नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। यू—ट्यूब के The thermometer के 7वें एपिसोड में पोषण और पब्लिक हेल्थ विशेषज्ञ डॉ. अनन्या अवस्थी ने बताया था कि इसका दायरा काफी बड़ा है। पोषण हर घर, उम्र के लिए नितांत जरूरी है। उनसे स्वस्थ भारत मीडिया के समूह संपादक आशुतोष कुमार सिंह ने बातचीत की थी। बातचीत के इस हिस्से में बता रही हैं कि बच्चों को पोषण देकर इम्युनिटी मजबूत बनाना बहुत जरूरी है। प्रस्तुत है उनसे बातचीत का अंतिम हिस्सा…
आशुतोष: आपने बच्चों के पोषण की बात की। लेकिन ग्रामीण और सामान्य लोगों के बच्चे अभी भी कुपोषित हैं। ये कुपोषण क्या है और इससे कैसे निजात मिले? अगर हम घर में हैं तो कैसे अपने बच्चों का ख्याल रखें?
डॉ. अनन्या: बच्चों में कुपोषण के बारे में हर मां—पिता को पता होना चाहिए। यह पैदाईश से ही बच्चों में होता है। पांच-छ साल तक में कुपोषण का बड़ा खतरा रहता है। हाल का सरकारी सर्वे बताता है कि देश का हर तीसरा बच्चा कुपोषित है। इसमें दो-तीन बातें जाननी चाहिए। पहले महिलाओं की बात करें। मां गर्भवती है तो एनीमिया की जांच हो। मां को एनीमिया है तो बच्चे भी एनीमिक पैदा होंगे। डाटा कहता है कि हर दूसरी महिला एनीमिक है तो इसकी जरूर जांच कराएं। बच्चों में एनीमिया दिमाग भी कमजोर कर सकता है। इस प्रकार सबसे पहली चीज प्रेगनेंसी में मां का हेल्थ है। अगर एनीमिक है तो उसे आयरन, फोलिक एसिड की दवा चाहिए। जन्म घर में नहीं, हेल्थ सेंटर पर हो ताकि अगर मां—बच्चे को कोई परेशानी हो तो वहां पर ट्रेंड डॉक्टर सही से केयर कर पाएंगे। बच्चा पैदा होने पर स्तनपान कराएं। पहले छह महीने तक बच्चे को पानी की भी जरूरत नहीं होती है। पाउडर वाले दूध की ना सोचें। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन भी कहता है कि मां के दूध से इम्यूनिटी मिलती है। यह बच्चे को स्ट्रांग रखेगा। सर्दी—जुकाम से बचा रहेगा। जब बच्चा 6 महीने का हो जाए तो ऊपरी आहार शुरू करना जरूरी है। दाल, मैश किया हुआ चावल, बिना मसाले वाली कद्दू की थोड़ी-थोड़ी सब्जी, बिना चीनी या गुड़ से बना हलवा दें। जब दांत आने लगे तब सेमी सॉलिड फूड दें। वहां पर हम लोग पीछे रह जाते हैं। बच्चों को अच्छा पौष्टिक खाना खिलाने की आदत वहीं से डालनी होती है लेकिन बच्चे दूध पीते रहते हैं या बिस्किट खाने लगते हैं पर सब्जी और फल नहीं खाते। उससे भी बहुत ज्यादा कुपोषण होता है। उसी के साथ साफ सफाई, हैंड वाशिंग, सैनिटेशन भी है जो पोषण के सूत्रों में आता है। इसके कारण उम्र तो बढ़ती है लेकिन हाइट और वजन नहीं। इसे ठिगनापन कहते हैं। डाटा है कि भारत में हर तीसरा बच्चा ठिगना है।
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आशुतोष: अगर ऐसा होता है उसके लिए क्या टिप है?
डॉ. अनन्या: अभिभावक जरूर अपने नजदीकी आंगनबाड़ी केंद्र में अपने बच्चे को रजिस्टर करवाएं। पोषण ट्रैकर ऐप है जिसे डाउनलोड कर सकते हैं। हर महीने भारत सरकार पोषण ट्रैकर के माध्यम से सात से आठ करोड़ बच्चों की हाइट—वेट की ट्रैकिंग कर रही है। यह जांच करें कि क्या आपका बच्चा कुपोषण की कैटेगरी में तो नहीं है। ग्रोथ मॉनिटरिंग को बच्चों के डॉक्टर के पास भी जाकर चेक करा सकते है। बच्चा कुपोषित है तो उसका असर उसकी इम्यूनिटी पर पड़ सकता है जिससे वे ज्यादा बीमार पड़ते हैं। ऐसे बच्चों का आईक्यू लेवल भी कम देखा गया है। ऐसे बच्चे स्कूल में फोकस नहीं कर पाते हैं। तभी मिड डे मील के माध्यम से सरकार स्कूल में भोजन की व्यवस्था करती है। बच्चे कम से कम खाना खाने के चक्कर में स्कूल तो आएंगे।
बच्चे की फिजिकल, मेंटल ग्रोथ और ब्रेन का भी ग्रोथ हो। पैदा होने से 5 से छ साल तक 90 फीसद बच्चे का ब्रेन विकसित हो जाता है। आगे के सालों में लोग बच्चों पर हजारों—लाखों रुपए बच्चे खर्च करते हैं। इसलिए शुरू के पांच से छ साल में उसके खान—पान, साफ सफाई और विकास पर फोकस करें। रिसर्च दिखा रही है कि अगर आप बहुत जल्दी जंक फूड की आदत डाल देंगे तो इन बच्चों में मोटापे, बीपी का खतरा होता है। पांच से 6 साल नींव का समय है। इसी समय उसे मजबूती देनी होती है।
आशुतोष: एक बात ये भी है कि बिना मोबाइल लिए आज के बच्चे नहीं खा रहे हैं। यह समस्या अब तो महामारी की तरह बढ़ रही है।
डॉ. अनन्या: एकदम। यह सिर्फ भारत में नहीं, बाहर भी यही हो गया है। बच्चे को खाना खिलाना बहुत ही धैर्य का काम है। इसमें बहुत प्यार और बहुत सीख भी जुड़ी हुई है। मां के अलावा पिता का इसमें रोल होना चाहिए। आपके इमोशन से बच्चा धैर्य सीखता है। दूसरी बात कि आप किस इनर्जी से खाना खिला रहे हैं। बड़ा आसान है कि आपने कुछ कार्टून चला दिया और बच्चे को कहा दिया कि तुम्हें टीवी दिखाएंगे, तुम बस खाना खा लो। अब तो माइंडफुल ईटिंग पर रिसर्च भी आ गई कि किस स्थिति में आपने खाना खिलाया है। बच्चे जो स्क्रीन देख रहे हैं वह कहीं ना कहीं उनके अवचेतन में जा रहा है। इसमें बच्चों से ज्यादा उनके मां—पिता ही दोषी हैं। कोशिश कीजिए कि 2 साल तक के बच्चे को स्क्रीन ना दिखाएं। खाना खाने के टाइम को नो स्क्रीन टाइम रखा जाए। डाइनिंग टेबल पर खान—पान का ही माहौल बनाएं। आजकल बच्चों के मुंह में चम्मच से खाना डाला जा रहा है। उसे हाथ से खानें दें भले ही उनके कपड़े गंदे हो जाए। अब तो अमेरिकन रिसर्च कर बता रहे हैं कि कैसे उंगली से खाना खाने से बच्चों की इम्यूनिटी और बढ़ती है। कोई अलग-अलग कमरे में नहीं खाए। सब एक जगह बैठ कर खाएं। इससे फैमिली का बॉन्डिंग भी मजबूत बनेगी। खान—पान पर ही बात करें तो बच्चे की रुचि भी बढ़ेगी। माइंडफुल ईटिंग, नो फोन टाइम, नो स्क्रीन टाइम से हालत सुधरेगी। इसके लिए माता-पिता को खुद पहल करनी होगी। बच्चों के बीच पोषण, स्वास्थ्य आदि के बारे में बात करें।
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आशुतोष: आप तो लेखिका भी तो हैं। ‘लिविंग द विवेकानंद’ निखिल यादव जी के साथ मिलकर लिखा है। उसके बारे में भी बताएं।
डॉ. अनन्या: मैं विवेकानंद केंद्र, दिल्ली से जुड़ी रही हूं और उसी केंद्र के माध्यम से स्वामी विवेकानंद जी के पूरे काम, उनकी लाइफ, उनके टीचिंग्स के बारे में पता चला। मैं और डॉक्टर निखिल यादव सालों से दिल्ली यूनिवर्सिटी में यूथ के साथ स्वामी विवेकानंद के मैसेज को आगे ले जाने की कोशिश कर रहे थे। हम चाहते थे कि स्वामी जी की ऐसी क्या बात थी जिसे उन्होंने इतने सालों पहले विश्व के सामने रखा और आज भी हम क्यों इसके बारे में बात कर रहे हैं? इसी को समझाने के प्रयास में किताब निकालने की बात सोची। सच्चाई ये है कि आध्यात्म हो या स्पिरिचुअलिटी, स्वामी जी खुद कहते हैं कि ऐसा कोई भी दर्शन, धर्म है जो सिर्फ थ्योरी हो वो सिर्फ इंटेलेक्चुअल जिम्नास्टिक्स है, अगर वो प्रैक्टिकल नहीं है। स्वामी जी प्रैक्टिकल वेदांत की बात की और ये किताब प्रैक्टिकल स्पिरिचुअलिटी के बारे में है। अद्वैत वेदांत के बारे में है। यह कोई नई बात नहीं है। हजारों सालों पहले शंकराचार्य जी ने भी यही कहा। सजीव—निर्जीव सब एक ही मूल से आए हैं। एक एनर्जी से आए हैं और वहां से जाकर इस सृष्टि का पूरा निर्माण हुआ है। आपके मन में यह आ जाए तो फिर लड़ाई— दंगा, फसाद, सुपीरियरिटी—इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स सब खत्म। फिर सारी मेंटल हेल्थ की प्रॉब्लम्स खत्म होने लगती है।
आशुतोष: भारत के ओवरऑल स्वास्थ्य इकोसिस्टम हेल्थ इकोसिस्टम पर आपकी क्या राय है? यह कहां पर है? जो कमी है उसे कैसे दूर करना है?
डॉ. अनन्या: भारत में पब्लिक हेल्थ बहुत हद तक सरकारी व्यवस्था पर निर्धारित है। हम पोषण की ही बात कर लें। 14 लाख आंगनबाड़ी सेंटर है देश में। जरूरत है पब्लिक हेल्थ सिस्टम्स में बजट बढ़ाने की जरूरत है। क्यों? कि अंतिम पायदान के आदमी के पास पैसा नहीं है कि निजी क्लीनिक में जाकर अपना इलाज कराए। और भी कई तरह की हेल्थ संबंधी जरूरतें हैं। स्वास्थ्य और कुपोषण के लिए टेक होम राशन चलता है। सरकार ने जरूर इस पर काम किया। डेटा देखें तो बताएगा कि कैसे नवजात या मातृ मृत्युदर में गिरावट आयी है। स्वच्छ भारत अभियान की वजह से इतने सारे गांव खुले में शौच से मुक्त हो गए हैं। इसका असर पोषण और स्वास्थ्य पर पड़ा है। वैक्सीनेशन, मिशन इंद्रधनुष का असर पड़ा है। इंस्टीट्यूशनल डिलीवरी बढ़ी है। कुछ एरियामें और काम होने की जरूरत है। पहला एरिया पोषण का है। इस पर आंगनबाड़ी को और सक्षम बनाना होगा। आंगनबाड़ी सहायिका पर बहुत दबाव है। मोटापा—ब्लडप्रेशर बढ़ा है। फिजिकल एक्सरसाइज लोग करते नहीं है। हेल्दी, घर का खाना नहीं खाना चाहते हैं। निचले स्तर के अफसरों की भूमिका बढ़े। आशा वर्कर, आंगनबाड़ी वर्कर आदि का पैसा बढ़े, प्रमोशन मिले। उनकी डिजिटल लिटरेसी बढ़े। डाटा रिकॉर्ड करने के साधन मिले। वेतन बढ़ेगा तो करप्शन कम होगा। करियर में ग्रोथ हो। डाटा कलेक्ट हो तो उसका सही उपयोग हो।
(समाप्त)
प्रस्तुति: अजय वर्मा
पहली कड़ी यहां पढ़ें-https://www.swasthbharat.in/the-thermometer-public-health-has-a-vast-scope-dr-ananya-awasthi/
