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मन की बात / Mind Matter

Senior citizen के लिए गांव में ही बने आनंदालय

आशुतोष कुमार सिंह

Senior citizen की बात

विकसित भारत की ओर अग्रसर भारत में सामाजिक स्तर पर बहुत बदलाव हुए हैं। गांव अब गांव नहीं रह गया है। गांव शहर भी नहीं बन पाया है। ग्रामीण भारत का परिवार भी अब व्यष्टिगत सोचने लगा है। समष्टिगत भाव कम हुए हैं। पिछले 30-35 वर्षों में पूंजी का वर्चस्व बढ़ा है। आपकी आर्थिकी स्थिति आपके सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह से प्रभावित करने लगी है।

बदलाव के इस दौर में शिक्षा, रोजगार एवं पलायन, तीनों एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। पलायन जरूरी भी है और मजबूरी भी। कभी उच्च शिक्षा के लिए तो कभी नौकरी की तलाश में पलायन तो करना ही पड़ रहा है। इस पलायन के कारण जहां गांवों में क्रय शक्ति का इजाफा हुआ है, वहीं गांव-घर के बुजुर्गों की लाठी उनसे बहुत दूर चली गई है। वे अब बेसहारा हो चुके हैं। उनके बेटे-बेटियां अपनी उलझनों में इतने उलझ चुके हैं कि माँ-बाप उनकी प्राथमिकता सूची से बाहर हैं।

(Senior citizen) जिस माँ-बाप ने अपनी हाड़-तोड़ मेहनत की कमाई से पाई-पाई जोड़ कर अपने लाडलों की फी भरी हो, उसे अच्छी शिक्षा मिले, इसलिए उसे बोर्डिंग स्कूल में रखा। अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिलाई। बड़े शहरों में रहकर पढ़ने का खर्च उठाया। और अब जब वे अपने पैरों पर खड़े हो चुके हैं, तब उनके लिए माँ-बाप किसी भार से कम नहीं है। ऐसे में यह चिंतनीय प्रश्न है कि आखिर में यह स्थिति उत्पन्न कैसे हुई? कहीं हमारी परवरिश में कमी तो नहीं रह गई। क्या हमने अपने बच्चों को उचित संस्कार नहीं दिया। आखिर उस बूढ़े माँ-बाप ने कौन सी गलती कर दी, जिसका खामियाजा उसे आज भुगतना पड़ रहा है।

(Senior citizen) सच्चाई यह है कि न तो बूढ़े माँ-बाप ने कोई गलती की और न ही बच्चों की कोई गलती है। यह समय-काल परिस्थिति की विवशता है, जो अपनो को अपने से दूर कर रही है। ऐसे में जरूरत इस बात पर चिंतन-मनन करने की है कि आखिर माँ-बाप व अन्य बूढ़े अभिभावकों का ख्याल कैसे रखा जाए? एक बेटा, एक बहू, एक बेटी जिसके पास पैसा तो है लेकिन समय नहीं है, वे क्या करें? यदि शहर में दो या तीन बेडरूम के कमरे में कोई रहता है और चाहता है कि उसके माँ-बाप उनके साथ रहें, लेकिन माँ-बाप रहना नहीं चाहते। क्योंकि गांव में जिस आजादी के साथ वे रह चुके हैं, उनके लिए 50-100 गज के क्षेत्र में बने जगह में बंध कर रहना पसंद नहीं है। बेटा-बहू कमाने के लिए चले जाते हैं और माँ-बाप फिर अकेले घर में पड़े रहते हैं। वे अंदर से खुश नहीं रह पाते हैं क्योंकि वर्तमान समय के भौतिक सुखों से उन्हें आंतरिक आनंद की अनुभूति नहीं मिलती है। उनका मन उनके गांव में रमा-बसा है। गांव के पीपल की छांव में रमा बसा है। खेत-खलिहान में रमा बसा है।

Senior citizen ऐसे में यह जरूरी है कि किसी पर दोषारोपण किए बिना कुछ समाधान निकाला जाए। गांव में ही एक ऐसा आवासीय आनंदालय (Anandalay) बनाया जाए, जहां पर ऐसे परिवार, जिनके यहां सिर्फ बुजुर्ग ही है, वे एक साथ रहें। एक सामुदायिक भोजनालय की व्यवस्था की जाए, जहां उनके खान-पान की व्यवस्थित व्यवस्था हो। उनके स्वास्थ्य की नियमित जांच हो। वे चाहें तो अपने घर पर जाकर सोएं या आनंदालय में।

(Senior citizen) जहां तक मैं सोच पा रहा हूं, यदि कोई गांव अपने यहां बुजुर्गों के लिए सामुदायिक भोजनालय युक्त सामुदायिक आवासीय व्यवस्था वाला एक आनंदालय खोले तो बुजुर्गों को बहुत सहारा मिल जाएगा। जीवन के अंतिम समय में उन्हें अपने गांव से दूर नहीं जाना पड़ेगा। वे अपने गांव एवं माटी की यादों को सहेजते हुए, हंसते-खेलते हुए गांव में ही अपना सुरक्षित जीवन जी सकते हैं। और हां, यह आनंदालय गांव के लोगों के द्वारा खोला जाना चाहिए और इसमें गांव से बाहर रह रहे सभी नौजवानों को अपनी कमाई का एक निश्चित अंश दान करना चाहिए। इतना ही नहीं, मेरा तो यह भी मानना है कि यदि जितने बुजुर्ग इस आनंदालय मे रह रहे हों, उनकी जमीनों पर सामुदायिक खेती हो और उससे जो उपज हो, उससे आनंदालय में रह रहे बुजुर्गों का खान-पान एवं बाकी व्यवस्था चले।
गर उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर गांवों में या उन गांवों में जहां पर ज्यादा बुजुर्ग हैं और उनके बेटा-बेटी उनका ख्याल रखने की स्थिति में नहीं है, इस आनंदालय का प्रयोग किया जाए तो निश्चित ही हम बुजुर्गों के अंतिम पड़ाव को आनंदायी बना सकते हैं। इससे एक ओर नई पीढ़ी अपने उस हीन भावना से ऊबर पाएगी कि वह अपने माँ-बाप के लिए कुछ नहीं कर पा रही है, वहीं दूसरी ओर बुजुर्गों को भी एक सुरक्षित जीवन जीने का ठौर-ठिकाना मिल जाएगा। इससे गांव भी गांव बना रहेगा और शहरों पर कलंक भी नहीं लगेगा।

समूह संपादक

#Anandalay #SeniorCitizen

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