स्वस्थ भारत मीडिया
फ्रंट लाइन लेख / Front Line Article

ICMR: टीबी कार्यक्रम में शामिल हो NTM की जांच और इलाज

ICMR: टीबी कार्यक्रम में शामिल हो NTM की जांच और इलाज

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। ICMR ने सिफारिश की है कि नॉनट्यूबरकुलस माइकोबैक्टीरियल (NTM) बीमारी की जांच और इलाज को भी नेशनल ट्यूबरकुलोसिस एलिमिनेशन प्रोग्राम (NTEP) में शामिल किया जाए। NTM फेफड़ों का एक इन्फेक्शन है, जिसे अक्सर टीबी समझ लिया जाता है। अभी भारत के टीबी जांच नेटवर्क में इस बीमारी की पहचान नहीं हो पाती। यह सिफारिश ICMR की फंडिंग से हुई एक नई मल्टी-सेंटर स्टडी के आधार पर की गई है। स्टडी द लैंसेट रीजनल हेल्थ–साउथईस्ट एशिया में प्रकाशित हुई है। इसमें कहा गया है कि NTM बीमारी अब एक उभरती हुई सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, क्योंकि इसके लक्षण टीबी जैसे ही होते हैं।

4 साल तक हुई स्टडी

टीबी माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नाम के बैक्टीरिया से होती है। यह ज्यादातर फेफड़ों को प्रभावित करती है हालांकि शरीर के दूसरे अंग भी प्रभावित हो सकते हैं। यह तब फैलती है, जब टीबी का मरीज खांसता, छींकता या बात करता है। वहीं NTM बीमारी नॉनट्यूबरकुलस माइकोबैक्टीरिया से होती है। ये बैक्टीरिया मिट्टी, पानी और धूल में पाए जाते हैं और टीबी जैसी फेफड़ों की बीमारी पैदा कर सकते हैं। अगर इसका इलाज न हो या इसे गलती से टीबी मान लिया जाए, तो यह धीरे-धीरे फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकती है। इससे सांस लेने में दिक्कत हो सकती है और मरीज की मौत भी हो सकती है। यह स्टडी 2021 से 2025 के बीच दिल्ली, चंडीगढ़, अहमदाबाद, वर्धा, तिरुपति और नोएडा के सात केंद्रों पर की गई। इसका समन्वय दिल्ली के जामिया हमदर्द ने किया तो नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ट्यूबरकुलोसिस एंड रेस्पिरेटरी डिजीज़ और शारदा यूनिवर्सिटी में मॉलिक्यूलर टेस्ट किए गए। शोधकर्ताओं ने 71,143 ऐसे लोगों की जांच की जिनमें टीबी होने का शक था यानी ऐसे लोग, जिन्हें लंबे समय से खांसी, बुखार या वजन कम होने जैसे लक्षण थे और जिनकी टीबी की जांच की जा रही थी। इनमें से 230 लोगों (0.32 प्रतिशत) में वास्तव में NTM बीमारी पाई गई। इनमें 191 मरीजों के फेफड़े प्रभावित थे, जबकि 39 मरीजों में यह बीमारी फेफड़ों के बाहर थी। स्टडी के प्रमुख लेखकों में शामिल एम्स, दिल्ली के मेडिसिन विभाग के पूर्व प्रमुख डॉ. एस.के. शर्मा बताते हैं कि NTM बीमारी की जल्दी पहचान और इलाज बहुत जरूरी है क्योंकि अगर इसका इलाज न हो, तो यह धीरे-धीरे फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकती है, सांस लेने में दिक्कत पैदा कर सकती है और मौत का कारण भी बन सकती है। उन्होंने कहा कि इसका इलाज टीबी से पूरी तरह अलग होता है, इसलिए सही बीमारी की पहचान करना बहुत जरूरी है।

NTM को टीबी TB समझना भूल

रिपोर्ट के अनुसार NTM 200 से ज़्यादा बैक्टीरिया का एक ग्रुप है जो मिट्टी, पानी और धूल में नैचुरली पाए जाते हैं। ये टीबी पैदा करने वाले बैक्टीरिया माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस के दूर के रिश्तेदार हैं लेकिन बहुत अलग तरह से काम करते हैं। टीबी से अलग, जो एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलती है, NTM बीमारी आम तौर पर एनवायरनमेंट से फैलती है और आमतौर पर उन लोगों को होती है जिनकी इम्यूनिटी कमज़ोर होती है, फेफड़े खराब होते हैं या कोई और हेल्थ प्रॉब्लम होती है। स्टडी के को-ऑथर विश्वनाथ उपाध्याय ने कहा कि लगभग 75-80 फीसद NTM इन्फेक्शन फेफड़ों पर असर डालते हैं और टीबी जैसे ही होते हैं, जिसमें लगातार खांसी, बुखार, वज़न कम होना और छाती के एक्स-रे में भी ऐसे ही लक्षण दिखते हैं। उन्होंने बताया कि भारत में, NTM मामलों को टीबी समझकर गलत डायग्नोस किया जाता है और मरीज़ों का गलत इलाज किया जाता है।

रोग की पहचान में देरी की वजह

स्टडी का सबसे अहम आंकड़ा यह है कि NTM की पहचान होने में काफी देर लगती है। मरीजों में लक्षण शुरू होने से लेकर बीमारी की पुष्टि होने तक औसतन 7 महीने से ज्यादा लग गए। इसकी वजह यह है कि डॉक्टरों को पहले टीबी का ज्यादा शक होता है। इसके अलावा भारत में आमतौर पर होने वाले टेस्ट सिर्फ यह बताते हैं कि माइकोबैक्टीरिया मौजूद हैं, लेकिन यह नहीं बता पाते कि संक्रमण टीबी का है या NTM का। NTM की पुष्टि के लिए सिर्फ सामान्य टीबी टेस्ट काफी नहीं होते। इसके लिए डॉक्टरों को बार-बार माइकोबैक्टीरिया कल्चर, लाइन प्रोब असे या जेनेटिक सीक्वेंसिंग जैसे मॉलिक्यूलर टेस्ट से बैक्टीरिया की पहचान करनी पड़ती है। कुछ मामलों में ड्रग ससेप्टिबिलिटी टेस्ट भी करना पड़ता है। फिलहाल ये सुविधाएं ज्यादातर विशेष लैब और बड़े अस्पतालों में ही उपलब्ध हैं। इसी वजह से देश के कई हिस्सों में बीमारी की जल्दी पहचान नहीं हो पाती।

इलाज लंबा और महंगा

टीबी का इलाज आमतौर पर 6 महीने का होता है, लेकिन NTM का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि संक्रमण किस बैक्टीरिया से हुआ है। मरीजों को आमतौर पर एज़िथ्रोमाइसिन, एथाम्बुटोल और रिफैम्पिसिन जैसी एंटीबायोटिक दवाएं एक साथ दी जाती हैं। कुछ मरीजों को अमिकासिन जैसी इंजेक्शन वाली दवाएं भी देनी पड़ सकती हैं। इलाज अक्सर 12 से 18 महीने तक चलता है और कुछ मामलों में इससे भी ज्यादा समय लग सकता है। डॉ. शर्मा ने कहा कि NTM की सभी बीमारियों के लिए एक ही इलाज नहीं होता। कुछ तरह के बैक्टीरिया कई एंटीबायोटिक दवाओं पर असर नहीं दिखाते, जिससे इलाज और मुश्किल हो जाता है। उन्होंने कहा कि इलाज शुरू करने से पहले यह पता लगाना जरूरी है कि संक्रमण किस तरह के बैक्टीरिया से हुआ है, क्योंकि उसी के हिसाब से इलाज तय होता है। स्टडी में 155 मरीजों ने इलाज शुरू किया। इनमें से 88.4 प्रतिशत मरीजों का इलाज सफल रहा, लेकिन 18 मरीजों का नतीजा अच्छा नहीं रहा। इनमें 9 मरीजों की मौत हो गई, जबकि 9 मरीज इलाज के दौरान संपर्क से बाहर हो गए।

Related posts

2027 तक भारत में कुष्ठ रोग उन्मूलन का लक्ष्य

admin

जी 20 स्वास्थ्य कार्य समूह की बैठक में गहन विचार विमर्श 

admin

सूरज की आग एवं व्यवस्था की मार से झुलसते मासूम

Leave a Comment