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संपादकीय : मरीजों की डॉक्टरों से दूरी कम हो

संपादकीय : मरीजों की डॉक्टरों से दूरी कम हो

अजय वर्मा

दुनिया भर में 1 जुलाई को डॉक्टर्स डे मनाया गया। यह पटना में जन्मे विश्व प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ विधान चंद्र राय, जो पश्चिम बंगाल के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री भी थे, उनके जन्मदिन और पुण्यतिथि दोनों ही 1 जुलाई के दिन मनाया जाता है। इस साल का थीम था—Behind Mask: who heals the healer यानी डाक्टरों के दर्द की दवा क्या है।
डॉक्टर समुदाय को धरती का भगवान माना जाता है क्योंकि किसी को रोगमुक्त करने से लेकर उनकी जान बचाने तक में उनकी बड़ी भूमिका होती है। अफसोस की बात है कि निजी और सार्वजनिक, दोनों क्षेत्रों की स्वास्थ्य सेवाएं बड़ी दवा निर्माता कंपनियों के अंधाधुंध मुनाफे के प्रति समर्पित हो चली हैं। इसके चलते न सिर्फ डॉक्टरी पेशे की नैतिकताएं बल्कि वह हिप्पोक्रेटिक शपथ भी खतरे में है, जो उसे नैतिक, प्रतिबद्ध और सम्माननीय बनाती आई है।
लेकिन वक्त के हर दौर में ऐसा नहीं हुआ। कभी डॉक्टर अपने समर्पण से ही धरती के भगवान माने जाने लगे थे। इसके कई उदाहरण मौजूद हैं जो आज भी प्रेरणापुंज बनकर याद किए जाते हैं। उनकी चर्चा भी इस मौके पर जरूरी है। मसलन पटना के डॉ. शिव नारायण सिंह। वे न केवल डॉक्टर बल्कि संगीत संरक्षक और सुधि संगीतज्ञ भी थे। वे सितार बजाते थे और आकाशवाणाी से उनका वादन भी प्रसारित होता था। वे मरीजों को सस्ती से सस्ती दवा लिखते थे। टेस्ट वगैरह का कोई झंझट नहीं। इसी कड़ी में डॉ.एजाज अहमद का नाम आता है। वे पटना में प्रैक्टिस करते हैं। उनकी फी अभी भी मात्र 10 रुपये है। वे सर्जन भी हैं। कई बार उन्होंने गरीब मरीजों की मुफ्त सर्जरी भी की है। परिवार के दबाव के बावजूद फी नहीं बढ़ाते हैं। पटना में ही डॉ. अरुण कुमार सिंह 25 रुपये में मरीज देखते हैं। कम से कम दवा, वह भी सस्ती और बहुत जरूरत होने पर टेस्ट…यही उनकी खास बात है। डॉ. सहजानंद सिंह भी ऐसे ही डाक्टर हैं जिनकी फी 50 रुपये है। वे अपने पेशे को लोगों की सेवा मानते है। ऐसे कई डॉक्टर समाज में हैं और गुमनामी में हैं।
लेकिन यह छोटी धारा है। ज्यादातर ऐसे नहीं मिलेंगे। वजह कई हैं। दवा माफिया के प्रलोभन से लेकर सरकार की लापरवाही तक। इससे से विचलित होकर वे निजी अस्पतालों की सेवा में लग जाते हैं जहां की नीति मुनाफा है। वहां महंगे उपचार से आमजन से दूर होते जा रहे हैं डॉक्टर। सरकारी कोशिशें और योजनाओं की पहुंच भी सीमित है। सरकार को चाहिए कि वे ऐसा प्रयास करें कि मरीजों की डॉक्टरों से दूरी समाप्त हो सके। तभी हर वर्ग की स्वास्थ्य रक्षा हो सकती है।

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