तरह के स्वास्थ्य प्रोग्राम चाहिए, उस पर रिसर्च हो और जो रिसर्च हो रही है, वो यहां पर कैसे फिट हो, इसको हम कैसे ट्रांसलेट कर सकते हैं। भाषा की दीवार भी एक चीज है। मान लें कि 12 पन्ने का रिसर्च पेपर है। आपको पता है कि पोषण अभियान क्या है? आपको पता है कि आंगनबाड़ी वर्कर की असली समस्या क्या है? अब उस रिसर्च और सरकारी नीति को समझ कर देखना है कि इस रिसर्च या डेटा की प्रासंगिकता क्या है। कैसे इसे बेहतर कर सकते हैं। क्या नई पॉलिसी आनी चाहिए, क्या ऐसा डाटा है जो सरकारी स्टेक होल्डर्स को पता होना चाहिए। अगर कोई अच्छा कार्यक्रम हो रहा है तो क्या ऐसी बेस्ट प्रैक्टिस है जो पब्लिश होनी चाहिए ताकि चार और लोग उसके बारे में सीख पाएं। ये सब नॉलेज ट्रांसलेशन के दायरे में आता है।

आशुतोष: इस तरह के और भी लोग भारत में काम कर रहे हैं?
डॉ. अनन्या: जितने लोग पब्लिक हेल्थ में काम कर रहे हैं, वो कहीं ना कहीं ट्रांसलेटर्स होते हैं। चाइल्डहुड ओबेसिटी —बचपन से मोटापा—इस पर प्रधानमंत्री जी ने बड़ी मुहिम चालू की है। जंक फूड्स एक बहुत बड़ा एरिया है जिसके बारे में जागरूकता की जरूरत है कि बच्चे आजकल चिप्स, कोला और पैटीज खा रहे हैं। इससे हार्ट हेल्थ, ब्लड प्रेशर, मोटापे को लेकर रिसर्च हो चुकी है। अब आप जा रहे हैं एक सेक्रेटरी के पास जिनके पास आपकी बात सुनने के लिए सिर्फ 5 मिनट है। नॉलेज ट्रांसलेशन से 5 मिनट में रिसर्च, साइंस और डेटा, पॉइंटर्स आदि का सारांश निकाल कर रखना होगा। यह सुझााव भी कि ये पोषण अभियान में कहां फिट हो सकता है, क्या नीति बन सकती है, कैसी ट्रेनिंग हो सकती है। इस पर जनमानस तक कैसे जागरूकता आ सकती है? ये ट्रांसलेशन का काम है।

(जारी)
प्रस्तुति: अजय वर्मा

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