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लखनऊ के 12 बड़े निजी अस्पतालों पर UP FSDA का छापा

लखनऊ के 12 बड़े निजी अस्पतालों पर UP FSDA का छापा

लखनऊ (स्वस्थ भारत मीडिया)। उत्तर प्रदेश एफडीए ने 12 बड़े निजी अस्पतालों की फार्मेसियों में छापा मारकर कम कीमत पर दवाएं खरीदकर प्रिंटेड एमआरपी पर मोटी रकम वसूलने के खेल का भंडाफोड़ किया है। जांच में सामने आई गंभीर अनियमितताओं के बाद अपोलो मेडिक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल की ओपीडी फार्मेसी को बंद करने का आदेश दिया गया है, जबकि ग्लोब हॉस्पिटल के एक अवैध भंडारण स्थल को सील कर दिया गया है। विभाग ने 38 दवाओं के नमूने जांच के लिए भेजते हुए अस्पतालों व सप्लायरों को नोटिस थमा दिए हैं। जिन अस्पतालों पर छापा पड़ा है उसमें प्रसिद्ध मेदांता भी शामिल है।

अपोलो की फार्मेसी बंद

जानकारी के मुताबिक अत्यधिक खपत और जीवनरक्षक दवाओं को थोक विक्रेताओं से 60 से 70 फीसद तक कम कीमत पर खरीदा जा रहा था, लेकिन बिलिंग काउंटर पर मरीजों को पूरी एमआरपी या नाममात्र की छूट देकर बेचा जा रहा था। विभाग अब दवाओं के प्रिंटेड एमआरपी और स्टॉकिस्ट द्वारा अस्पतालों को दिए गए आपूर्ति मूल्य के बीच के अंतर की पड़ताल कर रहा है। अस्पताल और दवा कंपनियों के बीच तालमेल को लेकर कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। गुणवत्ता और प्रभावशीलता परखने के लिए 38 दवाओं के नमूने सील कर सरकारी प्रयोगशाला भेजे गए हैं। विभाग ने सख्त एक्शन लेते हुए अपोलो सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में ड्रग्स रूल्स 1945 के तहत जरूरी स्टॉक लेजर, भर्ती मरीजों (आईपीडी) की फाइलें और गंभीर श्रेणी की ‘शेड्यूल एच1’ दवाओं के क्रय-विक्रय का अनिवार्य रजिस्टर नहीं मिला। बिलों पर दवाओं के बैच नंबर तक दर्ज नहीं थे। इस पर टीम ने ओपीडी फार्मेसी को तत्काल बंद करने का आदेश दे दिया।

मेदांता, चरक में भी गड़बड़ियां

इसी तरह राजाजीपुरम स्थित ग्लोबल अस्पताल प्रबंधन दवाओं की खरीद-बिक्री से जुड़ा कोई भी वैधानिक रिकॉर्ड पेश नहीं कर सका। साथ ही बिना अनुमति दो अलग-अलग जगहों पर दवाओं का भंडारण मिला। एक परिसर को मौके पर ही सील कर दिया गया। ​जांच के घेरे में आए अन्य बड़े अस्पतालों की कार्यप्रणाली में भी मनमानी उजागर हुई। मेदांता लखनऊ और चरक हॉस्पिटल में महंगी दवाओं के स्थान पर मरीजों को दिए जाने वाले सस्ते और जेनेरिक साल्ट फार्मेसी से नदारद पाए गए। रीजेंसी हॉस्पिटल में बिलों पर दर्ज बैच नंबर और भौतिक स्टॉक मेल नहीं खा रहे थे। बिलों पर फर्म का सही पता भी नहीं था। शेखर हॉस्पिटल में शेड्यूल एक्स श्रेणी की संवेदनशील दवाओं की खरीद फार्मेसी लाइसेंस के बजाय चिकित्सक के नाम पर की जा रही थी। तलवार स्किन इंस्टीट्यूट में फार्मासिस्ट मौके से गायब था और मोबाइल ऐप के जरिए बिना वैध रिकॉर्ड के दवाएं मंगाई जा रही थीं। मिड्लैन्ड हॉस्पिटल में कोल्ड-चेन मेंटेनेंस और स्टॉक लेजर में बड़ा अंतर पाया गया। डॉ. केएनएस मेमोरियल हॉस्पिटल में मरीजों के पते, डॉक्टर के रजिस्ट्रेशन और आवश्यक लाइसेंस नंबर के बिना ही दवाएं बेची जा रही थीं। अवध हॉस्पिटल में थोक लाइसेंस न होने का दावा करने के बावजूद कंपनियों से उसी पर दवा खरीद के सुबूत मिले।

कई जिलों में एक्शन

मालूम हो कि ​प्रदेश में 24 सितंबर से शुरू हुए इस विशेष अभियान के पहले चरण में 16 जिलों के 21 मेडिकल कॉलेजों की भी पड़ताल की गई थी। यूपी एफएसडीए के अधिकारियों ने साफ किया है कि यह केवल एक सामान्य जांच नहीं है, बल्कि अस्पतालों और दवा माफिया के उस पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने की कार्रवाई है, जिसके चलते मरीजों को सस्ती दवाएं नहीं मिल पा रही हैं। अस्पतालों को दवा सप्लाई करने वाले थोक डीलरों के खातों और गोदामों की भी सघन जांच की जा रही है।

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