नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। न्यूरो सर्जन डॉ.सुशील भसीन से बातचीत के क्रम में अब तक आपने सिर में चोट लगने से लेकर न्यूरो तक के बारे में विस्तार से जाना। यह बातचीत ‘स्वास्थ्य की बात आशुतोष के साथ’ यानी यूट्यूब के The thermometer के दूसरे एपिसोड में हुई थी। इस हिस्से में नींद को लेकर मेडिकल साइंस की सोच के बारे में डॉ. भसीन क्या कुछ बताया, पढ़ा जाना चाहिए।
#The thermometer
आशुतोष: आजकल के युवा इतना स्ट्रेस में रहते हैं कि नींद तो आती ही नहीं। ऑफिस, काम, पढ़ाई, करियर का स्ट्रेस है। ऐसे में कैसे बैलेंस किया जाए?
डॉ. भसीन: यह एक पर्सनल रिसॉल्व है। मैं युवा वर्ग से कहना चाहूंगा कि वे अपने पर ध्यान दें। बैलेंस डाइट लें। पर्याप्त नींद लें। नींद में ही सारी चीजें रिपेयर होती हैं, मेमोरी बनती है, लर्निंग होती है। हर चीज नींद में होती है। अगर कोई अपनी बॉडी भी बना रहा है, मसल बनाने के लिए वो डंबल मारता है। वो सोएगा तभी मसल बनेगा। सोएगा नहीं तो मसल नहीं बनेगा। कितना भी डंबल मार ले।
आशुतोष: ये जो मोबाइल है और जो यूथ है और ये जो 5G, 6G टेक्नोलॉजी भी है और स्वास्थ्य है। ये जो चार चीज है, इसको कैसे बैलेंस करेंगे?
डॉ. भसीन: इसको बैलेंस करना बड़ा जरूरी है। मैं ये नहीं कहता कि टेक्नोलॉजी फिजूल है। आजकल पूरी दुनिया आपके हाथ में है। नई टेक्नोलॉजी उपयोग के लिए है। लेकिन संतुलन होना चाहिए। संतुलन नहीं रखेंगे तो फिर दुख पाएंगे। सोना बहुत जरूरी है। आपकी बॉडी को रेक्यूपरेट करने के लिए जो समय चाहिए वो आपको देना चाहिए।
आशुतोष: कितना घंटा?
डॉ. भसीन: कम से कम 7 घंटे। किसी भी ग्रुप में छह घंटे पक्का होना ही चाहिए। एक स्लीप की साइकिल है जिसको कहते हैं नॉन रैपिड आई मूवमेंट, स्लीप और रैपिड आई मूवमेंट स्लीप। यह डेढ़ घंटे का होता है और कम से कम चार स्लीप साइकिल्स हमको रात को चाहिए तो छ: घंटे तो मिनिमम चाहिए। जितना जगना जरूरी है, उतना ही सोना भी।
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आशुतोष: एक चीज बता दूं कि हमने एक प्रयास शुरू किया है। मैं स्विच ऑफ डे करके एक कैंपेन शुरू किया है। यह ‘स्वस्थ भारत मीडिया’ की पहल है और हमारे साथी भी ऐसा कर रहे हैं कि जब 2 घंटा हम अपने मोबाइल को स्विच ऑफ कर सकते हैं तो और अधिक भी इसे कर सकते हैं। आपको क्या लगता है कि इस दौर में मोबाइल स्विच ऑफ करके भी हम चल सकते हैं?
डॉ. भसीन: बिल्कुल चल सकते हैं और करना भी चाहिए। डिजिटल डिटॉक्स बहुत जरूरी है। हम लोग डिजिटली एडिक्टेड हैं। फोन को एरोप्लेन मोड में रखना बहुत जरूरी है क्योंकि रात को सोते समय अगर आपका फोन साथ में पड़ा है तो उसको जरूर स्विच ऑफ करिए क्योंकि जो मैग्नेटिक रेडिएशंस हैं वे हमारे दिमाग पर बहुत ज्यादा प्रभाव डालती है और नींद के साइकिल को तोड़ती है।
आशुतोष: ये तो मोबाइल की बात हुई। लेकिन थोड़ा सा मानसिक रूप से संतुलित होने की जरूरत भी तो है? यह भी कहीं ना कहीं न्यूरो का ही मामला है।
डॉ. भसीन: मानसिक संतुलन रखना जरूरी है। आप दिनभर क्या करते हैं? आपकी दिनचर्या क्या है? आपकी कंपनी क्या है? आपके दोस्त क्या हैं? आप किस सोशल सर्कल में घूम रहे हैं? ये सब कुछ आपकी मानसिक स्थिति को प्रभावित करती है। तो लेट नाइट पार्टी, बार में जाना और उसके बाद ड्रग्स एंड ड्रिंक्स…ये सब मानसिक मानसिक स्थिति को प्रभावित करते हैं। इन सबको बैलेंस करें। अल्कोहल और स्मोकिंग से तो दूर ही रहें।
आशुतोष: सामाजिक स्तर पर भी हमने देखा कि फैमिली में दो चार पांच लोग हैं। किसी को अचानक मूड स्विंग हुआ, मतलब व्यवहार बदल गया। घर के लोगों को लगता है कि इसका मन बहस गया। लेकिन कोई ये नहीं सोचता कि कहीं मानसिक रूप से कोई समस्या आ गई?
डॉ. भसीन: जो ब्रेन है हमारा, वह बहुत सारे न्यूरोकेमिकल्स के साथ कंट्रोल हो रहा है। ब्रेन में सर्किट्स बनती है। सोच की सर्किट, समझ की सर्किट, हर चीज सर्किट है और सर्किट में केमिकल्स चाहिए। मूड सारा यहां पर है। मूड के लिए अलग केमिकल्स है जिसको कहते हैं सिरोटनंस। फील गुड केमिकल्स हम कहते हैं। कुछ लोगों की समस्या कुदरती होती है, कुछ बाहरी और अंदरुनी वातावरण से प्रभावित होते हैं। उसे एंडोजेनस और एक्सोजेनस कहते हैं। तो वो केमिकल्स का सारा मिश्रण और बैलेंस है। हम रेस्टोर कर देते हैं उसका व्यवहार और बैलेंस भी। दीपिका पाडुकोने ने भी एक मुहिम शुरू किया डिप्रेशन पर। हम बच्चों पर प्रेशर डाल तो रहे हैं पर हैंडल करने की विधि नहीं बता रहे हैं। कई बार रात में चलने की बीमारी हो जाती है। नींद में हैं, उठे और चलने लगे। ऐसे सिम्टम्स को लाइटली नहीं लेना चाहिए। ये सब चीजें ट्रीटेबल और क्यरेबल हैं। लोग तो नींद में बातें भी करते हैं। चोरी करके भी आ जाते हैं। इसे क्लप्टोमेनिया जिसको कहते हैं।
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आशुतोष: सपनों के बारे में आप क्या कहेंगे?
डॉ. भसीन: ये जो सपने हैं ना, उसे कहते हैं रैपिड आई मूवमेंट स्लीप। उसमें आदमी लगभग जग जाता है। नींद के अंदर हमारा करंट ब्रेन में चल रहा होता है और उसके बड़े सारे वेव्स होती हैं। अल्फा वेव्स, बीटा वेव्स, थीटा वेव्स और डेल्टा वेव्स। डेल्टा वेव्स में सबसे गहरी नींद होती है। सबसे गहरी नींद के बाद फिर यह साइकिल ऊपर जाता है। आदमी लाइट नींद की तरफ आता है। गहरी नींद में आंखें नहीं हिलती। लाइट नींद में आंखें हिलने लगती हैं। उसे आई बॉल्स कहते हैं और तब सपने आने शुरू होते हैं। इंटेलिजेंस के लिए सपने की नींद बहुत आवश्यक है और इसके बाद फिर आदमी दोबारा गहरी नींद में चला जाता है। फिर लर्निंग होती है। फिर सपने में आता है। फिर जाता है। ऐसे चार साइकिल्स बड़े जरूरी हैं जो नींद के लिए हमें चाहिए। और जो चौथी नींद के बाद सपना आता है, उसके बाद आदमी की नींद खुल जाती है। इसलिए कई बार मैं सोचता हूं कि लास्ट सपना याद रह जाता है और उसके पहले जो तीन सपने होते हैं, आदमी भूल जाता है। अमूमन लोग कहते हैं कि सुबह का जो हमने देखा वो याद रहता है। वो याद है क्योंकि उसके बाद नींद खुलती है। सपना भी एक साइंस है जिसके ऊपर बहुत सारी रिसर्च हो रही है।
आशुतोष: हम अपने ब्रेन को कैसे सुरक्षित और स्वस्थ रखें।
डॉ. भसीन: वही तीन चार चीजें हैं—अनुशासित जीवन। टाइम से उठें, टाइम से खाएं, टाइम से सोएं। व्यायाम करें और खूब किताबें पढ़ें क्योंकि ब्रेन में एक चीज कहते हैं न्यूरोप्लास्टिसिटी। अगर आप चाहते हैं कि आपका ब्रेन बूढ़ा ना हो तो कुछ ना कुछ नई-नई चीजें सीखते रहिए। उससे नए कनेक्शन बनते हैं। काम देते रहिए। जो मेमोरी लॉस होता है वो इससे नहीं होगा। आप नई चीज करते रहिए। ब्रेन डेवलप होता रहेगा। इवॉल्व होता रहेगा। म्यूजिक से ब्रेन की प्लास्टिसिटी, ब्रेन की डेवलपमेंट होती है। ब्रेन के कनेक्शंस बढ़ते हैं।
(समाप्त)
