नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। स्वास्थ्य एजेंसियों को आंशका कि 2025 तक ब्रेस्ट कैंसर की घटनाओं और मौत बढ़ेगी। WHO, इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर और अन्य कैंसर एजेंसियों ने ऐसी आशंका व्यक्त की है। रिपोर्ट कहती है कि 20 में से एक महिला अपने जीवन में ब्रेस्ट कैंसर से प्रभावित जबकि 70 में से एक महिला इस बीमारी से अपनी जान गंवा सकती है।
ब्रेस्ट कैंसर से अमेरिका में ज्यादा मौतें
बता दें कि अमेरिका में महिलाओं में कैंसर से संबंधित मौतों का दूसरा प्रमुख कारण ब्रेस्ट कैंसर है, जबकि भारत में भी यह कैंसर हर साल बड़ी संख्या में महिलाओं को अपना शिकार बना रहा है। हालिया रिसर्च में 2050 तक दुनिया भर में ब्रेस्ट कैंसर का निदान और मौतें बढ़ने का अनुमान जताया गया है। शोध के मुताबिक वैश्विक स्तर पर 20 में से एक महिला को अपने जीवन में इससे जूझना होगा। नेचर मेडिसिन में प्रकाशित अध्ययन से पता चलता है कि यदि वर्तमान दर जारी रहती है तो अगले 25 सालों में यानी 2050 तक हर साल 3.2 मिलियन नए ब्रेस्ट कैंसर के मामले और 1.1 मिलियन इस कैंसर से संबंधित मौतें होंगी।
ब्रेस्ट कैंसर के लक्षण
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट बताती है कि ब्रेस्ट कैंसर के लक्षण इस प्रकार हैं:
- स्तन में गांठ या मोटा होना, वह भी अक्सर बिना दर्द के।
- स्तन के साइज, शेप या स्वरूप में परिवर्तन।
- त्वचा में गड्ढे, लालिमा या अन्य परिवर्तन।
- निपल की उपस्थिति या निपल के आसपास की त्वचा में परिवर्तन।
- निपल से असामान्य या खूनी तरल पदार्थ।
ब्रेस्ट कैंसर के कारण
- बढ़ती उम्र
- फैमिली हिस्ट्री
- मोटापा
- शराब और तंबाकू का सेवन
- रेडिएशन एक्सपोजर
- रिप्रोडक्टिव हिस्ट्री
- पोस्टमेनोपॉज़ल हार्मोन थेरेपी।
कार टी सेल थेरेपी से उम्मीदें
मालूम हो कि National Institutes of Health (NIH) के मुताबिक 2022 में भारत में कैंसर के 14 लाख 61 हजार से अधिक केस सामने आए। कैंसर से लड़ने के लिए भारत में भी CAR T-Cell Therapy शुरू की गई है। इसी को लेकर एक स्टडी सामने आई है जो बताती है कि भारत में इस थेरेपी का क्या असर हुआ है। सीएआर टी-सेल थेरेपी यानी काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर टी-सेल थेरेपी शरीर के इम्यून सेल को ट्रेन करता है कि वो खुद से कैंसर के सेल की पहचान करें और इनको नष्ट कर दे। यह थेरेपी उन मरीजों को दी जाती है जिनको या तो दोबारा कैंसर हो जाता है या फिर फर्स्ट-लाइन ट्रीटमेंट में कैंसर का पता नहीं चलता है।
73 फीसद मरीजों पर प्रभावी
द लैंसेट की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की पहली सीएआर टी-सेल थेरेपी के क्लीनिकल ट्रायल के नतीजे बताते हैं कि इसका असर लगभग 73 प्रतिशत मरीजों पर हुआ है। देश में किया गया यह एक विश्व स्तरीय इनोवेशन है। भारत के औषधि नियामक ने 2023 में इस थेरेपी के लिए मंजूरी दे दी थी। अब यह भारत के कई अस्पतालों में उपलब्ध है, जिनमें अपोलो, फोर्टिस, अमृता और मैक्स शामिल हैं। वैसे इस थेरेपी के साइड इफेक्ट भी री है. इस थेरेपी के बाद हेमोफैगोसाइटिक लिम्फोहिस्टियोसाइटोसिस (Haemophagocytic Lymphohistiocytosis) के मामले सामने आए हैं। इसमें इम्यून सेल अनियंत्रित रूप से एक्टिव हो जाते हैं जिससे सूजन और ऑर्गन डैमेज तक हो सकता है। वैसे यह परेशानी 12 फीसद लोगों में देखी गई है। इसके सबसे ज्यादा आम साइड इफेक्ट्स में एनीमिया है। 61 फीसद को एनीमिया, 65 फीसद में कम प्लेटलेट काउंट से रक्तस्राव का खतरा बढ़ जाना, 96 फीसद में न्यूट्रोपेनिया और 47 फीसद में फ़ेब्राइल न्यूट्रोपेनिया (बुखार के साथ न्यूट्रोपेनिया) थे। तकनीकी चुनौतियों के साथ-साथ ट्रीटमेंट से जुड़ी लागत के कारण सीएआर टी-सेल थेरेपी जैसे अत्याधुनिक कैंसर ट्रीटमेंट कुछ देशों में ही उपलब्ध है। यह अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, इजराइल, स्विट्जरलैंड, ब्राजील, साउथ कोरिया, कनाडा और चीन में उपलब्ध हैं। इसकी कीमत 25 लाख तक है।
