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Made in INDIA : दुर्लभ रोगों की महंगी दवा सस्ते में तैयार कर रहा भारत

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। भारत ने दुर्लभ बीमारियों के महंगे इलाज का रास्ता निकालते हुए सस्ती दवाओं का निर्माण करना शुरु कर दिया है। इस मुहिम में सिकल सेल समेत 13 दुर्लभ रोगों की पहचान की गयी जिसमें छह रोगों की आठ दवायें 2024 के मार्च तक बाजार में उतर जायेंगी। चार रोगों की दवायें मंजूरी की प्रक्रिया में है। दवाओं की अत्यधिक लागत को कम करने के मकसद से भारतीय दवा कंपनियों ने इनका उत्पादन शुरू कर दिया है।

महज एक साल के प्रयास से मिली सफलता

स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया और नीति आयोग के सदस्य स्वास्थ्य डॉ. वी. के पाल ने बताया कि एक साल के प्रयास के बाद जिन छह बीमारियों की दवाएँ सस्ती होंगी उनमें गौचर रोग, विल्सन रोग, टायरोसिनेमिया टाइप 1, ड्रेवेट-लेनोक्स गैस्टॉट सिंड्रोम, फेनिलकेटोनुरिया और हाइपरअमोनमिया शामिल हैं, जिनमें दो के लिए मंजूरी लंबित है। इस कदम से इन बीमारियों के इलाज की लागत पर काफी असर पड़ेगा। ऐसी 80 फीसद बीमारियों की वजह जेनेटिक होती है।

भारत मे बनेगा SMA र्का Zolgensma इंजेक्शन

SMA बीमारी की दवा हमेशा चर्चा में रहती है। इसे दूर करने के लिए जेनेटिक थेरेपी का एक इंजेक्शर्न Zolgensma 16 करोड़ में आता है। अब इसे भारत में बनाने पर काम चल रहा है। इससे इसका इलाज अब कुछ लाख में मिल सकेगा। Tyrosinemia जन्म से होने वाली लिवर की गंभीर बीमारी है। इसका इलाज सालाना 6 करोड़ तक का हो सकता है। अब ये दवा भारत में बनने लगी है जिससे इसका खर्च घटकर 2.5 लाख हो गया है यानी सीधे सौ गुना की कमी हो गई है। इसकी दवा Nitisinone पहले स्वीडन से आती थी। इसकी 2 एमजी की दवा 5 लाख की पड़ती है। ये जेनेरिक दवा के तौर पर 6 हजार और ब्रांडेड में 16 हजार तक मिल सकेगी।

3.5 करोड़ की दवा केवल 6 लाख में

Gaucher इस बीमारी के इलाज में सालाना 3.5 करोड़ का खर्च आता है क्योंकि ये दवाएं विदेश से ही आती हैं। इसका खर्च अब 3 से 6 लाख सालाना हो गया है यानी 60 गुना तक की कमी हो गई है।

सिकल सेल का सिरप महज 405 रुपये में

सिकल सेल एनीमिया का इलाज सिरप से होता है। विदेश से Hydroxyurea का 100 एम एल का सिरप 70 हजार का आता है। भारत में अब ये सिरप 405 रुपए में बन सकेगा। 5 साल तक के बच्चों को यही सिरप देना जरूरी है। भारत अब इन दवाओं को जरूरतमंद देशों को किफायती दाम पर भी बेच सकेगा।

ट्राइएंटाइन कैप्सूल 2.2 करोड़ नहीं, 2.2 लाख का होगा

इसी तरह, विल्सन की बीमारी के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ट्राइएंटाइन कैप्सूल की कीमत एक बच्चे के लिए प्रति वर्ष 2.2 करोड़ से घटकर 2.2 लाख हो जाएगी। स्वास्थ्य मंत्रालय न केवल इन दवाओं को निर्माताओं के माध्यम से उपलब्ध करा रहा है, बल्कि अपने जन औषधि स्टोर और आनुवंशिक अनुसंधान में विशेषज्ञता वाले उत्कृष्टता केंद्रों के माध्यम से वितरण पर भी विचार कर रहा है।

100 करोड़ लोग दुर्लभ रोग से पीड़ित

इस पहल का उद्देश्य इन महत्वपूर्ण दवाओं को आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए अधिक सुलभ बनाना है। प्रति एक हजार की आबादी पर एक या उससे कम की व्यापकता वाली दुर्लभ बीमारियाँ विश्व स्तर पर चुनौती हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा लागू अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार, अनुमान है कि भारत में लगभग 6 से 8 फीसद आबादी, लगभग 100 मिलियन लोग, दुर्लभ बीमारियों से प्रभावित हैं।

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