स्वस्थ भारत मीडिया
नीचे की कहानी / BOTTOM STORY

शिक्षा-तंत्र : ज्ञानशालाओं की जरूरत

शिक्षा-तंत्र : ज्ञानशालाओं की जरूरत

आशुतोष कुमार सिंह

भारत की शिक्षा (Education) व्यवस्था आज कटघरे में है। युवा परीक्षा प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर आक्रोशित हैं। उन्हें इतना आक्रोशित होना चाहिए या नहीं, कितना होना चाहिए, कब होना चाहिए, उनकी मांग सही है, गलत है, इन तमाम बातों पर चर्चा हो रही है, होनी भी चाहिए।
पर सच यह है कि आजादी के बाद से हमने जिस शिक्षा व्यवस्था को अंगीकार किया है, वह व्यवस्था कितनी भारतीय है, सर्वप्रथम इसपर विचार करना जरूरी है। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के तहत शिक्षा प्राप्त करने का असल ध्येय क्या है? शायद नौकरी पाना। चाकरी करना। अपना समय व श्रम बेचकर दूसरे की संकल्पनाओं को क्रियान्वित करने के लिए काम करना ही दरअसल नौकरी है। नौकरी सरकार की हो या किसी निजी साहूकार की। नौकरी की तासीर में ही गुलामी की जंजीर होती हैं।
ऐसे में पुनः प्रश्न उठता है कि गर गुलामी ही करनी है तो आज ये युवा इतने उतावले क्यों हो रहे हैं? इतने परेशान क्यों हैं? इतना भटकाव क्यों है? कहीं इसका सीधा संबंध हमारी शिक्षा व्यवस्था से तो नहीं है। दरअसल, यह शिक्षा युवाओं को पूंजी की गुलामी की ओर धकेल रही है। पूंजी की जरूरत को ध्यान में रखते हुए नए-नए पाठ्यक्रम बनाए जा रहे हैं, उन पाठ्यक्रमों का बाजार बनाया जा रहा है। उस बाजार में इन पाठ्यक्रमों में दाखिले की होड़ लगी है। और इस होड़ को नए जमाने में प्रतियोगिता का नाम दिया जाता है। इन्हीं अंध प्रतियोगिताओं में आज का युवा अंधी दौड़ लगाता है और खुद से बहुत दूर निकल जाता है।
इसी अंध दौर का नतीजा है कि आज नीट और तमाम इस तरह की परीक्षाओं को पास करने की ऐसी होड़ मची है कि नैतिकता का कोई मतलब ही नहीं रह गया है। मेहनत का हक़ मारकर लक्ष्मी के बल पर अगर कोई परीक्षा उतीर्ण कर भी जाता है, तो क्या वह जो बनना चाहता था? वह बन पाएगा! शायद नहीं। और यह अन्याय है। खुद उस व्यक्ति के साथ भी जिसने गलत तरीके से वैसा काम चुना, जिसे करना उसे आता ही नहीं। उस व्यक्ति के साथ अन्याय तो है ही जिसका हक़ छीन लिया गया। इससे न सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर दो लोगों को हानि हुई बल्कि समष्टिगत रूप से पूरे राष्ट्र को नुकसान पहुंचा क्योंकि एक योग्य व्यक्ति जिसको जहां पर होना चाहिए, वह, वहां नहीं पहुंच पाया। इसका मतलब है कि वह राष्ट्र के लिए जो बेहतर कार्य कर सकता था, वह नहीं कर सकेगा। जो पहुंचा वह तो करने योग्य था भी नहीं और है भी नहीं।
हमारी शिक्षा व्यवस्था नौकर उत्पादन के अपने ध्येय को छोड़कर एक आत्म-निर्भर, हुनर-मंद राष्ट्र-समर्पित व्यक्तित्व का निर्माण करें, तब जाकर कहीं समाधान की दिशा में कुछ हो सकेगा। इस दिशा में नई शिक्षा नीति कुछ हद तक आगे बढ़ती हुई दिख तो रही है, लेकिन अभी भी मंजिल बहुत दूर है।
भारत ज्ञान की भूमि है। ज्ञान इंसान को आंतरिक रूप से मजबूत एवं बाह्य स्थितियों से सुलझाने का सबसे मजबूत माध्यम है। लेकिन शिक्षा इंसान को इंसान बनाए रखने में सबसे बड़ी बाधक है। शिक्षा बिना आत्मा के शरीर की तरह है। जिसमें जानकारी है, सूचना है, गुलामी है, लेकिन आत्मचिंतन नहीं है, संस्कार नहीं है, नैतिकता नहीं है। वर्तमान शिक्षा लाभ के इर्द-गिर्द घूमती है। हालांकि लाभ के भाव को अन्यायी नहीं माना जा सकता। लेकिन जब यह भाव लाभा-लाभ में परिवर्तित हो जाता है, तब वह लाभ अन्यायी हो जाता है। वह श्रम के बदले मिलने वाली पारिश्रमिक न रह कर, दूसरों की कमाई को लूटने का माध्यम बन जाता है। वर्तमान शिक्षा इसी लाभा-लाभ को प्रोत्साहित कर रही है और इसे ही परम-सत्य को रूप में निरूपित भी कर रही है।
यहीं कारण है कि शिक्षार्थी के जीवन से नैतिकता नामक आंतरिक अनुशासन लुप्तप्राय हो चुका है। नैतिकता से च्यूत कोई शिक्षार्थी जब नौकरी करता है या नौकरी के लिए कुछ करता है, वह भ्रष्ट आचरण से अछूता नहीं रह पाता और भ्रष्टाचार का दीमक उसे तो कमजोर करता ही है, उसके साथ-साथ पूरी व्यवस्था को भ्रष्ट राह दिखा देता है। असल में आज हमे इसी भ्रष्टाचार के दीमक से लड़ने की जरूरत है। इसी दीमक ने पूरी व्यवस्था को अंदर से खोखला कर दिया है।
और इस दीमक का उपचार ज्ञान है। ज्ञान परम सत्य है। ज्ञान से युक्त व्यक्ति नीर-क्षीर का विवेक रखता है। वह भ्रमित नहीं हो पाता। सत्य-राह पर चलता है। वह न्याय को जानता है। वह लाभ को जानता है। वह अन्यायी नहीं हो सकता। वह दूसरों के श्रम का सम्मान करना जानता है। वर्तमान में ज्ञान से युक्त ज्ञानशालओं और ज्ञानदाताओं का निर्माण कर के ही हम भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए मानव संसाधनों का सार्थक व दिशा-युक्त निर्माण कर सकते हैं।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व स्वस्थ भारत ट्रस्ट के चेयरमैन हैं)

Related posts

जनऔषधि के निर्माण में क्वालिटी से समझौता नहीं : कुंदन सिंह

admin

The government would soon set up a separate Central Drug Controller for traditional medicines!

Ashutosh Kumar Singh

‘सामाजिक आपातकाल’ के दौर में देश: प्रधानमंत्री

Ashutosh Kumar Singh

Leave a Comment