नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। चावल दुनिया में सबसे ज़्यादा खाए जाने वाले मुख्य खाने में से एक है और भारत में लाखों लोगों के रोज़ के खाने का आधार है। फिर भी, पोषण के मामले में पॉलिश किए हुए सफेद चावल की एक बड़ी कमी है कि यह ज़्यादातर स्टार्च से बना होता है और इसमें प्रोटीन या डाइटरी फाइबर काफ़ी कम होता है। इससे चावल को अक्सर ब्लड शुगर में तेज़ी से बढ़ोतरी से जोड़ा जाता है, जिससे यह भारत जैसे देशों में चिंता का विषय बन जाता है जो डायबिटीज़ की बढ़ती दरों से जूझ रहे हैं। साथ ही चावल से बनी डाइट से काफ़ी कैलोरी लेने वाले कई लोग अभी भी प्रोटीन और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी से जूझ रहे हैं जिसे “हिडन हंगर” कहा जाता है।
डिजायनर चावल: ज्यादा प्रोटीन से लैस
तिरुवनंतपुरम में काउंसिल ऑफ़ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च के CSIR नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर इंटरडिसिप्लिनरी साइंस एंड टेक्नोलॉजी (CSIR-NIIST) के साइंटिस्ट्स ने एक नया समाधान निकाला है जो एक ही बार में दोनों समस्या को दूर कर सकता है। टीम ने चावल की एक नई वैरायटी बनाई है जिसे “डिज़ाइनर राइस” कहा जाता है, जिसमें आम चावल के मुकाबले काफ़ी ज़्यादा प्रोटीन लेवल होता है और इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है। भारत लंबे समय से कैलोरी की काफ़ी मात्रा लेकिन प्रोटीन की कमी की उलझन से जूझ रहा है। अगर हाई-प्रोटीन चावल आसानी से मिलने लगे, तो यह एक मेन फूड की न्यूट्रिशनल वैल्यू को बदल सकता है जिसे लोग पहले से ही हर दिन खाते हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह भारत के सबसे ज़्यादा खाए जाने वाले फूड्स में से एक की न्यूट्रिशनल वैल्यू को बदल सकता है। इस प्रोजेक्ट को CSIR-NIIST के डायरेक्टर सी आनंदरामकृष्णन लीड कर रहे हैं, जो इस इनोवेशन को “फूड आर्किटेक्चर” का एक रूप बताते हैं। नया चावल बनाने के लिए रिसर्चर्स पहले पारंपरिक चावल के दानों को उनके मुख्य हिस्सों—स्टार्च, प्रोटीन और फाइबर में तोड़ते हैं। फिर वे इन चीज़ों को इस तरह से फिर से जोड़ते हैं जिससे अनाज का न्यूट्रिशनल प्रोफ़ाइल बेहतर हो जाता है। आसान शब्दों में कहें तो साइंटिस्ट चावल में स्टार्च का एक हिस्सा कम कर देते हैं और उसकी जगह एक्स्ट्रा प्रोटीन और ज़रूरी माइक्रोन्यूट्रिएंट्स डाल देते हैं। उन्होंने समझाया कि यह एक घर को फिर से बनाने जैसा है। अगर रेगुलर चावल ज़्यादातर स्टार्च से बना होता है, तो हम उसमें से कुछ हटा देते हैं और प्रोटीन से उसे मज़बूत करते हैं। खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में जेनेटिक सुधार शामिल नहीं है। इसके बजाय यह अनाज की न्यूट्रिशनल बनावट को बदलने के लिए फ़ूड-प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करता है।
डिजायनर चावल: ऐसी है निर्माण प्रक्रिया
इस नवाचार की सबसे दिलचस्प बातों में से एक है टूटे हुए चावल का इस्तेमाल, जो मिलिंग प्रोसेस के दौरान बनने वाले छोटे टुकड़े हैं। टूटे हुए चावल को आमतौर पर कम कीमत पर बेचा जाता है। इस नए तरीके में वैज्ञानिक इन टुकड़ों को पीसकर आटा बनाते हैं और उन्हें प्रोटीन और आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन B12 जैसे माइक्रोन्यूट्रिएंट्स के साथ मिलाते हैं। फिर इस मिक्सचर को प्रोसेस करके ऐसे दानों का आकार दिया जाता है जो नॉर्मल चावल की तरह दिखते और पकते हैं। बनावट में बदलाव के बावजूद फ़ाइनल प्रोडक्ट में अभी भी वही जाना-पहचाना स्वाद, टेक्सचर और पकाने के गुण हैं जिनकी लोग चावल से उम्मीद करते हैं।
डिजायनर चावल: भारत की चुनौती का समाधान
भारत इस समय एक अनोखी हेल्थ चुनौती का सामना कर रहा है। एक तरफ देश में दुनिया में डायबिटीज़ से पीड़ित लोगों की सबसे ज़्यादा संख्या है। दूसरी तरफ लाखों लोग न्यूट्रिएंट्स की कमी से परेशान हैं, भले ही वे काफी कैलोरी लेते हों। नए डिज़ाइनर चावल का मकसद दोनों समस्याओं को एक साथ ठीक करना है। इसके खास फायदों में शामिल है—
कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स: चावल की GI वैल्यू 55 से कम है, जिसका मतलब है कि यह धीरे-धीरे एनर्जी रिलीज़ करता है और ब्लड शुगर लेवल में अचानक बढ़ोतरी को रोकने में मदद करता है।
ज़्यादा प्रोटीन कंटेंट: रेगुलर चावल में आमतौर पर लगभग 6–8 परसेंट प्रोटीन होता है, नए वर्शन में 20 परसेंट से ज़्यादा प्रोटीन है।
माइक्रोन्यूट्रिएंट फोर्टिफिकेशन:अनाज आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन B12 जैसे न्यूट्रिएंट्स से भरपूर होते हैं, जो एनीमिया जैसी कमियों को कम करने में मदद कर सकते हैं।
रिसर्चर्स का मानना है कि यह कॉम्बिनेशन उन लोगों के लिए चावल को एक हेल्दी ऑप्शन बना सकता है जो एनीमिया मैनेज कर रहे हैं। डायबिटीज़ के साथ-साथ कुपोषण के खतरे वाली आबादी में न्यूट्रिशन में भी सुधार होगा। इसे उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिए CSIR-NIIST ने उद्योंगों के साथ पार्टनरशिप की है। टेक्नोलॉजी को आगे के डेवलपमेंट और कमर्शियल प्रोडक्शन के लिए टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स को पहले ही ट्रांसफर कर दिया गया है। यह पार्टनरशिप मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाने और भविष्य में चावल को पूरे भारत के मार्केट में लाने में मदद कर सकती है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके लिए लोगों को अपनी डाइट में बहुत ज़्यादा बदलाव करने की ज़रूरत नहीं है। डॉ. आनंदधर्मकृष्णन ने कहा कि आपको क्विनोआ जैसे एग्जॉटिक अनाज पर स्विच करने की ज़रूरत नहीं है। लोग बस चावल खाना जारी रख सकते हैं – लेकिन अब यह बहुत ज़्यादा न्यूट्रिशियस होगा।
डिज़ाइनर चावल: जानिए इसे
हाई-प्रोटीन डिज़ाइनर चावल वह चावल है जिसे वैज्ञानिक तकनीकों (जैसे जैव-संवर्धन, जेनेटिक मॉडिफिकेशन या विशेष प्रजनन तकनीक) से इस तरह विकसित किया जाता है कि उसमें सामान्य चावल की तुलना में प्रोटीन की मात्रा अधिक हो। सामान्य चावल में लगभग 6–8 फीसद प्रोटीन होता है, जबकि डिज़ाइनर या हाई-प्रोटीन चावल में इसे 10–12 फीसद या उससे अधिक तक बढ़ाने की कोशिश की जाती है। इसे डिज़ाइनर इसलिए कहा जाता है कि चावल की पोषण गुणवत्ता को वैज्ञानिक तरीके से ‘डिज़ाइन’ या सुधारकर बनाया जाता है। इसमें मुख्यतः तीन तरीके उपयोग होते हैं—जैव-संवर्धन (Biofortification) जिससे पौधों की नई किस्में विकसित करके पोषक तत्व बढ़ाए जाते हैं। जेनेटिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) से दूसरे पौधों के उपयोगी जीन जोड़कर प्रोटीन या विटामिन बढ़ाए जाते हैं। इसकी जरूरत इसलिए पड़ी कि भारत और एशिया के कई देशों में लोग मुख्य रूप से चावल पर निर्भर हैं। समस्या यह है कि चावल में प्रोटीन और कुछ जरूरी अमीनो एसिड कम होते हैं। इससे कुपोषण और प्रोटीन की कमी हो सकती है इसलिए वैज्ञानिक ऐसे चावल विकसित कर रहे हैं जो ज्यादा प्रोटीन दे, बच्चों में कुपोषण कम करे और गरीब आबादी को सस्ता पोषण मिले। इससे कुपोषण से लड़ने में मदद मिलेगी, बच्चों और महिलाओं में बेहतर पोषण होगा और बिना खान-पान बदले प्रोटीन की मात्रा बढ़ेगी।
