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कलाकारों की दुनिया पर्दे से इतर भी होती है।

‘शास्त्रीय नृत्यकारों से अंतरंग संवाद’ पुस्तक हुआ दिल्ली में हुआ लोकार्पण
• कला समीक्षक व पत्रकार शशिप्रभा तिवारी ने लिखी है पुस्तक
• ‘शास्त्रीय नृत्यकारों के साथ अंतरंग संवाद’ एक किताब भर नहीं है। बल्कि, यह एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म की तरह है: सच्चिदानंद जोशी, सदस्य सचिव, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र
• ‘भारत में संगीत और नृत्य मनोरंजन के लिए नहीं थे, वे भी आध्यात्मिक प्रक्रियाएं थीं।’-शशिप्रभा तिवारी, लेखिका

नई दिल्ली/1 अप्रैल/2021

कलाकारों की दुनिया पर्दे से इतर भी होती है। लेकिन इस दुनिया से दीदार आम दर्शक या पाठक नहीं कर पाते हैं। उनके जीवन-संघर्ष को छूती हुई शास्त्रीय नृत्यकारों की दुनिया को कलमबद्ध करने का काम प्रसिद्ध कला समीक्षक व पत्रकार शशिप्रभा तिवारी ने किया है। उनके पांच वर्षों के अथक प्रयासों के बाद जो जिंदगानी लोगों के सामने वह लाई हैं, उसका नाम उन्होंने ‘शास्त्रीय नृत्यकारों से अंतरंग संवाद’ रखा है।
पिछले दिनों नई दिल्ली के कथक केंद्र के स्वामी विवेकानंद सभागार में कथक केंद्र और संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से विविधा समारोह का आयोजन कला मंडली की ओर से किया गया। इस समारोह के दूसरे दिन शशिप्रभा तिवारी लिखित पुस्तक ‘शास्त्रीय नृत्यकारों से अंतरंग संवाद’ के विमोचन हुआ। इस अवसर पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव सच्चिदानंद जोशी, कथक केंद्र के निदेशक सुमन कुमार, प्रकाशक माधव भान, गुरू जयकिशन महाराज, कला मंडली की निदेशक प्रतिभा सिंह मौजूद थे।


यह श्रद्धा युक्त समर्पण का काम है
पुस्तक विमोचन करते हुए, सदस्य सचिव सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि यह ‘शास्त्रीय नृत्यकारों के साथ अंतरंग संवाद’ एक किताब भर नहीं है। बल्कि, यह एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म की तरह है। इसमें लेखिका शशिप्रभा तिवारी ने कलाकारों के अंतरमन की थाह पाने की कोशिश की हैं। यह श्रद्धा युक्त समर्पण का काम है। यह सिर्फ पत्रकारीय कार्य भर नहीं है।
शब्दों के जरिए कलाकार के अंतरंग को तलाशना कठिन कार्य है
इस अवसर पर कथक केंद्र के निदेशक सुमन कुमार ने कहा कि शब्दों के जरिए कलाकार के अंतरंग को तलाशना कठिन कार्य है। लंबे समय के अनुभव से गुजरने, कला और कलाकार से जुड़ने के बाद, मंच से इतर कलाकार का जो व्यक्तित्व होता है, उसके अंतरंग में जो छिपी हुई चीजें होती हैं, उनको खोजकर लाने का काम कला समीक्षक व पत्रकार शशिप्रभा तिवारी करती रही हैं। वह कई वर्षों तक बातचीत का संग्रह करती रहीं। फिर, उसे पुस्तक के रूप में मूर्त रूप दिया है।

‘शास्त्रीय नृत्यकारों से अंतरंग संवाद’ की लेखिका शशिप्रभा तिवारी ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारत में संगीत और नृत्य मनोरंजन के लिए नहीं थे, वे भी आध्यात्मिक प्रक्रियाएं थीं। अगर, भारतीय शास्त्रीय नृत्य की मुद्राओं या संगीत की ध्वनियों का एक खास असर होता है। यह पुस्तक ‘शास्त्रीय नृत्यकारों से अंतरंग संवाद’ को संकलित करने की प्रेरणा, शायद नृत्य की मुद्राओं और संगीत की ध्वनियों की आध्यात्मिक अनुभूति की एक परिणति स्वरूप है। इस किताब पर करीब पांच वर्षों से मैं काम कर रही थी। वैसे यह करीब बीस वर्षों के अनुभव का परिणाम है।
प्रसिद्ध लेखक, साहित्यकार और कला समीक्षक प्रयाग शुक्ल ने पुस्तक ‘शास्त्रीय नृत्यकारों से अंतरंग संवाद’ की प्रस्तावना लिखी है। पुस्तक में प्रयाग शुक्ल लिखते हैं कि हमारे शास्त्रीय नृत्य रूप अलग-अलग प्रदेशों में जन्मे-पनपे और अब अखिल भारतीय स्तर पर सिखाए-संवारे और नए सिरे से ‘अविष्कृत’ किए जा रहे हैं, यह बात भी इस संवाद पुस्तक के महत्व को बढ़ाती है, क्योंकि नृत्य रूपों के अखिल भारतीय परिदृश्य का इसमें ध्यान रखा गया है। लय-गति और सौंदर्य की अर्थमयी छवियों तथा विभिन्न भंगिमाओं, मुद्राओं और वेशभूषाओं से लैस हमारे शास्त्रीय नृत्य रूपों की विविधता हमें उनके प्रति उत्सुक बनाए रखती है। यह पुस्तक उसी उत्सुकता को पोसती और बढ़ाती है।
प्रस्तुत पुस्तक इन्हीं सब चीजों और पहलुओं को खंगालने का काम करती है। इसकी विशेषता यही है कि सुपरिचित नृत्य समीक्षक शशिप्रभा तिवारी ने नृत्य रूपों की बारीकियों में और अधिक उतरने और हमें उतारने की एक नई विधि अपनाई है-संवाद की विधि। यह विधि सामान्यतः ली जाने वाली भेंटवार्ताओं से अलग है। सारी सामग्री, नृत्य कलाकारों से बातचीत करके ही इसमें संकलित की गई है, सवालों को छोड़ दिया गया है, नृत्य कलाकारों के उत्तर ही प्रमुख हैं। पर, यह भान बना रहता है कि यह सामग्री नृत्य कलाकारों के निरा वक्तव्यों या कथनों पर आधारित नहीं है, उसमें चर्चा का एक संचार भी है। इसलिए यह रूचिपूर्ण भी है, और अर्थपूर्ण भी। इस विधि से प्रायः हर कलाकार को उसकी पृष्ठभूमि, उसकी दीक्षा और उसके रचनात्मक उद्यमों में उतार दिया गया है, और जब पलटकर किसी नृत्य कलाकार ने अपनी बात कही है तो उसमें एक जीवंतता स्वतः आ गई है। इस सामग्री को पढ़ना नृत्य रूपों के इतिहास, उनके गुरूओं और उनकी कुछ लक्षित-अलक्षित विशिष्टताओं और चुनौतियों से परिचित होना भी है।
युवा कलाकारों के लिए प्रेरक है पुस्तकः पंडित जय किशन महाराज
इस पुस्तक विमोचन समारोह में पंडित जयकिशन महाराज और प्रकाशक माधव भान ने भी अपने-अपने अनुभवों को साझा किया। पंडित जयकिशन महाराज ने कहा कि यह पुस्तक युवा कलाकारों को प्रेरणा देगी। वहीं, माधव भान ने कहा कि इस पुस्तक को पूरा करना अपने-आप एक चुनौती भरा रहा। कथक नृत्यांगना रचना यादव व मालती श्याम, ओडिशी नृत्यांगना मधुमीता राउत, कथाकार व कवयित्री मालविका जोशी, संतूर वादक विपुल राय, सितार वादक उमाशंकर भी उपस्थित थे।

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