रमेश
आज डायबिटीज यानी मधुमेह भारत सहित पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ती हुई स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। बदलती जीवनशैली, शारीरिक गतिविधियों में कमी, बढ़ता मोटापा, असंतुलित खान-पान और आनुवंशिक प्रवृत्ति जैसे अनेक कारक विशेष रूप से टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ा सकते हैं। पहले यह बीमारी अधिक उम्र के लोगों में ज्यादा देखने को मिलती थी, लेकिन अब कम उम्र के युवाओं में भी इसके मामले सामने आ रहे हैं। डायबिटीज को आम बोलचाल में शुगर की बीमारी कहा जाता है, लेकिन यह केवल खून में शुगर बढ़ने तक सीमित समस्या नहीं है। लंबे समय तक रक्त में ग्लूकोज का स्तर अधिक रहने से हृदय, गुर्दे, आंखों, नसों और रक्त वाहिकाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। अच्छी बात यह है कि समय पर जांच, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, वजन पर नियंत्रण और चिकित्सक की सलाह से इस बीमारी को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए यह समझना आवश्यक है कि डायबिटीज क्या है, यह कैसे होती है, इसके क्या परिणाम होते हैं और रोजमर्रा के भोजन में चावल तथा रोटी को किस प्रकार शामिल करना चाहिए।
डायबिटीज क्या है?
डायबिटीज एक दीर्घकालिक चयापचय संबंधी बीमारी है, जिसमें शरीर रक्त में मौजूद ग्लूकोज यानी शर्करा का सही ढंग से उपयोग नहीं कर पाता और उसका स्तर सामान्य से अधिक हो जाता है। हम जो भोजन करते हैं, विशेषकर चावल, रोटी, आलू, फल और अन्य कार्बोहाइड्रेट वाले खाद्य पदार्थ, उनसे पाचन के दौरान ग्लूकोज बनता है। यह ग्लूकोज शरीर की कोशिकाओं के लिए ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्रोत है। ग्लूकोज को रक्त से कोशिकाओं तक पहुंचाने में इंसुलिन नामक हार्मोन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जिसका निर्माण अग्न्याशय यानी पैंक्रियास करता है। जब शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता या कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति ठीक से प्रतिक्रिया नहीं करतीं, तब ग्लूकोज रक्त में जमा होने लगता है। इसी स्थिति को डायबिटीज कहा जाता है। रक्त में शुगर का लगातार बढ़ा रहना शरीर की विभिन्न प्रणालियों को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए डायबिटीज की पहचान केवल किसी एक लक्षण के आधार पर नहीं, बल्कि उचित रक्त जांच और चिकित्सकीय मूल्यांकन के आधार पर करनी चाहिए।
इसके प्रकार
डायबिटीज के प्रमुख प्रकारों में टाइप-1, टाइप-2 और गर्भावधि मधुमेह शामिल हैं। टाइप-1 डायबिटीज में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अग्न्याशय की इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाओं को नष्ट कर देती है, जिसके कारण इंसुलिन का उत्पादन बहुत कम या बंद हो जाता है। ऐसे लोगों को सामान्यतः जीवनभर इंसुलिन की आवश्यकता होती है। टाइप-2 डायबिटीज में शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं, जिसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहते हैं। शुरुआत में अग्न्याशय अधिक इंसुलिन बनाकर इसकी भरपाई करने की कोशिश करता है, लेकिन समय के साथ शरीर की आवश्यकता के अनुसार इंसुलिन बनाना कठिन हो सकता है। इस प्रकार की डायबिटीज का संबंध आनुवंशिक प्रवृत्ति, पेट के आसपास अधिक चर्बी, शारीरिक निष्क्रियता और कुछ अन्य स्वास्थ्य संबंधी कारकों से होता है। गर्भावधि डायबिटीज गर्भावस्था के दौरान विकसित होती है और इससे मां तथा बच्चे दोनों के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ सकता है। गर्भावस्था के बाद शुगर सामान्य हो जाने पर भी भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ सकता है। हर प्रकार की डायबिटीज का कारण एक जैसा नहीं होता, इसलिए इसके उपचार और देखभाल की योजना भी व्यक्ति की स्थिति के अनुसार बनाई जाती है।
मुख्य कारण
टाइप-2 डायबिटीज एक दिन में विकसित नहीं होती, बल्कि अनेक जोखिम कारकों के संयुक्त प्रभाव से धीरे-धीरे पैदा हो सकती है। जब किसी व्यक्ति की शारीरिक गतिविधि कम होती है, भोजन में ऊर्जा की मात्रा उसकी आवश्यकता से अधिक रहती है और वजन बढ़ने लगता है, तब विशेषकर पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी इंसुलिन की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती है। इससे भोजन के बाद रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ने लगता है। यदि अग्न्याशय लंबे समय तक अतिरिक्त इंसुलिन बनाकर इस स्थिति की भरपाई नहीं कर पाता, तो शुगर का स्तर लगातार बढ़ा रह सकता है। इसके अलावा परिवार में माता-पिता या भाई-बहनों को डायबिटीज होने, उम्र बढ़ने, गर्भावस्था में मधुमेह होने के इतिहास और कुछ अन्य स्वास्थ्य स्थितियों से जोखिम बढ़ सकता है। अत्यधिक मीठे पेय, अधिक ऊर्जा वाले प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और कम फाइबर वाला असंतुलित भोजन वजन तथा रक्त शुगर नियंत्रण को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, केवल मिठाई खाने से ही डायबिटीज नहीं होती और न ही हर मोटे व्यक्ति को यह बीमारी होती है। सामान्य वजन वाले लोगों को भी आनुवंशिक या अन्य कारणों से डायबिटीज हो सकती है। टाइप-1 डायबिटीज का कारण मुख्य रूप से प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी प्रक्रिया है, इसलिए इसे गलत खान-पान या व्यक्ति की लापरवाही का परिणाम मानना गलत होगा।
लक्षण पहचानें
डायबिटीज की शुरुआत में कई लोगों को कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देता। इसी वजह से कुछ लोगों को बीमारी का पता नियमित स्वास्थ्य जांच के दौरान ही चलता है। इसके सामान्य लक्षणों में बार-बार पेशाब आना, बहुत अधिक प्यास लगना, सामान्य से ज्यादा भूख लगना, बिना कारण वजन घटना, थकान, आंखों के सामने धुंधलापन और घाव भरने में देर होना शामिल हैं। कुछ लोगों में बार-बार त्वचा, मसूड़ों या अन्य हिस्सों में संक्रमण भी हो सकता है। लंबे समय तक शुगर अधिक रहने पर हाथ-पैरों में झुनझुनी, जलन या सुन्नपन महसूस हो सकता है। गर्दन, बगल या शरीर की सिलवटों में त्वचा का गहरा और मोटा पड़ना भी कभी-कभी इंसुलिन रेजिस्टेंस का संकेत हो सकता है। इन लक्षणों का अर्थ हमेशा डायबिटीज होना नहीं है, लेकिन इनके बने रहने पर रक्त शुगर की जांच कराना जरूरी है। यदि बहुत ज्यादा प्यास और पेशाब के साथ उल्टी, पेट दर्द, गहरी या तेज सांस, अत्यधिक कमजोरी अथवा भ्रम की स्थिति हो, तो तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए, क्योंकि ये गंभीर स्थिति के संकेत हो सकते हैं।
जांच कैसे करें?
डायबिटीज की पहचान के लिए मुख्य रूप से फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज, एचबीए1सी और जरूरत पड़ने पर ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट का उपयोग किया जाता है। फास्टिंग जांच में कम से कम आठ घंटे बिना कैलोरी वाले भोजन या पेय के रहने के बाद रक्त शुगर मापी जाती है। एचबीए1सी जांच पिछले लगभग तीन महीनों के औसत रक्त शुगर स्तर का अनुमान देती है। गैर-गर्भवती वयस्कों में फास्टिंग शुगर 126 mg/dL या अधिक, एचबीए1सी 6.5 प्रतिशत या अधिक, अथवा ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट में ग्लूकोज पीने के दो घंटे बाद शुगर 200 mg/dL या अधिक होना डायबिटीज की सीमा में आता है। सामान्यतः फास्टिंग शुगर 100 mg/dL से कम और एचबीए1सी 5.7 प्रतिशत से कम होना सामान्य सीमा में माना जाता है। लक्षणों के साथ रैंडम प्लाज्मा ग्लूकोज 200 mg/dL या अधिक भी निदान में सहायक हो सकता है। बिना स्पष्ट लक्षणों के असामान्य नतीजे की आमतौर पर दूसरी जांच से पुष्टि की जाती है। गर्भावस्था तथा कुछ विशेष स्वास्थ्य स्थितियों में अलग मानदंड लागू हो सकते हैं। जांच के परिणामों की व्याख्या डॉक्टर से करानी चाहिए।
शरीर पर असर
यदि रक्त में शुगर लंबे समय तक अधिक बनी रहती है, तो शरीर की छोटी और बड़ी रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। इसका असर आंखों पर पड़ने से डायबिटिक रेटिनोपैथी और दृष्टि कमजोर होने का खतरा बढ़ता है। गुर्दों की रक्त वाहिकाओं पर प्रभाव पड़ने से डायबिटिक किडनी डिजीज विकसित हो सकती है, जो गंभीर अवस्था में गुर्दों की कार्यक्षमता को बहुत कम कर सकती है। नसों को नुकसान पहुंचने पर पैरों में झुनझुनी, जलन, दर्द या संवेदना कम होने की समस्या हो सकती है। ऐसी स्थिति में छोटी चोट या छाला भी समय पर महसूस नहीं होता और संक्रमण बढ़ने का खतरा रहता है। डायबिटीज हृदय रोग, दिल का दौरा, स्ट्रोक और पैरों में रक्त संचार की समस्याओं का जोखिम भी बढ़ाती है। कुछ लोगों में दांतों और मसूड़ों की बीमारी, त्वचा संक्रमण और यौन स्वास्थ्य से संबंधित परेशानियां भी हो सकती हैं। इन जटिलताओं का जोखिम हर व्यक्ति में समान नहीं होता। नियमित जांच, रक्त शुगर और रक्तचाप पर नियंत्रण, जरूरत के अनुसार कोलेस्ट्रॉल का प्रबंधन, पैरों की देखभाल और चिकित्सक द्वारा निर्धारित उपचार से कई जटिलताओं का खतरा कम किया जा सकता है।
क्या यह ठीक हो सकती है?
इस सवाल का जवाब डायबिटीज के प्रकार और व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करता है। टाइप-1 डायबिटीज का वर्तमान में सामान्य अर्थों में स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है और इसमें इंसुलिन जीवनरक्षक उपचार है। टाइप-2 डायबिटीज में कुछ लोगों का रक्त शुगर स्तर वजन कम करने, भोजन में बदलाव, नियमित शारीरिक गतिविधि और आवश्यक उपचार से इतना सुधर सकता है कि वे चिकित्सकीय देखरेख में रिमिशन की स्थिति तक पहुंच जाएं। रिमिशन का अर्थ है कि बिना शुगर कम करने वाली दवाओं के रक्त शुगर कुछ निर्धारित समय तक डायबिटीज की सीमा से नीचे बना रहे। इसका अर्थ बीमारी हमेशा के लिए समाप्त हो जाना नहीं है; भविष्य में शुगर फिर बढ़ सकती है और नियमित निगरानी आवश्यक रहती है। हर व्यक्ति को रिमिशन मिलना संभव नहीं होता। कुछ लोगों को जीवनभर दवाओं या इंसुलिन की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए किसी घरेलू नुस्खे, काढ़े, जड़ी-बूटी या विशेष खाद्य पदार्थ से डायबिटीज पूरी तरह ठीक करने के दावे पर भरोसा नहीं करना चाहिए। डॉक्टर की सलाह के बिना दवाएं बंद करना भी खतरनाक हो सकता है। उपचार का लक्ष्य रक्त शुगर को व्यक्ति के लिए तय सीमा में रखना और दीर्घकालिक जटिलताओं से बचाना है।
चावल और रोटी
डायबिटीज से पीड़ित लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि क्या उन्हें चावल और रोटी खाना बंद कर देना चाहिए। इसका सीधा जवाब है—नहीं, डायबिटीज होने पर चावल और रोटी पूरी तरह छोड़ना जरूरी नहीं है, लेकिन उनकी मात्रा, प्रकार और भोजन के साथ खाई जाने वाली दूसरी चीजों पर ध्यान देना आवश्यक है। चावल और गेहूं दोनों में कार्बोहाइड्रेट होते हैं, जो पाचन के बाद ग्लूकोज में बदलते हैं और रक्त शुगर को बढ़ा सकते हैं। इसका प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करता है कि कितना भोजन खाया गया, चावल या रोटी किस प्रकार की है, उसके साथ कितनी सब्जियां और प्रोटीन लिया गया तथा व्यक्ति की शारीरिक गतिविधि और दवाओं की स्थिति क्या है। यदि कोई व्यक्ति एक बार में बहुत अधिक चावल खाता है या कई बड़ी रोटियां खाने के साथ आलू, मिठाई और मीठे पेय भी लेता है, तो भोजन के बाद शुगर काफी बढ़ सकती है। इसके विपरीत, उचित मात्रा में अनाज के साथ हरी सब्जियां, दाल और प्रोटीन लेने से संतुलित भोजन तैयार किया जा सकता है। इसलिए समस्या केवल चावल या रोटी नहीं, बल्कि पूरे भोजन की संरचना और उसकी मात्रा है।
सफेद चावल
सफेद चावल भारतीय भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इसे अधिक मात्रा में खाने से रक्त शुगर बढ़ सकती है। सफेद चावल में भूरे चावल की तुलना में फाइबर कम होता है, क्योंकि उसकी बाहरी परत और कुछ पोषक तत्व प्रसंस्करण के दौरान हट जाते हैं। फिर भी, इसका अर्थ यह नहीं है कि सफेद चावल खाने वाला हर व्यक्ति अपनी शुगर नियंत्रित नहीं कर सकता। डायबिटीज वाले व्यक्ति को चावल की मात्रा अपने रक्त शुगर के नतीजों, वजन, गतिविधि और दवाओं के अनुसार तय करनी चाहिए। उदाहरण के लिए, पके हुए चावल की लगभग आधी छोटी कटोरी से शुरुआत करना कुछ लोगों के लिए व्यावहारिक हो सकता है, लेकिन यह सभी के लिए निश्चित मात्रा नहीं है। किसी को कम और किसी को अधिक मात्रा उपयुक्त हो सकती है। चावल के साथ भरपूर सब्जी और दाल या अन्य प्रोटीन स्रोत शामिल करना उपयोगी है। यदि संभव हो तो चावल खाने के बाद अपनी निर्धारित समय-सारणी के अनुसार शुगर मापकर यह समझें कि उस भोजन का शरीर पर क्या असर पड़ता है। ब्राउन राइस या कम प्रसंस्कृत अनाज फाइबर की दृष्टि से बेहतर विकल्प हो सकते हैं, लेकिन उनकी मात्रा पर भी नियंत्रण जरूरी है। केवल चावल का प्रकार बदल देना पर्याप्त नहीं है, कुल कार्बोहाइड्रेट और भोजन का संतुलन अधिक महत्वपूर्ण है।
गेहूं की रोटी
गेहूं की रोटी में भी कार्बोहाइड्रेट होता है, इसलिए यह मानना गलत है कि रोटी खाने से शुगर नहीं बढ़ती। फिर भी, साबुत गेहूं के आटे से बनी रोटी फाइबर और अन्य पोषक तत्व प्रदान करती है। रोटी की मात्रा व्यक्ति की जरूरत के अनुसार तय होनी चाहिए। किसी के लिए एक या दो मध्यम आकार की रोटियां पर्याप्त हो सकती हैं, जबकि दूसरे व्यक्ति की जरूरत अलग हो सकती है। रोटी खाते समय उसमें घी या तेल बहुत अधिक लगाने, साथ में तली हुई सब्जियां खाने और भोजन के बाद मीठा लेने से बचना उपयोगी है। रोटी का आकार भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बहुत बड़ी रोटी में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक हो सकती है। जौ, चना या अन्य अनाज को गेहूं के साथ मिलाकर आटा तैयार करना आहार में विविधता ला सकता है, लेकिन किसी विशेष मिश्रित आटे को शुगर का इलाज नहीं समझना चाहिए। सबसे अच्छा तरीका यह है कि रोटी को दाल, दही, पनीर या अन्य उपयुक्त प्रोटीन स्रोत और बिना अधिक तेल वाली सब्जियों के साथ खाया जाए। इस तरह पेट भरने के साथ भोजन का पोषण भी बेहतर होता है।
कौन बेहतर है?
चावल और रोटी में से किसी एक को सभी डायबिटीज रोगियों के लिए बेहतर घोषित नहीं किया जा सकता। दोनों का प्रभाव उनकी मात्रा, किस्म और भोजन के साथ खाए जाने वाले अन्य पदार्थों पर निर्भर करता है। यदि किसी व्यक्ति को चावल पसंद है, तो वह सीमित मात्रा में चावल खाकर बाकी थाली सब्जियों और प्रोटीन से भर सकता है। इसी प्रकार रोटी पसंद करने वाला व्यक्ति उचित मात्रा में साबुत गेहूं की रोटी खा सकता है। कुछ लोग दोनों को एक साथ खाते हैं, जैसे दो रोटियों के साथ एक कटोरी चावल; ऐसे में दोनों स्रोतों से मिलने वाले कार्बोहाइड्रेट को जोड़कर देखना चाहिए। कई बार व्यक्ति रोटी की संख्या तो नियंत्रित कर लेता है, लेकिन चावल, आलू, नमकीन और बिस्कुट की मात्रा पर ध्यान नहीं देता। इससे कुल कार्बोहाइड्रेट और कैलोरी अधिक हो सकती है। भोजन का चुनाव ऐसा होना चाहिए जो पौष्टिक हो, स्थानीय रूप से उपलब्ध हो, परिवार के बजट में हो और लंबे समय तक अपनाया जा सके। डायबिटीज में भोजन का उद्देश्य केवल शुगर बढ़ने से बचना नहीं, बल्कि शरीर को पर्याप्त ऊर्जा, प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और खनिज देना भी है।
सही थाली
डायबिटीज में भोजन की थाली को संतुलित रखने का एक सरल तरीका है कि लगभग आधी थाली में बिना अधिक स्टार्च वाली सब्जियां, एक चौथाई में प्रोटीन और शेष एक चौथाई में कार्बोहाइड्रेट वाले खाद्य पदार्थ रखे जाएं। भारतीय भोजन में इसका अर्थ है कि आधी थाली में लौकी, तोरई, भिंडी, पालक, गोभी, पत्तागोभी, खीरा या अन्य उपयुक्त सब्जियां और सलाद रखें। एक चौथाई में दाल, चना, राजमा, अंडा, मछली, चिकन या बिना अधिक वसा वाला पनीर जैसे प्रोटीन स्रोत रखें। शेष चौथाई में सीमित मात्रा में रोटी, चावल या अन्य अनाज लें। ध्यान रहे कि दाल और फलियों में भी कार्बोहाइड्रेट होता है, इसलिए कुल मात्रा को ध्यान में रखना जरूरी है। आलू, मक्का और मटर जैसी स्टार्च वाली सब्जियों को भी कार्बोहाइड्रेट वाले हिस्से में गिनना उपयोगी हो सकता है। यह थाली एक शुरुआती मार्गदर्शिका है, कोई कठोर नियम नहीं। बच्चों, गर्भवती महिलाओं, कम वजन वाले लोगों, गुर्दे की बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों और विशेष दवाएं लेने वालों के लिए अलग योजना की जरूरत हो सकती है। भोजन में विविधता बनाए रखना और हर दिन पर्याप्त पोषण लेना अधिक महत्वपूर्ण है।
किनसे बचें?
डायबिटीज में उन खाद्य पदार्थों की मात्रा कम करनी चाहिए जिनमें अतिरिक्त चीनी, अधिक कैलोरी और कम पोषण होता है। इनमें मीठे शीतल पेय, पैकेट वाले जूस, चीनी वाली चाय-कॉफी, मिठाइयां, केक, पेस्ट्री, मीठे बिस्कुट और अधिक चीनी वाले पैकेटबंद खाद्य पदार्थ शामिल हैं। जूस की जगह साबुत फल खाना सामान्यतः बेहतर है, क्योंकि साबुत फल में फाइबर बना रहता है। फल पूरी तरह बंद करने की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन उनकी मात्रा और प्रकार को संतुलित रखना चाहिए। तली हुई चीजें, अत्यधिक घी-मक्खन, ट्रांस फैट वाले खाद्य पदार्थ और बार-बार फास्ट फूड खाना वजन, हृदय स्वास्थ्य और रक्त शुगर प्रबंधन को कठिन बना सकता है। नमक की अत्यधिक मात्रा भी रक्तचाप पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। गुड़, शहद और ब्राउन शुगर को भी रक्त शुगर पर असर डालने वाली शर्करा के रूप में समझना चाहिए; इन्हें चीनी का ऐसा विकल्प नहीं मानना चाहिए जिसे बिना सीमा के खाया जा सके। इसी तरह, डायबिटीज के नाम पर महंगे विशेष खाद्य पदार्थ खरीदना अनिवार्य नहीं है। घर का सामान्य संतुलित भोजन, सही मात्रा और नियमित समय अधिक व्यावहारिक आधार प्रदान करते हैं।
दिनभर का भोजन
सुबह के नाश्ते में सब्जियों वाला दलिया या ओट्स, अथवा सीमित मात्रा में बेसन का चीला लिया जा सकता है। साथ में बिना चीनी की चाय या पानी लें। दोपहर में उचित मात्रा में रोटी या चावल, एक कटोरी उपयुक्त दाल, हरी सब्जी और सलाद रखें। जरूरत के अनुसार सादा दही शामिल किया जा सकता है। शाम को थोड़े भुने चने या सीमित मात्रा में बिना नमक वाले मेवे लिए जा सकते हैं। भूख और जरूरत के अनुसार साबुत फल भी लिया जा सकता है। रात के भोजन में उचित मात्रा में रोटी या चावल, सब्जी और दाल अथवा अन्य प्रोटीन स्रोत शामिल करें। देर रात बहुत भारी भोजन करने से बचें। यह भोजन कार्यक्रम सामान्य जानकारी के लिए है, किसी व्यक्ति के लिए निर्धारित चिकित्सकीय डाइट नहीं है, क्योंकि उम्र, वजन, शारीरिक मेहनत, गुर्दों की स्थिति, दवाओं और रक्त शुगर के अनुसार भोजन की जरूरत बदलती है। भोजन के बीच बहुत लंबा अंतर रखने, फिर एक बार में अत्यधिक खाने या वजन घटाने के लिए अचानक भोजन बहुत कम कर देने से बचना चाहिए। यदि आप इंसुलिन या ऐसी दवाएं लेते हैं जिनसे शुगर कम हो सकती है, तो भोजन छोड़ने या अचानक कार्बोहाइड्रेट कम करने से रक्त शुगर बहुत कम होने का खतरा हो सकता है। ऐसे में आहार में बदलाव डॉक्टर की सलाह से करें।
व्यायाम और वजन
डायबिटीज को नियंत्रित करने में शारीरिक गतिविधि की महत्वपूर्ण भूमिका है। चलने, साइकिल चलाने, तैरने और अपनी क्षमता के अनुसार अन्य व्यायाम करने से मांसपेशियां ग्लूकोज का बेहतर उपयोग कर सकती हैं और इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता बढ़ सकती है। अधिकांश वयस्कों के लिए सप्ताह में कम से कम 150 मिनट मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि एक सामान्य लक्ष्य है। उदाहरण के लिए, सप्ताह में पांच दिन लगभग 30 मिनट तेज चाल से चलना उपयोगी हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से निष्क्रिय है, तो शुरुआत कम समय से करके धीरे-धीरे अवधि बढ़ानी चाहिए। लंबे समय तक लगातार बैठने के बीच छोटे-छोटे अंतराल में उठकर चलना भी मददगार है। टाइप-2 डायबिटीज और अधिक वजन वाले कुछ लोगों में वजन का लगभग 5–10 प्रतिशत कम करना भी रक्त शुगर नियंत्रण में लाभकारी हो सकता है, हालांकि सही लक्ष्य व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार तय किया जाना चाहिए। व्यायाम के दौरान शुगर बहुत कम होने का जोखिम इंसुलिन या कुछ विशेष दवाएं लेने वालों में अधिक हो सकता है, इसलिए उन्हें अपने डॉक्टर से उचित सावधानियां समझनी चाहिए। पैरों में संवेदना की कमी, हृदय रोग या अन्य गंभीर समस्याएं होने पर व्यायाम का प्रकार भी चिकित्सकीय सलाह से चुनना चाहिए।
दवाएं और देखभाल
डायबिटीज के उपचार में केवल खान-पान और व्यायाम ही नहीं, बल्कि आवश्यकतानुसार दवाओं तथा इंसुलिन का सही उपयोग भी महत्वपूर्ण है। डॉक्टर व्यक्ति की शुगर रिपोर्ट, एचबीए1सी, उम्र, वजन, गुर्दों और हृदय की स्थिति तथा अन्य स्वास्थ्य समस्याओं को देखकर उपचार निर्धारित करते हैं। दवा की खुराक स्वयं कम करना, बढ़ाना या पूरी तरह बंद करना उचित नहीं है। समय-समय पर रक्त शुगर की जांच और डॉक्टर की सलाह के अनुसार एचबीए1सी की निगरानी से यह पता चलता है कि उपचार कितना प्रभावी है। रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल, गुर्दों की कार्यक्षमता, आंखों की जांच और पैरों की देखभाल भी नियमित योजना का हिस्सा होने चाहिए। यदि शुगर निर्धारित लक्ष्य से ऊपर बनी रहती है, तो भोजन, गतिविधि और दवाओं की योजना की समीक्षा करानी चाहिए। वहीं यदि पसीना आना, कंपकंपी, अचानक भूख लगना, चक्कर या भ्रम जैसे लक्षण हों, तो कम रक्त शुगर की संभावना पर ध्यान देना चाहिए, विशेषकर यदि व्यक्ति इंसुलिन या शुगर घटाने वाली कुछ दवाएं ले रहा हो। गंभीर लक्षणों में तुरंत चिकित्सा सहायता लें।
बचाव के उपाय
टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम को कम करने के लिए रोजमर्रा की जीवनशैली में छोटे लेकिन लगातार बदलाव उपयोगी हो सकते हैं। भोजन में सब्जियों, साबुत अनाज, दालों और अन्य फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों को स्थान दें; मीठे पेय और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों को सीमित करें; वजन को स्वस्थ सीमा में रखने की कोशिश करें; नियमित शारीरिक गतिविधि करें और पर्याप्त नींद लें। परिवार में डायबिटीज का इतिहास होने, वजन अधिक होने या अन्य जोखिम कारक मौजूद होने पर चिकित्सक से यह पूछना चाहिए कि रक्त शुगर की जांच कब करानी चाहिए। केवल प्यास लगने या बार-बार पेशाब आने का इंतजार करना सही नहीं है, क्योंकि टाइप-2 डायबिटीज लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षणों के रह सकती है। बचाव के ये उपाय जोखिम घटाने में मदद करते हैं, लेकिन बीमारी होने की पूरी गारंटी से रोकथाम नहीं करते। इसलिए स्वस्थ जीवनशैली के साथ उचित जांच भी जरूरी है।
निष्कर्ष
डायबिटीज एक गंभीर लेकिन प्रबंधित की जा सकने वाली बीमारी है। इसका प्रभाव केवल रक्त शुगर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लंबे समय में आंखों, गुर्दों, हृदय, नसों और पैरों के स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकता है। समय पर जांच, नियमित व्यायाम, संतुलित भोजन, उचित वजन और चिकित्सक द्वारा निर्धारित दवाओं से इसके दुष्प्रभावों का खतरा कम किया जा सकता है। चावल और रोटी डायबिटीज के मरीजों के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित खाद्य पदार्थ नहीं हैं। इन्हें उचित मात्रा में, सब्जियों और प्रोटीन के साथ संतुलित भोजन का हिस्सा बनाया जा सकता है। न तो केवल चावल छोड़ना इसका इलाज है और न ही केवल मोटा अनाज खाना पर्याप्त है। सबसे महत्वपूर्ण है कि व्यक्ति अपने रक्त शुगर के परिणामों को समझे, भोजन की मात्रा पर ध्यान दे और अपनी जरूरत के अनुसार उपचार अपनाए। डायबिटीज में सफलता किसी एक चमत्कारी नुस्खे से नहीं, बल्कि नियमित देखभाल और लंबे समय तक अपनाई गई स्वस्थ आदतों से मिलती है।
संदर्भ
1. डॉ. लाल पैथलैब्स — डायबिटीज: कारण, लक्षण और इलाज: https://www.lalpathlabs.com/blog/diabetes-in-hindi/
2. NIDDK — डायबिटीज की जांच और निदान: https://www.niddk.nih.gov/health-information/diabetes/overview/tests-diagnosis
3. CDC — डायबिटीज में भोजन की योजना: https://www.cdc.gov/diabetes/healthy-eating/diabetes-meal-planning.html
4. CDC — कार्बोहाइड्रेट और रक्त शुगर का प्रबंधन: https://www.cdc.gov/diabetes/healthy-eating/carb-counting-manage-blood-sugar.html
(अस्वीकरण: यह लेख स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से है। यह डॉक्टर की जांच, व्यक्तिगत आहार योजना या उपचार का विकल्प नहीं है।)
