नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। 10 डॉक्टरों से बातचीत के बाद टॉक शो The Thermometer का दूसरा सीजन शुरू हुआ है। The Thermometer.2 की पहली बातचीत दिल्ली के डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. भावुक धीर के साथ हुई। उनसे तरह—तरह चर्म रोग से लेकर बालों के प्रत्यारोपण आदि जरूरी मसलों पर सवाल—जवाब हुए जो आपके काम आ सकते हैं। इसमें उन्होंने बताया कि तरह—तरह चर्म रोगों को किन लक्षणों से पहचानें और कब एक्सपर्ट के पास आएं। उनसे बातचीत स्वस्थ भारत के समूह संपादक आशुतोष कुमार सिंह ने की है। प्रस्तुत है डॉ. धीर से हुई वार्ता का संपादित अंश…
#TheThermometer.2
आशुतोष: आम आदमी डर्मेटोलॉजिस्ट के पास कब जाता है या कब जाना चाहिए?
डॉ. धीर : डर्मेटोलॉजिस्ट या चर्म रोग विशेषज्ञ के पास किसी को तब जाना चाहिए जब चमड़ी की कोई ऐसी बीमारी हो रही है जिसमें आम दवाओं से आराम नहीं आराम नहीं मिल रहा हो। या कोई ऐसी बीमारी है जो पूरे शरीर की चमड़ी को प्रभावित कर रही है या ऐसी कुछ बीमारी जो बार-बार हो रही है जिसका हल नहीं निकल रहा है या चमड़ी में अचानक से कुछ ऐसे बदलाव नजर आ रहे हैं जो आपको समझ नहीं आ पा रहा है। इस परिस्थिति में आपको चर्म रोग विशेषज्ञ के पास जाने की ज़रूरत होती है।
आशुतोष: वैसे तो स्किन से संबंधित तमाम बीमारियां है। लेकिन पहले बाल झरने को लें क्योंकि अब बहुत कम उम्र में ही लोगों के बाल झड़ने लगे हैं। इसके पीछे क्या कारण है और इसकी रोकथाम है क्या?
डॉ.धीर: बाल झड़ने के बहुत से कारण होते हैं। इसमें काफी कारण हमारे शरीर के अंदरूनी तत्वों की कमी की वजह से होते हैं। जैसे खानपान की कमी, हार्मोन असंतुलन, स्ट्रेस और अन्य बीमारियों की वजह से भी बाल झड़ते हैं। कुछ ऐसी बीमारियां भी हैं जो जड़ से बालों को झाड़ने लगती हैं। हमें अच्छे तरीके से देखना पड़ता है कि इसका क्या-क्या कारण हो सकता है। टेस्ट आदि कराने के बाद ही हम उसकी तह तक पहुंचते और इलाज करते हैं।
आशुतोष: बाल झड़ने के टेस्ट होते हैं? क्या बताएंगे कि किस तरह के टेस्ट होते हैं?
डॉ. धीर: बाल झड़ने की शिकायत पर पहले हेयर पुल टेस्ट कराया जाता है जिससे हम बालों की पहचान करते हैं और देखते हैं किस एरिया से ज्यादा झड़ रहे हैं। उसके अलावा एक माइक्रोस्कोप हम इस्तेमाल करते हैं जिसे ट्राइकोस्कोप बोला जाता है। उससे भी हम बालों की जड़ों को एनालाइज करते हैं और देखते हैं कि क्या कमी है। फिर कुछ ब्लड टेस्ट होते हैं जिसमें हम खून के कुछ पैरामीटर्स को चेक करते हैं कि क्या-क्या उसमें ऊपर—नीचे हो रहा है जिस वजह से बाल झड़ रहे हैं। इन सब चीजों को एक साथ देखते हुए हम डायग्नोसिस पर पहुंचते हैं कि इस कारण से बाल झड़ रहे हैं। फिर उसके हिसाब से इलाज शुरू किया जाता है।
आशुतोष: अगर 20 साल या 25 साल के युवा का बाल झड़ने लगे तब क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
डॉ. धीर: उसका आम कारण होता है हार्मोनल हेयर लॉस। इसमें साइड से बाल पीछे होने शुरू हो जाते हैं। बीच में से भी बाल पतले होने लग जाते हैं। कुछ लोगों में ज्यादा होते हैं तो कुछ में कम। परिवार की हिस्ट्री के हिसाब से जब ये शुरू होता है तो कुछ जनरल प्रिकॉशंस जैसे अच्छा डाइट रखना, प्रोटीन आदि अच्छे से लेना चाहिए। यदि आप शाकाहारी हैं तो पनीर, दाल, ड्राई फ्रूट्स आदि चीजों को ज्यादा से ज्यादा सेवन करें। धूम्रपान से अक्सर बाल बहुत जल्दी पतले होने लग जाते हैं इसलिए इसे बिल्कुल अवॉइड करें। जिनको लगता है कि बाल उनके झड़ गए और शादी नहीं हो रही है तो फिर वे ट्रांसप्लांट की तरफ आते हैं।
आशुतोष: बालों का ट्रांसप्लांट भी होता है? यह कितना सेफ है?
डॉ. धीर: बिल्कुल होता है। जिनके बाल एक लिमिट से ज्यादा झड़ चुके हैं या पतले हो चुके हैं उन पर दवा का भी पूरी तरह से असर नहीं हो पाता और बाल वापस नहीं ला पाते। इस हालत में हेयर ट्रांसप्लांट किया जाता है जो आखिरी ट्रीटमेंट होता है। जहां तक सेफ्टी की बात है, हर सर्जिकल प्रक्रिया में कुछ ना कुछ रिस्क होते ही हैं। हेयर ट्रांसप्लांट में भी थोड़े बहुत रिस्क हैं। लेकिन बहुत खतरनाक प्रक्रिया नहीं है। अगर आपने किसी गलत जगह या अनक्वालिफाइड इंसान से हेयर ट्रांसप्लांट कराते हैं तो फिर रिस्क काफी बढ़ जाते हैं। ऐसे कई केस हुए हैं जब हेयर सैलूून, हेयर स्पा आदि जगहों पर जाकर लोगों ने हेयर ट्रांसप्लांट कराए हैं और इनफेक्शन पकड़ लेता है क्योंकि इंफेक्शन रोकने की जो प्रॉपर चीजें की जाती हैं वो अनक्वालिफाइड इंसान के पास नहीं हो सकती। वहां पर आपको बहुत कॉम्प्लिकेशंस हो सकती है या जान को खतरा देने वाले रिएक्शन भी हो जाते हैं।
आशुतोष: क्या जान का खतरा भी हो सकता है?
डॉ. धीर: बिल्कुल हो सकता है। पहले सुन्न करने के इंजेक्शन लगाए जाते हैं और जो इंसान वो कर रहा है अगर उनको नहीं पता कि ये कितना डोज देना है। अगर ज्यादा डोज चली गई तो क्या रिस्क है। ये सब बहुत बारीक चीजें होती है जो एक क्वालिफाइड स्पेशलिस्ट ही कर सकते हैं। नॉर्मल टेक्नीशियन या नर्सिंग स्टाफ से लोग करा लेते हैं। खर्चा देखकर भी लोग शॉर्टकट ढूंढते हैं और उस शॉर्टकट में फिर फंस सकते हैं जो ज्यादा खतरनाक और महंगा साबित होगा। अगर जान की बात आ गई तो जान से महंगा कुछ है ही नहीं।
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आशुतोष: सामान्यत: हेयर ट्रांसप्लांट में कितना खर्च आ जाता है?
डॉ. धीर: खर्चा बहुत कारणों से वेरी करता है। आप भारत के किस शहर में है, उसके हिसाब से रेट होते हैं। मार्केट वैल्यू से भी रेट निर्धारित होता है। आप दिल्ली में अगर ट्रांसप्लांट की बात करते हैं तो एक अच्छी जगह पर सारी फैसिलिटी के साथ ट्रांसप्लांट कराने में एक लाख से ऊपर खर्चा आता है। आप दूरदराज के हिस्सों में जाते हैं तो थोड़ा सा अंतर आता है। लेकिन एक अच्छे क्वालिफाइड डॉक्टर से आप ट्रांसप्लांट कराने जाएंगे तो 80 हजार से कम में तो नहीं हो पाएगा।
आशुतोष: हेयर ट्रांसप्लांट कराने में कितना समय लगता है?
डॉ. धीर: वैसे तो यह एक दिन में हो जाता है। कई लोगों में दो दिन लगते हैं। 8 से 10 घंटे का काम है। सब कुछ इस पर निर्भर है कि हम कितने बाल डाल रहे हैं। उनके वापस आने में छह से लेकर नौ महीने तक का समय लगता है। पहले दो—तीन महीने में हमारे लगाए बाल झड़ जाते हैं। फिर रीग्रोथ शुरू होती है और इस पूरी प्रक्रिया में छ: महीने तक लग जाता है।
आशुतोष: इसका एल्गोरिदम क्या है?
डॉ. धीर: ये एल्गोरिदम ऐसा है कि जब हम इंप्लांट करते हैं तब एक स्ट्रेस इंड्यूस एफ्लूवियम करके कंडीशन होती है। बेसिकली सर्जरी के स्ट्रेस की वजह से जो हमने ट्रॉमा करा है स्किन में तो बाल रिएक्ट करते हैं। तो पहले दो-तीन महीने में बाल झड़ जाते हैं और फिर वो वापस आना स्टार्ट होते हैं। जब पूरा ब्लड फ्लो बन जाता है, खून की नसें पूरी बन जाती है तब बाल बाहर निकलने शुरू होते हैं। तभी छ: से 9 महीने का समय लगता है।
आशुतोष: भारत के दृष्टिकोण से बात करें तो पांच ऐसे कॉमन चर्मरोग कौन—कौन हैं जिसके लिए लोग चर्म रोग विशेषज्ञ के पास आते हैं?
डॉ. धीर: एक नंबर पर फंगल इंफेक्शन या टीनिया है। यह आम रोग है और बहुत फैल भी रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण है गलत इलाज। जब फंगल इंफेक्शन होता है तो लोग केमिस्ट से ट्यूब या क्रीम खरीद लेते हैं या एंटी फंगल ले लेते हैं। दुख की बात यह है कि बाजार में एंटीफंगल स्टेरॉयड एंटीबायोटिक क्रीम मिलाकर क्रीम मिलती है जो बहुत सस्ती है। इससे स्किन खराब होने लग जाता है और इंफेक्शन धीरे-धीरे चमड़ी को अंदर से खोखला कर देता है। जब यह सारी दवाइयां असर करना बंद कर देती है लोग हमारे पास आते हैं और तब इलाज बहुत मुश्किल हो जाता है।
आशुतोष: इस तरह की क्रीम का मॉलिक्यूलर, साल्ट क्या है?
डॉ. धीर: आमतौर पर क्लोबेटासोल नाम का स्टेरॉयड होता है। टर्बीनाफिन क्लोट्रमाजोल क्रीम होती है। उसके अलावा कई लोग इट्रागोनजोल की भी क्रीम में डाल के दे देते हैं और एंटीबायोटिक के तौर पर या ऐसी कुछ अलग-अलग क्रीम उसमें डली होती हैं। इन सब साल्ट के उपयोग का कोई मतलब नहीं है। भारत सरकार डीजीसीए के द्वारा ये कॉम्बिनेशन क्रीम बैन कर चुकी है। लेकिन अभी भी आसानी से मिल रहा है। इस पर सरकार को ध्यान देने की जरूरत है।
आशुतोष: आप बड़ी बात बता रहे हैं कि कानूनी रूप से बैन तो कर दिया पर लागू कितना हो पा रहा है, इस पर ध्यान देने की जरूरत है।
डॉ. धीर: बिल्कुल। एंटी फंगल दवा भी इसीलिए काम करना बंद कर रहा है और इतना फैल भी रहा है। जब एंटीफंगल रेजिस्टेंस बढ़ा रहेगा तब इसका इलाज बहुत मुश्किल हो जाता है। तीन से छ: महीने तक इलाज चलता रहता है फिर भी ठीक नहीं होता है। दवा बनी है मतलब यह नहीं कि उसका गलत उपयोग करें।
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आशुतोष: दूसरा कौन कॉमन चर्मरोग है?
डॉ. धीर: दूसरी बीमारी है एग्जिमा। एग्जिमा काफी एक आम बीमारी है जो घर में किसी ना किसी को हमारे होती ही है। तो एग्जिमा या ड्राई स्किन या सूखेपन की जो प्रॉब्लम है उसके साथ भी काफी मरीज आते हैं हमारे पास। और उसके लिए भी इलाज जो रहता है वो कितने हिस्से में आपको एग्जिमा फैला है उसके हिसाब से करा जाता है। एग्जिमा नाम है एकिमा कहने से मतलब जो लालिमा और फिर खुजली उस तरह से हां देखो लालिमा और खुजली स्किन की काफी बीमारियों में होती है तो सिर्फ उससे एकिमा को पहचानना मुमकिन नहीं है। एक्सिमा में और भी कई चीजें देखी जाती हैं कि चमड़ी का जो हमें निशान बना है उसमें कुछ बारीकी से हम लोग देखते हैं कि खुरदरापन और स्केलिंग करके एक चीज होती है वो देखी जाती है। एक्सिमा के भी काफी प्रकार होते हैं। उन सब चीजों में जाना या समझाना मुश्किल है। इस तरह से समझाना मुश्किल है। हां लेकिन एक बार कम से कम चरण रोग विशेषज्ञ को दिखा करके अपना जो डायग्नोसिस है वो आप बनवा लें। भले ही इलाज फिर बाद में आप कंटिन्यू रखें क्योंकि एग्जिमा और फंगल इंफेक्शन नहीं पहचान पाते ज्यादातर लोग और उसी वजह से स्टेरॉइड और एंटीफंगल मिला के दे देते हैं क्योंकि वो दोनों का इलाज कर देता है कहने के और लोगों को लगता है कि ठीक हो गया। हां तो इसी कारणवश ही ये सारी प्रॉब्लम है कि पहचान नहीं है।
आशुतोष: सोरियासिस भी एक प्रमुख बीमारी है। ये क्या है और इसे किस तरह हम पहचानें?
डॉ. धीर: सोरियासिस एक काफी आम बीमारी है जो एक ऑटोइम्यून बीमारी है। शरीर में जो इम्यून सिस्टम है वो ओवरएक्टिव होने के कारण चमड़ी की लेयर बनती है। नॉर्मल इंसान में यह कई गुना ज्यादा तेजी से बनने लगती है और जितनी तेजी से वो बनती है, उतनी तेजी से झड़ नहीं पाती है। इस कारण एक पपड़ी जम जाती है। इसे सिल्वर स्केल्स बोलते हैं। यह एक के ऊपर एक जम जाते हैं। सफेद रंग की मोटी पपड़ी बन जाती है। इसका असर सिर पर भी होता है, नाखूनों पर भी। इसका इलाज मुमकिन है। आज काफी दवाइयां आ गई हैं सोरियासिस के इलाज के लिए। जड़ से हम नहीं खत्म कर पाते पर हम 99% तक इसको कंट्रोल कर रख सकते हैं। धीरे-धीरे जब खत्म होता है तो नियंत्रित रहता है।
आशुतोष: जब भारत आजाद हुआ था उस समय भारत में कुष्ठ रोगियों की संख्या बहुत थी और उसको लेकर बहुत अभियान चलाए गए। उस समय तो गांधी जी भी कुष्ठ रोगियों के यहां जाकर उनकी सेवा करते थे। कुष्ठ रोग की स्थिति अभी भारत में क्या है?
डॉ. धीर: भारत में अभी भी कुष्ठ रोग का प्रकोप है। यह गलतफहमी है कि कुष्ठ रोग खत्म हो चुका है। पब्लिक हेल्थ सिग्निफिकेंस के हिसाब से उसका एलिमिनेशन जरूर हो गया है। इतनी मात्रा नहीं रही कि हम उसके लिए बहुत ज्यादा घबराएं या रिसोर्सेज लगाएं। लेकिन अभी भी कई मरीजों का इलाज चल रहा है और नए मरीज भी आ रहे हैं। यह रोग पहले से जरूर कम हो रहा है। धीरे-धीरे हम उस स्थिति पर पहुंच रहे हैं कि उसे पूरी तरह से हटा पाएंगे। लेकिन जब तक वो पूरी तरह से नहीं हट रहा तब तक उसके बारे में जानना और उसका इलाज समझना बहुत जरूरी है।
आशुतोष: लोग कहते हैं कि यह छुआछूत की बीमारी है। ऐसा कुछ है क्या? किसी को उससे कैसे बचाएं या जिसे हो गया, उसको उपचार कैसे दिलाएं?
डॉ. धीर: ऐसा पहले माना जाता था। आज उसके फैलने का तरीका है वो नजदीकी संबंध में है। जो लोग आपस में काफी समय से साथ रह रहे हैं। एक परिवार में साथ रह रहे हैं या लंबा समय साथ बिता रहे हैं, उन लोगों में ट्रांसमिशन देखा गया है। एक बार छूने से नहीं फैलता वो। इसीलिए आपने देखा होगा कि गांधी जी हों, मदर टेरेसा हों, इन सब ने कभी भी कुछ रोगी को छूने से परहेज नहीं किया। हम डॉक्टर भी कुष्ठ रोगी को छूने से नहीं घबराते क्योंकि एक बार छूने से वो नहीं फैलता है। सबसे ज्यादा उसका जो प्रमाण पाया गया नेजल सैक्रेशन। नाक के अंदर जो सेक्रेशंस होती है, उसमें बैक्टीरिया का सबसे ज्यादा संक्रमण होता है तो इसीलिए वो एरोसोल रूट से भी फैलता है और नजदीकी समय साथ बिताने से फैलने का रिस्क होता है।
आशुतोष: मतलब एक परिवार में अगर किसी को हो गया है तो दूसरे को होने की आशंका है। वहां पर बचाव की जरूरत है। इस हालत में सेपरेशन या अलग रखने की बात पर आप क्या कहेंगे?
डॉ. धीर: सेपरेशन तो नहीं पर मैं सलाह दूंगा कि अगर एक इंसान को कुछ रोग डायग्नोस हुआ है तो परिवार को भी सारे चेकअप कराने हैं और जल्द से जल्द इलाज शुरू कराना है। इलाज शुरू कराने के एक महीने के अंदर ही कुछ रोग फैलने के चांस बहुत कम हो जाता है। अलग रहने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। आज दवाइयां बहुत इफेक्टिव है। एक बार इलाज शुरू हो जाता है तो साथ रह करके खुशी-खुशी टाइम बिता सकते हैं।
आशुतोष: एक और बीमारी है सफेद दाग की। वर्तमान समय में भारत में सफेद दाग की क्या स्थिति है और यदि है तो वो उससे कैसे प्रिवेंट किया जाए? इसको लेकर गांव में बहुत ज्यादा भ्रांतियां अभी भी हैं।
डॉ. धीर: सफेद दाग भी स्किन की ऑटोइम्यून बीमारी है जिसमें इम्यून सिस्टम में जाकर हमारे जो कलर बनाने वाले सेल होते हैं, उनको खराब कर देता है। इससे रंग बनाने की शक्ति कम हो जाती है। उस वजह से सफेद निशान बनते हैं। लेकिन इसके इलाज काफी आ गए हैं। लाइलाज बीमारी तो है पर हम दवाइयों से कंट्रोल रख सकते हैं। खासकर तब जब शुरुआत में हमारे पास मरीज आए। बहुत देरी करने पर पूरे सफेद निशान बन जाते हैं तब इलाज थोड़ा सा मुश्किल और सीमित हो जाता है। खासकर जब बहुत सारे हिस्सों में फैलाव हो। अगर एक या दो जगह पर है फिर तो हम काफी तरीकों से उसके कलर को वापस ला सकते हैं।
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आशुतोष: अगर किसी को सफेद दाग है तो उसकी शादी नहीं होती। शादी और सफेद दाग का कोई संबंध है क्या?
डॉ. धीर: शादी और सफेद दाग का कोई संबंध नहीं है। सफेद दाग सिर्फ चमड़ी तक सीमित बीमारी है। बाकी शरीर पर उसका कोई असर नहीं होता। उसके अलावा लोगों का यह मानना है कि छूने से फैलती है या ऐसे इंसान से शादी करने से आपको भी सफेद दाग हो जाएगा, यह भी गलत है। यह सिर्फ चमड़ी का एक रोग है जो और बीमारियों की तरह ही है। तो शादी ना होने का यह कारण नहीं होना चाहिए। कोई वैज्ञानिक कारण भी नहीं है। वैज्ञानिक कारण अगर एक है, तो बस यह है कि शादी अगर आपकी ऐसे इंसान से होती है जिनको सफ़ेद दाग है, तो आपके बच्चों में सफ़ेद दाग होने का थोड़ा सा चांस रहता है। बस वही एक कारण है जिस वजह से लोग कतराते हैं। लेकिन सामान्य जीवन तो भी जी सकता है। उनको एक्सेप्टेंस की जरूरत है ना? कम्युनिटी का सपोर्ट और एक्सेप्टेंस चाहिए। वो तभी होगा जब हम इस बीमारी को पहचानेंगे और ये जानेंगे कि इसका शरीर पर कोई और असर नहीं है।
आशुतोष: यौन रोग से भी संबंधित कुछ बीमारियां है जिसको लेकर मरीज आपके पास आते हैं।
डॉ. धीर: बिल्कुल। यौन रोग से संबंधित जो बीमारियां हैं वो ज्यादातर चमड़ी पर अपना असर दिखाती हैं। यौन रोग का जल्दी इलाज करना बेहतर होता है क्योंकि शुरुआत में इलाज आसान होता है। जैसे-जैसे हम देरी करते हैं, वो और जगह फैल सकता है और आपसे और लोगों को भी फैल सकता है। तो यौन रोग का कभी भी आपको संदेह हो खुद से इलाज करने की कोशिश ना करें। केमिस्ट—फार्मासिस्ट से दवाई ना लें। एक बार आकर दिखाएं और प्रॉपर उसका इलाज जल्द से जल्द कराएं।
आशुतोष: यौन रोग में किस तरह के लक्षण हों तो डॉक्टर के पास आना चाहिए?
डॉ. धीर: यौन रोग में सबसे आम लक्षण होता है छाले पड़ जाना। पेशाब के रास्ते पर छाले होना। उसके अलावा मस्से या एक ग्रोथ मतलब उगना। आपके पेशाब के रास्ते पर कुछ निशान या धब्बे निकल रहे हैं तब भी आपको एक बार उसको चेक कराना जरूरी हो जाता है। उसके अलावा पेशाब में जलन, पेशाब करते हुए मवाद आना या पेशाब के रास्ते की टिप पर मवाद बनना तो ऐसी सिचुएशन में आपको यौन रोग का इलाज कराना है। उसके अलावा और भी कुछ यौन रोग होते हैं जिसमें शरीर में निशान निकलते हैं। हाथ और पहले पैर पर काले निशान निकल आते हैं। सिफलिस की बीमारी में जैसे होता है। तो उस तरह के भी अगर कुछ निशान निकलते हैं तब इलाज कराना होगा। आपने काली निशान की बात कही। बहुत लोग नीले निशान लेकर आते हैं।
आशुतोष: हाथों पर या वैसे ये नीला वाला भी कुछ है क्या?
डॉ. धीर: नीला निशान खून जमने पर भी होता है। कुछ गांठे होती है नीले निशान वाली। तो जरूर एक बार चेक करा लेना चाहिए। अगर समझ नहीं आ रहा है तो विशेषज्ञ को दिखा करके कंफर्म करा लें कि क्या दिक्कत है।
आशुतोष: हम लोगों ने बाल झड़ने से चर्चा शुरू की थी। डैंड्रफ से लोग बहुत परेशान हैं। इसमें आप क्या सजेस्ट करेंगे कि डैंड्रफ कैसे ना हो अगर हो तो फिर क्या करें?
डॉ. धीर: डैंड्रफ के लिए कुछ सीमित और आसान तरीके होते हैं। एक तो गर्म पानी का इस्तेमाल ना करें सिर पर। गर्म पानी इस्तेमाल करने से डैंड्रफ और बढ़ता है। उसके अलावा सिर पर तेल नहीं लगाना है। अक्सर लोगों का यह मानना है कि तेल लगाने से डैंड्रफ हट जाता है जबकि ये विपरीत होता है। डैंड्रफ फंगल इंफेक्शन होता है। तेल लगाकर उस फंगस को हम फीड कर रहे हैं। उसको खाना और ज्यादा दे रहे हैं तो उसी के ऊपर दोबारा फंगस ग्रो कर जाता है। शैंपू करना है अच्छे से रेगुलर। अगर आपको बहुत ज्यादा डैंड्रफ है तो रोज शैंपू भी कर सकते हैं। अगर हल्का डैंड्रफ है तो हफ्ते में तीन बार कम से कम शैंपू करना है।
आशुतोष: आप कह रहे हैं कि गर्म पानी नहीं डाला जाए। लेकिन ठंडी के मौसम में सामने वाला डैंड्रफ देखेगा कि अपना सिर?
डॉ. धीर: गर्म पानी से मतलब है कि तेज खौलता गर्म पानी ना इस्तेमाल करें। हल्का गरम जो बर्दाश्त लायक हो क्योंकि ज्यादा तेज गर्म पानी बालों को डैमेज करता है।
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आशुतोष: ये जो मुहांसे निकलते हैं, इसके क्या कारण हैं?
डॉ. धीर: कील मुहांसे होने का सबसे बड़ा कारण लाइफस्टाइल और डाइट है। आपको अपने खान-पान का खास ध्यान रखना चाहिए। कील—मुहांसो का मूल कारण है वेस्टर्न फूड, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट, तली हुई चीजें, मैदा, फास्ट फूड, पिज़्ज़ा, बर्गर ये सब डाइट में बढ़ता जा रहा है। उस वजह से हार्मोनल बैलेंस बिगड़ जाता है और ज्यादा तेल बनाने लग जाता है शरीर। वो तेल निकल नहीं पाता, अंदर जम जाता है। एक तरह से मुहांसों का मूल रूप से वही कारण है। अगर आपको कील मुहांसे हो रहे हैं तो उसके लिए इलाज भी काफी प्रभावी आ गए हैं। एक बार जब वो निशान छोड़ने लग जाते हैं तो उनका इलाज बहुत मुश्किल होता है। शुरुआत में मुहांसों को आप दवाइयों से कंट्रोल कर लें तो फिर निशान नहीं छूटेंगे।
आशुतोष: लोग तो कहते हैं कि ये बच्चे जवान हो रहे हैं इसलिए आ रहे हैं।
डॉ. धीर: जब हार्मोन की मैच्योरिटी आती है, प्यूबर्टी हिट करती है, हार्मोन बढ़ते हैं तब ज्यादा तेल बनना शुरू होता है। उस वजह से कील मुहांसे कम उम्र में शुरू होता है। हल्के-फुल्के एक या दो मुहांसे आ रहे हैं तो आप देसी नुस्खों से खुद से कोशिश कर सकते हैं ताकि कंट्रोल हो जाए। पर अगर बार-बार हो रहे हैं, ज्यादा निकल रहे हैं, निशान छोड़ रहे हैं तो इलाज कराना बेहतर रहेगा ताकि वो नुकसान ना करें। बच्चे के चेहरे को खराब ना करें।
आशुतोष: अंत में अपने दर्शकों को स्वस्थ रहने और चर्म रोग से बचने के बारे में क्या सलाह देंगे?
डॉ. धीर: सामान्य रूप से अपनी चमड़ी पर थोड़ा खास ध्यान दें। वो हमारे शरीर का सबसे बड़ा अंग है और अंदरूनी बीमारियां भी चमड़ी के ऊपर आती हैं और बाहर की बीमारियां भी चमड़ी पचाता है। उनको लड़ने में मदद करता है। इसीलिए चमड़ी को हमेशा ध्यान से सॉफ्टली हैंडल करें। जो जनरल प्रिकॉशंस होती हैं, वह फॉलो करनी है। हाइजीन मेंटेन करना है। साफ सफाई अच्छी रखनी है। रोज नहाना है। ज्यादा तेज या ज्यादा साबुन नहीं रगड़ना। नहाने का मतलब यह नहीं कि आप रगड़—रगड़ कर चमड़ी की लेयर ही खराब कर दें। हल्का साबुन इस्तेमाल करें। ज्यादा तेज गर्म पानी इस्तेमाल ना करें। जो मॉइस्चराइजर होता है, इमोलिएट होते हैं, वह लगाएं। नहाने के बाद पूरे शरीर पर नारियल का तेल लगा सकते हैं। इससे चमड़ी की सामान्य स्थिति बनी रहती है और इनफेक्शन होने का चांस कम हो जाता है। यदि कुछ होता है चमड़ी पर तो अपने आप या YouTube से देख कर इलाज ना करें। अगर नहीं समझ आ रहा और तकलीफ लग रही है तो स्पेशलिस्ट को दिखाना बेहतर होता है।
प्रस्तुति—अजय वर्मा
