मोनिका जौहरी

नयी दिल्ली। क्लिनिकल डिप्रेशन उर्फ MDD मतलब मेजर डिप्रेसिव डिसऑर्डर। यह आपके महसूस करने, सोचने, काम करने और व्यवहार करने के तरीके को प्रभावित करता है एकदम भयंकर तरीके से और कई तरह की भावनात्मक और शारीरिक समस्याओं को जन्म दे देता है।
■ नोट : अवसाद कमज़ोरी या मानसिक अस्थिरता का संकेत नहीं है। शुगर/बीपी की समस्याओं की तरह ये भी एक बीमारी है। अवसाद जीवन के किसी पड़ाव में कभी भी किसी को भी अपनी चपेट में ले सकता है।
क्या होता है क्लिनिकल डिप्रेशन
इसकी स्थिति तब होती है जब हम जीवन के हर पहलू पर नकारात्मक रूप से सोचने लगते हैं। जब यह स्थिति चरम पर पहुंच जाती है तो इंसान को अपनी ज़िंदगी बेकार लगने लगती है और धीरे—धीरे इंसान डिप्रेशन की स्थिति मे पहुँच जाता है। चिंता और तनाव के कारण शरीर में कई हार्मोन का लेवल बढ़ता जाता है, जिनमें एड्रीनलीन और कार्टिसोल प्रमुख हैं। लगातार तनाव और चिंता की स्थिति अवसाद यानि डिप्रेशन में बदल जाती है। लक्षणों की बात करूँ तो-
- मानसिक : दो सप्ताह से ज्यादा लगातार उदासी, असंगत महसूस करना, मिजाज में उतार-चढ़ाव, भूलना, एकाग्र न हो पाना, गतिविधियों में रुचि न लेना, चिंता, घबराहट, अकेलापन, शारीरिक देखभाल में अरुचि, निरन्तर चिंता करना, स्वास्थय के विषय में चिंता करना, नकारात्मक विचार आना, भ्रामक विचार, स्वभाव चिड़चिड़ा होना, छोटी—छोटी बातों पर गुस्सा आना, भ्रम करना, मनःस्थिति में बदलाव, पागलों जैसा बर्ताव करना, अकेला रहना, बुरे सपने आना, कम बोलना, डर लगना, नशे की इच्छा होना आदि।
- विचार व अनुभूति: असफलता संबंधी विचार, स्वयं को कोसना, शीघ्र निराश होना, असहयोग, निकम्मेपन के विचार, दुर्भाग्यपूर्ण कार्य के लिए स्वयं को जिम्मेदार ठहराना, भविष्य के लिए नकारात्मक व निराशावादी दृष्टिकोण, आत्महत्या के विचार आदि।
- शारीरिक : नींद न आना व सुबह जल्दी उठ जाना, किसी काम को धीरे-धीरे करना, भूख में कमी, लगातार वजन कम होना, थकान महसूस होना, अपच, मुंह सूखना, कब्ज, मासिक धर्म की अनियमितता, सिर, पेट, सीने, पैरों, जोड़ों में दर्द, भारीपन, पैरों में पसीना, दिल का काँपना, खाना निगलने में मुश्किल, उल्टी आने को होना, बार—बार बाथरूम जाना, चक्कर आना, मासपेशियों में दर्द, दिल की धड़कन तेज होना, शरीर का काँपना, सांस लेने में दिक्कत आदि।
अवसाद के मुख्य प्रकार
पहला एंडोजीनस (यह आंतरिक कारणों से होता है)।
दूसरा न्यूरोटिक (आमतौर पर यह बाहरी कारणों से होता है)।
इनके अलावा डिसथीमिया, मौसम प्रभावित डिप्रेशन (सीजनल इफेक्टिव डिसऑर्डर), मनोविक्षप्ति (साइकोटिक), छिपा (मास्कड) व प्रसन्नमुख (स्माइलिंग) डिप्रेशन इसके अन्य प्रकार हैं।
- मनोविकार : अवसाद ऐसे अन्य मनोविकारों के साथ मौजूद रह सकता है जिनकी पहचान न हो पाई हो जैसे ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिसऑर्डर, सामाजिक भय ग्रंथि या सोशियल फ़ोबिया और शिज़ोफ़्रेनिया। ऐसे मामलों में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से एक विस्तृत आकलन की सलाह दी जाती है।
- आनुवांशिक : परिवार में माता-पिता या कोई अन्य सदस्य डिप्रेशन (अवसाद) से पीडि़त होता है तो बच्चों में ऐसा होने का खतरा रहता है।
- कमजोर व्यक्तित्व : बचपन में मां-बाप के प्यार का अभाव, कठोर अनुशासन, तिरस्कार, सामथ्र्य से अधिक अपेक्षा या ईष्र्या कई बार मस्तिष्क को ठेस पहुंचाती हैं। जो बड़े होने पर विपरीत परिस्थितियों में व्यक्ति के लिए डिप्रेशन का कारण हो सकती है।
- मानसिक आघात : बार-बार असफलता, नुकसान या किसी प्रियजन की मृत्यु आदि से भी ऐसा हो सकता है।
- शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ : बेकाबू बीमारियाँ जैसे डायबिटीज़ और थायरॉयड से अवसाद हो सकता है। इसलिए मनोचिकित्सक से परामर्श में पूर्व अचिंहित बीमारियों की जाँच भी शामिल है। हृदय रोग, कैंसर, एचआईवी, नि:शक्तता या कोई अन्य रोग जिसमें रोगी लंबे समय तक बिस्तर पर रहता है। ऐसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों को बीमारी से निपटने में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है और इस वजह से भी अवसाद पैदा हो सकता है।
- अन्य कारण : पारिवारिक झगड़े, अशांति, संबंध-विच्छेद, व आर्थिक परेशानी आदि वजहों से भी ऐसा हो सकता है।
अवसाद को कैसे पहचानें
क्या आपने कभी सोचा है कि आपका कोई दोस्त या परिजन बहुत उदास दिखता है और लंबे समय तक थका हुआ या सुस्त नज़र आता है? आपने नोट किया होगा कि वह व्यक्ति बहुत ख़ामोश हो गया है, रोज़ाना के काम में उसकी दिलचस्पी ख़त्म हो गई है, ठीक से नहीं खाता है या काम से उसका ध्यान उचट गया है। ऐसे संकेत बताते हैं कि उक्त व्यक्ति अवसाद से पीड़ित हो सकता है।
■ महत्वपूर्ण बात : हर बीमारी में लक्षण का एक निर्धारित सेट होता है और ये ज़रूरी है कि किसी भी तरह का उपचार शुरू करने से पहले सही पहचान के लिए किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह ली जाए। जान लीजिए कि गलत पहचान से जटिलताएँ उभर आती हैं और हालत बिगड़ सकती है।
किसी व्यक्ति की पहचान अवसाद से पीड़ित के रूप में तभी की जाती है जब उसमें, दो सप्ताह की अवधि के दौरान दिन भर में कई बार अवसाद के पाँच से ज़्यादा लक्षण नज़र आए। ये लक्षण इतने सघन और गंभीर होने चाहिए कि व्यक्ति की घर पर या दफ़्तर में रोज़ना की गतिविधि बाधित हो जाए।
डिप्रेशन की वजह जानें : अगर आप डिप्रेशन का समाधान निकालना चाहते हैं, तो डिप्रेशन की वजह को जानने की कोशिश करें। इसके बाद इसे कही लिख सकते लें। फिर सोचें कि इस समस्या का क्या समाधान हो सकता है? अगर संभव हो, तो उस पर जल्द से जल्द अमल करना शुरू कर दें।
भविष्य की टेंशन ना लें : ‘कल क्या होगा’ परेशानियों को बढ़ावा देता है, इसलिए हमेशा आज में जिएं क्योकि वर्तमान ही सत्य है और उसे बेहतर करने की कोशिश करते रहें। ऐसा करने से आपका भविष्य अपने आप ठीक हो जाएगा। हमारा हर दिन और हर पल हमें कुछ न कुछ नई बातें सिखाता है और परेशानियों और दिक्कतों से लड़ना सिखाता है।
चीखना: कुछ लोग हार से पैदा हुई हताशा, तनाव आदि को दूर करने के लिए जोर—जोर से चीखने लगते है। ये तनावपूर्ण स्थिति या कष्टदायी स्थिति को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है। मनोविज्ञानिक भी तनावपूर्ण स्थिति में चीखने को एक अच्छी तकनीक मानते है।
गाने सुनना: तनाव या दबाव को दूर करने के लिए एक अच्छी तकनीक या योजना है कि व्यक्ति को गाने सुनने चाहिए। इससे तनाव में कमी आती है और व्यक्ति तरोताजा हो महसूस करता है।
भावनाओं को बाहर निकलना: रोजमर्रा की जिंदगी में व्यक्ति किसी भी समस्या से तनाव में आ सकता है। ऐसे में ये तरीका या युक्ति बहुत काम आती है कि व्यक्ति अपनी समस्याओं को दूसरे लोगों जैसे दोस्त, भाई, बहन आदि के साथ बाटता या सांझा करता है तो इससे उसका मन हल्का हो जाता है और तनाव कम हो जाता है क्योंकि उसके मन में पैदा हुई भावनायें निकल जाती हैं।
प्राणयाम करें: अगर आप टेंशन और डिप्रेशन से मुक्त होना चाहते हैं तो रोज प्राणयाम करें। इस योग से टेंशन, स्ट्रैस और डिप्रेशन कम होता है और बुद्धि तेज होती है।
हंसने की कला सीखें: हंसने से स्ट्रैस का स्तर कम होता है और हमारी मांसपेशियों को आराम मिलता है। इससे feel good factor बढ़ता है और एन्डार्फिन हार्मोन्स की मात्रा बढ़ती है और इससे हम रिलेक्स महसूस करते हैं।
अकेलेपन से छुटकारा पायें: अकेलापन डिप्रेशन का एक सबसे बड़ा कारण है। अगर आपके परिवार मे कोई इंसान डिप्रेशन से पीड़ित है तो जितना हो सके उसके साथ समय बिताएं। ज्यादा डिप्रेशन मे अक्सर लोगों में आत्महत्या का विचार सबसे पहले आता है इसलिए जितना हो सके उस इंसान के साथ समय बिताएं।
सबसे महत्वपूर्ण बात: ज़्यादातर समय अवसाद छिपा हुआ रहता है क्योंकि लोग इस बारे में बात करने से हिचकते हैं। हममें से कई लोग सिर्फ मुस्करा देते हैं और कोई मज़ाक न उड़ाए या कमज़ोर न समझे, इस चक्कर में अपनी समस्या किसी के साथ शेयर करने से पीछे हटते हैं।
(अवसाद से जुड़ी शर्म की भावना ही वो सबसे बड़ा रोग है जो इस बारे में पीड़ित लोगों को मदद लेने से रोकता है। बिना उपचार के, व्यक्ति खामाख्वाह लंबे समय के लिए इस विकार को झेलता है और अपने परिवार को भी परेशानी में डाले रखता है।)
