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सेहत से खिलवाड़ का Cutoff, छिड़ी बहस

सेहत से खिलवाड़ का Cutoff, छिड़ी बहस

-40 वाले भी पास तो कैसे बनेंगे स्पेशलिस्ट डॉक्टर?

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। केंद्र सरकार के नीट पीजी के चालू सत्र में एडमिशन के लिए नया कटऑफ (CUTOFF) जारी करने के बाद बहस छिड़ गई है। इस आदेश में SC, ST और OBC कैटेगरी के छात्रों के लिए क्वालिफाइंग कटऑफ 40 से घटाकर सीधे -40 अंक कर दिया गया है। इससे पेपर खाली छोड़ने वाले छात्र भी स्पेशलिस्ट बन सकेंगे क्योंकि इसमें निगेटिव मार्किंग की जाती है। इसका विरोध करने वाले इसे मेडिकल शिक्षा में गुणवत्ता पर हमला मान रहे हैं और कह रहे हैं कि निजी मेंडिकल कॉलेजों में सीट बेचने का रास्ता साफ हो जाएगा। उधर कटऑफ प्रतिशत घटाने को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की गई है। यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन, न्यूरोसर्जन सौरव कुमार, यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट के अध्यक्ष डॉ. लक्ष्य मित्तल और वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन के सदस्य डॉ. आकाश सोनी द्वारा दायर की गई है।

कटऑफ: गुणवत्ता पर असर

विवाद का पूरा मामला कुछ यूं है। 13 जनवरी को NBEMS ने नीट पीजी की कटऑफ संशोधित की। इस संशोधन में कटऑफ प्रतिशत को बहुत कम कर दिया गया, यहां तक कि शून्य कर दिया गया। इस बदलाव के बाद -40 अंक पाने वाला भी मेडिकल की पढ़ाई के लिए योग्य हो गया। नोटिस जारी होने पर इस फैसले का विरोध होने लगा। डॉक्टर संगठनों समेत अभ्यर्थियों का कहना है कि इससे मरीजों की सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और चिकित्सा पेशे की साख को गंभीर खतरा है। याचिका में कहा गया है कि यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करता है। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका में इसे संवैधानिक चुनौती बताते हुए कहा गया है कि पीजी मेडिकल शिक्षा के लिए योग्यता मानकों में की गई यह कटौती मनमानी है। याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि चिकित्सा कोई सामान्य पेशा नहीं है, बल्कि यह सीधे मानव जीवन, शारीरिक अखंडता और गरिमा से जुड़ा हुआ है। केवल खाली सीटें भरने के आधार पर इस तरह का निर्णय मेरिट को समाप्त करता है, प्रतियोगी परीक्षा को महज औपचारिकता में बदल देता है और जीवन से जुड़े क्षेत्र में पेशेवर मानकों के पतन को संस्थागत रूप देता है। पीजी स्तर पर मेरिट में की गई यह ढील राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 के वैधानिक प्रावधानों के विपरीत है।

कटऑफ: FAIMA भी चिंतित

उधर फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन (FAIMA) ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिखकर इस फैसले पर गंभीर चिंता और कड़ा विरोध दर्ज कराया है। उसका कहना है कि इस फैसले से न केवल मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी, बल्कि मरीजों की सुरक्षा पर भी सीधा खतरा पैदा हो सकता है। उसके पत्र में बताया गया है कि कटऑफ में इस अभूतपूर्व कटौती से ऐसे उम्मीदवार भी पीजी मेडिकल एडमिशन के लिए योग्य हो गए हैं, जिनके अंक शून्य या नकारात्मक हैं। इस लिहाज से यह मेडिकल शिक्षा के लिए खतरनाक आदेश है। फेडरेशन का कहना है कि इससे भविष्य में बनने वाले विशेषज्ञ डॉक्टरों की गुणवत्ता प्रभावित होगी, जिसका सीधा असर मरीजों की सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर पड़ेगा।

कटऑफ: उगाही का खेला

जानकारी हो कि 57500 पीजी सीटों के मुकाबले 128000 उम्मीदवारों ने NEET पीजी परीक्षा उत्तीर्ण की। ऐसे में योग्यता अंक कम करने की जरूरत ही नहीं रही। केवल 9000 सीटें खाली हैं और वो भी प्राइवेट कालजों में। पात्रता अंक कम करने के बजाय निजी कॉलेजों में फीस कम करना बेहतर होता। कुल 289 सरकारी मेडिकल कॉलेज के 27140 सीट पहली मेरिट लिस्ट से फुल हो गये,।बच गये 251 प्राइवेट मेडिकल कॉलेज के 19983 सीट, जिसमें 18000 सीट खाली रह गये थे। अब इन पर 12 फीसद अंक लाने वाले जनरल/ EWS कैटेगरी के छात्र एडमिशन लेंगे वह भी एक से 1.5 करोड़ फीस देकर। इस तरह 18000 सीट है तो एक का हिसाब रख लें तो 18000 करोड़ का व्यापार होगा। 12 फीसद अंक लाने वाले EWS उर्फ सवर्ण में सर्जन बन जायेंगे। प्राइवेट मेडिकल कालेज जब इतने फीस लेंगे तो पास करा कर ही दम लेंगे और इन्हें एम डी/एम एस की डिग्री दें देंगे। उस पर IMC का ठप्पा होगा। आगे चलकर यही डॉक्टर बड़े-बड़े भव्य अस्पताल खोलेंगे। मोटी फीस लेकर खर्च की भरपायी भी करेंगे। पैसों के लिए मरीजों की जान से खिलवाड़ होगा। बदनाम सिर्फ सरकार और मेरिट से पढ़ने वाले डॉक्टर समुदाय होंगें।

कटऑफ: घोटाले की बू

हेल्थ सेक्टर में माना जाता है कि मेडिकल शिक्षा तो स्वास्थ्य सेवाओं का बाय प्रोडक्ट है। यदि सही गणना की जाए तो एक MBBS या MD डॉक्टर को पढ़ाने में सरकार का खर्च BSc, Bcom या लॉ कोर्स से भी कम होता है। मेडिकल कॉलेज में कार्यरत अधिकांश शिक्षक अपना नब्बे प्रतिशत समय मरीजों के इलाज में देते हैं न कि शिक्षण कार्य के लिए। कॉलेज के अधिकांश संसाधन रोगियों के लिए होते हैं और रेजिडेंट डॉक्टर्स भी अपनी ट्रेनिंग के दौरान रोगियों का इलाज करते हैं। फिर भी गलत आंकड़े प्रस्तुत कर यह बताने का प्रयास किया जाता है कि एक डॉक्टर बनाने में बहुत खर्च होता है ताकि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की गैरवाजिब फीस को न्यायसंगत ठहराया जा सके। यह मेडिकल शिक्षा में घोटाले की तरह है।

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