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बिलासपुर नसबंदी मामलाःएक दर्द … कुछ सवाल

Amit Tyagi For SBA


इस दर्द का क्या नाम दूं...
इस दर्द का क्या नाम दूं…

बिलासपुर का मामला घोर लापरवाही का आपराधिक मामला है। ये ऐसा मामला है जहां एक बात साफ है कि कैसे सिर्फ दिये गए लक्ष्य-सीमा को पाने के लिए मूलभूत बातों को भी तांक पर रख दिया जाता है ? जिन क्षेत्रों मे संवेदनशीलता प्रमुख पक्ष होना चाहिए वहाँ भी कॉर्पोरेट की तर्ज़ पर टार्गेट पूरा करने पर ज़ोर दिया गया। मानवाधिकार और संवैधानिक अधिकारों पर अब हम लिख- लिख कर थक गए हैं। ऐसे मामले तो रोज़ एक ऐसी चुनौती पेश करते हैं कि ये सब अधिकार तो ढोंग बन कर रह गए हैं।
चिकित्सा का क्षेत्र सेवा भाव का क्षेत्र माना जाता है किन्तु कलयुग के भगवानों से इतनी बड़ी अपेकषा भी हम नहीं रख रहे हैं। इस बारें मे गांधी जी के विचारों को रखकर आज हम गांधी जी का अपमान भी नहीं करेंगे। आज ना तो चिकित्सा मंत्री को कोसने का मन कर रहा है ना ही चिकित्सा के नाम पर बड़े बड़े अस्पताल खोले बैठे रियल स्टेट व्यापारियों को । महंगी दवाओं का तो आज मुद्दा ही नहीं है।
आज तो बस एक दर्द है और कुछ सवाल हैं ? कि क्या उस पद पर बैठे व्यक्तियों को अपना काम भी नहीं आता है? अगर आता है तो क्या लापरवाही मेें ये सब हो गया ? क्या उन पर उच्च अधिकारियों का इतना ज़्यादा दवाब था कि इतनी तेजी मे सब काम करना पड़ा ?
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न सवालों के जवाब बेहद आवश्यक हैं तभी तो तय हो पायेगा कि इस आपराधिक सदोष मानववध मे किन किन लोगों को सम्मिलित माना जाये? ये एक बेहद गंभीर मामला है। ऐसे हादसों के बाद भी अगर हम जाग जाएँ तो भी कुछ गनीमत है। आपराधिक मामला तो बन ही गया है। अब अदालत त्वरित निर्णय दे और अपने फैसले से एतेहासिक नज़ीर प्रस्तुत करे, तभी संवैधानिक अधिकार और मानवाधिकार का सम्मान बचेगा।
नोटः लेखक स्वस्थ भारत अभियान के विधि सलाहकार हैं

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