बिहार राजनीतिः त्वरित टिप्पणी
आशुतोष कुमार सिंह

भाजपा का मुख्यमंत्री। यह पहला मौका है जब भाजपा की सरकार बिहार (Bihar) में बन रही है। हालांकि बिहार की राजनीति को भाजपा पिछले 30 सालों से मजबूती से प्रभावित करती रही है। लेकिन अब जब भाजपा का अपना मुख्यमंत्री है, भाजपा के कार्यकर्ताओं में उत्साह का बढ़ना स्वभाविक है।
मुझे याद है, जब सुशील कुमार मोदी, नीतीश सरकार में उपमुख्यमंत्री हुआ करते थे तब भाजपा के कार्यकर्ताओं में उत्साहहीनता का भाव प्रबल रहता था। कई बार तो दिल्ली में सुशील कुमार मोदी के खिलाफ लामबंदी होती हुई दिख जाती थी। इतना ही नहीं, भाजपा के कार्यकर्ताओं का मानना था कि भाजपा को पिछलग्गू पार्टी के रूप में नहीं रहना चाहिए। लेकिन सच आलाकमान को पता था। विगत 20 वर्षों में बिहार की राजनीति में जितना पानी बहा है, उसमें नीतीश बाबू को हटाकर या दबाकर राजानीति संभव नहीं दिख रही थी। और यह बात भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अच्छी तरह से जानता था।
लालू-राबड़ी के शासनकाल के बाद, बदहाल हो चुके बिहार को विकास की पटरी पर लाने में नीतीश कुमार का अहम योगदान है। नारी सशक्तिकरण की बात हो या शिक्षा एवं रोजगार की, सभी मोर्चों पर नीतीश ने काम किया है। नीतीश जेपी-लोहिया और कर्पूरी ठाकुर के पद-चिन्हों को जीने वाले इस दौर के सबसे सशक्त नेताओं में से एक रहे हैं। उनको दरकिनार करना आसान नहीं था।
इसलिए भाजपा ने अपने सॉफ्ट पावर का उपयोग करते हुए नीतीश को तब तक शासन करने का मौका दिया, जबतक वे कर सकते थे। जब उनका मन भरा या करने की स्थिति नहीं रही तब नीतीश से सत्ता का हस्तांतरण भाजपा के पक्ष में सहजतापूर्वक कराया गया। नीतीश कुमार भी यह अच्छी तरह जानते थे कि भाजपा के साथ विगत 20 सालों से शह-मात का खेल खेलते हुए उनकी पार्टी के ज्यादातर कार्यकर्ता भी भाजपाई मानसिकता के हो चुके हैं। भाजपा-जदयू अब भाजपा ज्यादा, जदयू कम है। ऐसे में भाजपा का यह उभार बिहार की राजनीति को किस दिशा में ले जाता है, यह देखने वाली बात है।
जिस तरह से यूपी की तस्वीर योगी राज में बदली है, उसी तरह की तस्वीर बिहार की भी हो, ऐसा वहां के आम लोगों की चाहत है। तमाम सुधारों के बाद भी, आज स्वास्थ्य-शिक्षा और रोजगार ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर सम्राट को चौधरी की तरह फैसले लेने पड़ेंगे। खासतौर से बिहार जैसे ज्ञान उत्पादक राज्य को समृद्ध बनाना है तो वहां के ज्ञान उत्पादन को बढ़ावा देना होगा। शोध एवं तकनीक के क्षेत्र में तेजी से कार्य करने होंगे। काम न करने वाली बिहार में रह रहे बिहारियों की प्रवृति में सुधार लाना होगा। बिहार में जुगाड़तंत्र को ध्वस्त करना होगा। अफसरशाही को न्यून कर लोकशाही को समष्टिगत बनाना पड़ेगा। जनता की हर शिकायत के लिए लोक-निवारण हेल्पलाइन जारी करने पड़ेंगे। शिक्षा मित्रों के भरोसे चल रही बिहार की ज्ञान यात्रा को सुदृढ़ करना होगा।
सम्राट के लिए सम्राट बने रहना इतना आसान नहीं है। बिहार, बिहार है। बिहार का डीएनए के हिसाब से काम करना आसान काम न तो रहा है और न है। आन-बान-शान के लिए सबकुछ मिटा देने वाले बिहारियों के आन-बान-शान को बनाएं रखना, चौधरी साबह के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकती है।
इन तमाम बातों के बीच यह बदलाव समय की मांग थी। इस बदलाव से यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि बिहार में बहार बनी रहेगी और हिन्दुस्तान में पूर्वी बयार बहाने में बिहार सफल होगा।
(लेखक स्वस्थ भारत के चेयरमैन व स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
