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आयुर्वेदाचार्यों ने कहा कोरोना को आयुर्वेद हरा सकता है

कोरोना विषय पर सभ्यता अध्ययन केन्द्र ने बेबिनार कराया

सभ्यता अध्ययन केन्द्र ने कोरोना के समाधान की दिशा में बहुत ही सार्थक वेबिनार कराया। इस वेबिनार में देश के प्रतिष्ठित आयुर्वेदाचार्यों ने जो कहा वह प्रत्येक भारतीय को जरूर जानना चाहिए।

आशुतोष कुमार सिंह

नई दिल्ली/एसबीएम

सभ्यता अध्ययन केंद्र द्वारा गत 19 और 23 अप्रैल, 2020 को कोरोना महामारी और आयुर्वेद के विषय पर दो वेबिनारों का आयोजन किया गया। इन आयोजनों में देश भर से कुल आठ राज्यों से कुल 32 प्रतिभागियों ने सहभागिता की। इन दोनों वेबिनारों में लखनऊ से विश्व आयुर्वेद कांग्रेस के संयोजक सदस्य और विख्यात आयुर्वेदाचार्य डॉ. राम अचल तथा राँची से विख्यात सर्जन तथा आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. सुरेश अग्रवाल का मार्गदर्शन प्राप्त हुए। दोनों ही वेबिनारों में अनेक आयुर्वेदाचार्यों, एलोपैथिक चिकित्सकों, विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों सहित युवा प्रोफेशनलों ने सहभागिता की।

आयुर्वेद एक पूर्णतया विकसित और सक्षम चिकित्सा विज्ञान है

जाने माने आयुर्वेदाचार्य राम अचल जी
जाने माने आयुर्वेदाचार्य राम अचल जी

डॉ. राम अचल का कहना था कि आयुर्वेद कोरोना महामारी से निपटने में पूरी तरह सक्षम है, आवश्यकता है कि सरकार आयुर्वेद पर भरोसा करे उसे मौका दे। उन्होंने कहा कि आयुष मंत्रालय द्वारा जारी किए गए निर्देश कोरोना के प्रसार को रोकने के लिए ठीक हैं, परंतु उसके इलाज के लिए आगे आने की आवश्यकता है। आयुर्वेद केवल परहेज का विज्ञान मात्र नहीं है और न ही यह केवल रसोई का विज्ञान है। आयुर्वेद एक पूर्णतया विकसित और सक्षम चिकित्सा विज्ञान है और इसलिए कोरोना की चिकित्सा करने के लिए आयुर्वेदाचार्यों को मौका दिया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि कोरोना एक प्रकार का प्रतिश्याय (जुकाम) है और प्रतिश्याय के विभिन्न प्रकारों की चिकित्सा के लिए आयुर्वेद में सौ से अधिक योग मिलते हैं। इनके उपयोग से कोरोना ठीक किया जा सकता है।

आयुर्वेद केवल जड़ी-बूटियों से ही चिकित्सा नहीं करता बल्कि…

आयुर्वेद केवल जड़ी-बूटियों से ही चिकित्सा नहीं करता, बल्कि इसमें रासानिक योग भी पर्याप्त प्रचलित हैं। डॉ. राम अचल ने कहा कि उन्होंने एचआईवी के मामलों में शोध करके साबित किया है आयुर्वेदिक उपचार से वायरल लोड घटता है और इम्यूनिटी यानी रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसलिए कोई कारण नहीं है कि कोरोना के मामले में आयुर्वेदिक योग सफल न हों। उन्होंने कहा कि अब यह सरकार पर ही निर्भर है कि वह आयुर्वेद को मौका दे ताकि कोरोना जैसी महामारी से भारत नुकसान उठाने से बच सके।

कोरोना में लाभप्रद औषधि पर हुई चर्चा

उन्होंने कहा कि कोरोना के गंभीर रोगियों पर कस्तूरी भैरव रस और वृहदश्वासकासचिंतामणि रस जिसमें स्वर्ण भस्म, पारद भस्म आदि होते हैं, आदि औषधियों का प्रयोग काफी लाभकारी हो सकता है। इनकी दो-तीन खुराक से श्वांस में होने वाली तकलीफ दूर हो सकती है। यह मेरा अनुभूत प्रयोग है। इन जैसी आयुर्वेदिक रासायनिक योगों को लेकर पश्चिम के आधुनिक चिकित्साशास्त्री शंका व्यक्त करते हैं कि इनमें धातुओं का प्रयोग है जो कि हानिकर है, परंतु आयुर्वेद के इन योगों का देश में हजारों वर्षों से मनुष्यों पर सफलतापूर्वक प्रयोग किया जाता रहा है। इसलिए इन योगों से पश्चिम यदि घबड़ाता है तो यह उसकी समस्या है, हम भारतीयों को आत्म विश्वास पूर्वक कोरोना की चिकित्सा में इनका उपयोग करना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रवाल मंचामृत, दार्वी क्वाथ का एचआईवी के वायरल लोड को कम करने में लाभ मिला है। इसलिए उपरोक्त औषधियों से कोरोना के वायरल लोड को कम करने में भी अवश्य लाभ मिलेगा।

आयुर्वेद ही है कोविड-19 का समाधान
एलोपैथिक चिकित्सक भी हैं आयुर्वेद के कायल
डॉ.सुरेश अग्रवाल
जाने-माने ऐलोपैथिक चिकित्सक हैं, डॉ.सुरेश अग्रवाल। वर्तमान मेंं आप आयुर्वेद पर काम कर रहे हैंं।

डॉ. सुरेश अग्रवाल ने कहा कि वे स्वयं एलोपैथिक चिकित्सक और सर्जन हैं परंतु उनका आयुर्वेद पर काफी विश्वास है और इसलिए वे पिछले 25 वर्षों से आयुर्वेद पर शोध कर रहे हैं, साथ ही इससे चिकित्सा भी कर रहे हैं। उन्होंने कोरोना के संबंध में कहा कि रोग-प्रतिरोधक क्षमता ही वायरल इन्फेक्शन को ठीक करता है। रोग-प्रतिरोधक क्षमता का वायरल इन्फेशन का बहुत महत्त्व है। या तो बचाव के लिए वैक्सीन बनाई जाए, या इलाज के लिए रोग-प्रतिरोधक क्षमता को सुधारने के उपाय किए जाएं। इसके लिए जीवनशैली में परिवर्तन करना हो या खानपान में परिवर्तन करना हो, वह करना चाहिए। आयुर्वेद में ऐसी जड़ी बूटियाँ हैं, जिनसे रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है और साथ ही वायरस का संक्रमण को कम करने में भी सहायता मिलती है। जैसे कालमेघ में ये दोनों ही गुण मिलते हैं। इसी प्रकार कालमेघ, नीम, अमृता या गिलोय, वासक, तुलसी, पिप्पली, हल्दी और यशद भस्म हैं। ये आठ चीजें हैं जिनमें ये दोनों ही गुण हैं यानी ये रोग-प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाती हैं और वायरस की संख्या को भी कम करती हैं। यह तथ्य शोध पर आधारित है और इन पर काफी शोध-पत्र प्रकाशित हो चुके हैं कि ये रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाते हैं और वायरस को भी नष्ट करते हैं। कोरोना से बचाव और रोग की प्रारंभिक अवस्था में इलाज के लिए भी इनका उपयोग किया जाए तो काफी लाभ होगा। जिन रोगियों की स्थिति गंभीर हो गई हो, उन्हें आयुर्वेदिक के साथ एलोपैथिक दवाएं भी दी जानी चाहिए।

कोरोना से भयभीत न हों भयावहता को समझें
आयुष क्यों नहीं सामने आया घोर आश्चर्य का विषय है

उन्होंने कहा कि जिन लोगों को क्वैरन्टाइन में रखा गया है, उन्हें गिलोय या कालमेघ देने में कोई कठिनाई नहीं थी। कोरोना संक्रमित लोगों में से सौ लोगों को उपरोक्त आठ चीजों के मिश्रण के योग दिया जाए और सौ को नहीं दिया जाए। इस प्रयोग का परिणाम देख लीजिए। इसमें कोई अधिक खर्च नहीं है तथा इसके कोई दुष्परिणाम नहीं है और इसके सुखद परिणाम आने की शत प्रतिशत संभावना है। अन्य वायरल रोगों में मैं स्वयं इन चीजों का प्रयोग पिछले 20 वर्षों से करता आ रहा हूँ। आज की दुरूह स्थिति में जहाँ एलोपैथ में आपके सामने मार्ग एकदम बंद है, वहाँ सरकार ने तुरंत क्यों नहीं निर्णय लिया और आयुष विभाग सामने क्यों नहीं आया, यह बहुत आश्चर्य और निराशा का विषय है। इसमें कोई नुकसान नहीं था ही नहीं।

कोरोना के लिए आयुर्वेद के प्रयोग को चार भागों में बांटा जा सकता है

डॉ. अग्रवाल ने कहा कि कोरोना के मामले में आयुर्वेद के प्रयोग को हम चार स्तरों में बाँट सकते हैं।

  • पहला स्तर सामान्य और असंक्रमित लोगों में कोरोना के रोकथाम का है
  • दूसरा स्तर बिना लक्षण वाले प्रारंभिक कोरोना संक्रमित परंतु अलाक्षणिक रोगियों की चिकित्सा
  • तीसरा, कोरोना संक्रमित और प्रकट लक्षण वाले रोगियों की चिकित्सा
  • और चौथा कोरोना संक्रमित गंभीर रोगियों की चिकित्सा।
उज्ज्वल भविष्य के लिए जरूरी है नई कार्य-संस्कृति अपनाना
प्रारंभ से चिकित्सा हो तो वेंटिलेटर की जरूरत भी नहीं पड़ेगी

आयुर्वेद में तीनों स्तरों के लिए औषधियों का भंडार है। उन्होंने कहा कि केवल अंतिम स्थिति में इंटिग्रेटेड चिकित्सा की जानी चाहिए यानी एलोपैथ और आयुर्वेदिक दोनों ही औषधियां दी जानी चाहिएं। आवश्यकता पड़ने पर उन्हें वेंटिलेटर आदि पर भी रखना चाहिए। हालांकि यदि प्रारंभ से आयुर्वेदिक उपचार किया जाए तो इसकी नौबत नहीं आएगी।

आयुर्वेद को लेकर भारत को खुलकर सामने आना चाहिए था

डॉ. सुरेश ने कहा कि वर्ष 2004 में जब चीन में कोरोना परिवार का ही पहला वायरस सार्स आया तो इस पर डब्ल्यूएचओ की एक 120 पृष्ठों की रिपोर्ट है, जिसमें यह लिखित है कि सार्स के इलाज के लिए पारंपरिक चीनी औषधियों का प्रयोग किया गया। मरीजों पर न्यूनतम 10 क्लीनीकल ट्रायल हुए और इसके काफी अच्छे परिणाम थे। चीन तो एक बंद देश है, वह अपनी कोई भी जानकारी बाहर नहीं जाने देता। अभी कोरोना को रोकने के लिए भी उन्होंने पारंपरिक चीनी औषधियों का प्रयोग किया है, यह बाद में अवश्य सामने आएगा। इसलिए भारत को तो आयुर्वेद को लेकर खुल कर सामने आना चाहिए था। बिना बाजार की परवाह किए हुए सामने आना चाहिए। पूरी दुनिया प्रशंसा करेगी।

कोरोना से भयभीत न हों भयावहता को समझें
मैं चाहता हूं कि सरकार मुझे कोरोना मरीज ईलाज के लिए दें

डॉ. सुरेश ने कहा कि मुझे इस बारे में भरपूर आत्मविश्वास है। यदि सरकार ने कोरोना रोगी मुझे दिया होता तो मुझे इस पर काम करने में प्रसन्नता होती, अभी भी दे तो मैं प्रसन्नतापूर्वक अपना योगदान दूंगा।

यह जानना जरूरी है कि वायरस नष्ट नहीं किए जा सकते हैं

वेबिनार में श्रोताओं ने प्रश्न पूछा कि कोरोना वायरस तो नया वायरस है और मानव निर्मित वायरस है, ऐसे में आयुर्वेद उनका समाधान कैसे कर सकता है? कुछेक श्रोताओं ने आयुर्वेद में शोध की कमी का प्रश्न भी उठाया। इन प्रश्नों पर डॉ. अचल और डॉ. अग्रवाल दोनों ने ही कहा कि भले ही कोरोना वायरस नया हो, परंतु वायरस तो पहले भी रहे हैं और उन पर आयुर्वेद की औषधियां प्रभावी रही हैं। क्यों कोरोना का वायरस नष्ट किया जा सकता है, इस प्रश्न के उत्तर में डॉ. अग्रवाल का कहना था कि वायरस नष्ट नहीं किए जा सकते। ट्यूबरकोलोसिस का वायरस अभी है, परंतु मानव शरीर में उसकी एंटीबॉडी बन जाती है, हमारा प्रतिरक्षा तंत्र उसके निवारण में सक्षम हो जाता है और इस प्रकार उसका मारक क्षमता घट जाती है। ऐसा ही कोरोना के मामले में भी होगा। इसलिए आवश्यकता यह है कि हम मानव शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने पर ध्यान दें और यह आयुर्वेद से ही संभव है।

आयुर्वेद वायरस को मारने की बजाय मानव शरीर को मजबूत करने पर ध्यान देता है

डॉ. अचल का कहना था कि वायरस की बजाय आयुर्वेद मानव शरीर पर ध्यान देता है। शरीर यदि मजबूत रहे और उसकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता ठीक रहे तो रोग स्वयं ठीक हो जाते हैं। उन्होंने उदाहरण दिया कि आस्ट्रेलिया में हाल ही में हुए शोधों से यह स्पष्ट हो रहा है कि बड़ी जनसंख्या ऐसी है जिनमें कोरोना का संक्रमण नहीं मिला परंतु उनमें कोरोना के एंटीबॉडी मिले जो यह साबित करते हैं कि उनके शरीर से कोरोना वायरस होकर गुजर चुका है। इसलिए समस्या कोरोना नहीं, समस्या है लोगों की कमजोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता। हमें इस पर ही ध्यान देना चाहिए।

कोरोना की मारक क्षमता बहुत ही न्यून है

सभ्यता अध्ययन केंद्र के निदेशक रवि शंकर ने कहा कि ऐसा ही एक शोध स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय ने भी किया है और उसका निष्कर्ष भी यही है। इन दोनों शोधों से यह साबित होता है कि जहाँ कोरोना का कम्युनिटी स्प्रेड नहीं देखा गया, वास्तव में वहाँ कम्युनिटी स्प्रेड हुआ और वह बिना पहचान में आए और नुकसान पहुँचाए, गायब भी हो गया। इन शोधों से यह भी साबित होता है कि कोरोना की मारक क्षमता वास्तव में तीन-पाँच प्रतिशत नहीं, बल्कि 0.25 से लेकर अधिकतम एक प्रतिशत ही है।

समाधान तो लोगों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में ही है

क्या सैनिटाइजर कोरोना के व्यापक संक्रमण को रोकने में सक्षम है? यदि हाँ तो आयुर्वेद में इसका क्या विकल्प है और यदि नहीं तो दूसरा उपाय क्या है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए डॉ. अग्रवाल ने कहा कि सैनिटाइजर या साबुन आदि तो हाथ में आए संक्रमण को ही रोक सकते हैं और सोचने की बात यह है कि आखिर दिन भर में कोई कितनी बार हाथ धोएगा। इसलिए इसका सबसे अच्छा उपाय तो सामान्य लोगों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना ही है। डॉ. अचल ने इस प्रश्न के उत्तर में कहा कि भारतीय परंपरा में वातावरण के संक्रमण को समाप्त करने का एक अच्छा उपाय धूपन रहा है। धूपन यानी कुछेक औषधियों का धुँआँ करना। उन्होंने कहा कि पहले गाँवों में सामूहिक रूप से धूपन करने की परंपरा रही है। इसे हम आज के मॉस सैनिटाइजेशन के रूप में देख सकते हैं। डॉ. अचल ने कहा कि हम घर में भी प्रयोग करके देख सकते हैं कि घी, शहद और गुड़ की समान मात्रा लेकर उसे कोयले या उपले की आग पर डाल कर धुँआँ करने से काफी लाभ होता है। इसमें यदि उपलब्ध हो तो कमल और कदम्ब का फूल मिलाना चाहिए।

डॉ. अग्रवाल तथा डॉ. अचल दोनों ने ही प्रसन्नता व्यक्त की कि आयुष मंत्रालय ने अब एक टास्क फोर्स बनाया है और कोरोना की आयुर्वेदिक चिकित्सा के लिए क्लीनीकल ट्रायल प्रारंभ किया है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि इससे अवश्य सुखद परिणाम मिलेंगे।

वेबिनार का संचालन करते हुए सभ्यता अध्ययन केंद्र के निदेशक रवि शंकर ने निम्न बिंदु और प्रश्न सामने रखे –
  1. क्या लाइलाज है कोविड 19?
  2. क्या कोविड 19 इतना बड़ा खतरा है, जितना कि उसे बताया जा रहा है?
  3. क्या आयुर्वेद इस खतरे का सामना करने में सक्षम है?
  4. क्या आयुर्वेद केवल परहेज का विज्ञान है?
  5. जब रोग ही नया है तो आयुर्वेद बिना शोध के चिकित्सा कैसे बता सकता है?

 

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