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‘सोशल डिस्टेंशिंग’ के कु-अर्थ का परिणाम, बह रही है संक्रमणमुक्त मरीजों से नफरत की बयार

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एक शब्द का गलत अर्थबोध कितनी बड़ी मुसिबत खड़ा कर सकता है, इसका उदाहरण है सोशल डिस्टेंशिंग शब्द का कु-प्रभाव। इसी विषय पर प्रस्तुत है वरिष्ठ पत्रकार अजय वर्मा की यह विशेष रपट

नई दिल्ली/ एसबीएम

कोरोना के संकट के दौर में मुश्किलों का दौर थम ही नहीं रहा है। तमाम एहतियात के बावजूद लोग संक्रमण का शिकार हो रहे हें। रिकवरी रेट में भी अच्छी प्रगति है। बहुत से लोग स्वस्थ होकर घर वापस लौट चुके हैं। लेकिन सोशल डिस्टेंशिंग के कु-अर्थ ने उनका पिछा नहीं छोड़ा है। बिहार में इस तरह के कई मामले सामने आए हैं, जिसमें लोगों ने सक्रमण मुक्त मरीजों से सामाजिक दूरी बनानी शुरू कर दी है। इस तरह का मामला और जगहों पर हो सकता है जिसका संज्ञान मुझे नहीं है।

सामाजिक दूरी का घाव कैसे भरें…

कारोना से जीत हासिल कर घर लौटे लोगों और उनके परिवार के समक्ष कहीं—कहीं अब नई समस्या आ रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार स्वस्थ हो चुके मरीजों और उनके परिवार को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है। उनसे पड़ोसी, दोस्त और रिश्तेदारों के साथ सफाईकर्मी, सब्जी विक्रेता, पुलिसकर्मी और दुकानदारों ने भी दूरी बना ली है। मिलना-जुलना तो दूर, कोई इनसे फोन पर भी बात नहीं करना चाहता। हालत यह है कि किसी कोरोना पॉजिटिव का कोई परिजन सामान लेने के लिए दुकान पर चला जाए, तो दूसरे लोग बिना सामान लिए घर लौट जाते हैं। उस दुकान की ग्राहकी भी भय की वजह से कम हो जाती है।

देख तेरे इंसान की हालत क्या हो गई भगवान

पटना के नंदलाल छपरा के एक मरीज ठीक होकर लौटे तो सब्जी वाला और सफाईकर्मी ने घर आने से मना कर दिया। लोग उससे व परिवार के सदस्यों से दूर भागते हैं। पुश्तैनी दुकान है उनकी। लोगों ने जबरन बंद करवा दी। दबी जुबान से लोग उनको यमराज तक कह डालते हैं।

इसी तरह बिहारशरीफ के एक डॉक्टर का मामला है जो पॉजिटिव रिपोर्ट आने के बाद हॉस्पिटल में भर्ती हो गए। अब ठीक हो गए हैं। उनका कहना है कि अस्पताल से लौटने के बाद लोग अब उनके साथ भेदभाव करने लगे हैं। मिलना-जुलना तो अब है ही नहीं, दुआ-सलाम भी बंद है।

इसी तरह जमालपुर के एक स्वस्थ हो चुके व्यक्ति को लोग कभी-कभी यमराज कह कर संबोधित करते हैं। खुद वार्ड काउंसलर रह चुके हैं। उनकी राशन की दुकान भी है। जाहिर हे कि उनके ताल्लुकात व्यापक हैं। उनके घर तक पर लोगों का बेधड़क आना—जाना था। लेकिन अब वे महसूस कर रहे हैं कि घर आकर बैठे रहने वाले लोग कन्नी काट रहे हैं। फोन उठाने से भी परहेज करते हैं।

जागरूकता की बयार गलत दिशा में बह रही है

ऐसे व्यवहार से साफ पता चलता है कि कोरोना के प्रति जागरूकता में अभी भी कमी है। सुरक्षा के लिहाज से कोरोना से बचाव तो ठीक है लेकिन निरोग हो जाने वालों से नफरत तो अच्छी बात नहीं है। इससे तो कोरोना के खिलाफ लड़ाई कमजोर ही होगी। संभव है कि अन्य निरोग हो चुके लोगों के साथ भी ऐसा कुछ हुआ हो। ये तो कुछ उदाहरण हैं।

इस बारे में आईजीआईएमएस, पटना के कम्युनिटी मेडिसिन के हेड डॉ. संजय कुमार का कहना है कि पॉजिटिव हुआ मरीज निगेटिव हो जाता है तो वह पूरी तरह स्वस्थ रहता है। फिर भेदभाव या शक करना गलत है। कोरोना किसी को चपेट में ले सकता है। चाहे वह समाज का कोई भी है।

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इसी तरह पटना के एनएमसीएच में कोरोना रोगियों की सेवा में लगे डॉ. मुकुल सिंह का कहना है कि ठीक हुए मरीजों से संक्रमण फैलने की आशंका नहीं रहती है, क्योंकि उनकी इम्यूनिटी भी बेहतर हो जाती है। ऐसे मरीजों से भेदभाव करना सही नहीं है।

कही यह सोशल डिस्टेंशिंग शब्द का दुष्परिणाम तो नहीं

कोरोना से लड़ने के लिए सबसे अचूक अस्त्र के रूप में सोशल डिस्टेंशिंग को बताया गया। इसका शाब्दिक अर्थ होता है सामाजिक दूरी। अब लोगों ने इसी अर्थ को ज्यादा ग्रहण किया है। क्योंकि इसी अर्थ में इसे सबसे ज्यादा प्रचारित किया गया है। सरकार को इस शब्द के प्रचार-प्रसार पर पुनः ध्यान देना चाहिए। इसके बदले फिजिकल डिस्टेंशिंग यानी शारीरिक दूरी ज्यादा बेहतर शब्द है। सोशल डिस्टेंशिंग शब्द ने समाज में अलगाव के बीज बो दिए हैं।

क्योंकि इस शब्द का दायरा बहुत बड़ा है। जबकि कोरोना से लड़ने के लिए हमसे सरकार बस इतना कहना चाहती थी कि हमें एक-दूसरे से शारीरिक दूरी बनाकर रखना है ताकि कोरोना का वायरस एक-दूसरे को संक्रमित न कर सके। लेकिन हमने अज्ञानता वश अंग्रेजी की सोशल डिस्टेंशिंग शब्द को अंगीकार कर लिया और इसे ही प्रचारित करने लगे। अंग्रेजों को तो इसका भावार्थ मालूम हो सकता है लेकिन भारतीय आज भी भारतीय ही है, अतः वे इसका भावार्थ नहीं समझ सकते। उन्होंने इसके शाब्दिक अर्थ को ही ज्यादा समझा है।

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ऐसे में अब सरकार को अपनी गलती सुधारते हुए इस शब्द के जगह नई शब्दावली का प्रयोग करना चाहिए। समय रहते यदि हम नहीं चेते तो इस गलती की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी और सदियों से जो हम सामाजिक सौहार्द की बात करते आ रहे हैं उसको बहुत बड़ा धक्का पहुंचेगा।

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