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El Niño, चरम मौसमी परिघटनाएँ और सामूहिक उत्तरदायित्व

El Niño, चरम मौसमी परिघटनाएँ और सामूहिक उत्तरदायित्व

खास आलेख: विश्व पर्यावरण दिवस और बदलता भारत

धीप्रज्ञ द्विवेदी

 

भूमिका

वर्ष 2026 में संपूर्ण विश्व जब “प्रकृति से प्रेरित। जलवायु के लिए। हमारे भविष्य के लिए।” के मूल मंत्र और ‘जलवायु कार्यवाही’ (Climate Action) के संकल्प के साथ ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ मना रहा है, तब भारतीय उपमहाद्वीप एक अभूतपूर्व और भयावह ग्रीष्म लहर (Heatwave) की चपेट में है। वर्तमान समय में भारत के कई राज्य रिकॉर्ड-तोड़ उच्च तापमान और भीषण जल संकट से जूझ रहे हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल भविष्य की कोई अमूर्त चेतावनी नहीं, बल्कि वर्तमान की एक अत्यंत कठोर वास्तविकता बन चुका है। भारत में इस बार की ग्रीष्म ऋतु की भयावहता के पीछे वैश्विक तापन (Global Warming) के साथ-साथ प्रशांत महासागर में सक्रिय ‘एल नीनो’ (El Niño) का प्रभाव सबसे प्रमुख कारण बनकर उभरा है।

तापमान की भीषणता और एल नीनो का अंतर्संबंध

भारत में इस वर्ष मार्च-अप्रैल के महीनों से ही तापमान सामान्य से कई डिग्री ऊपर बना हुआ है। उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत के कई क्षेत्रों में पारा 45 डिग्री सेल्सियस से 48 डिग्री सेल्सियस के स्तर को पार कर गया है। इस अत्यधिक ऊष्मा (Extreme Heat) का सीधा संबंध ‘एल नीनो’ परिघटना से है।
एल नीनो (El Niño) क्या है और इसका प्रभाव कैसे पड़ता है?
एल नीनो एक जटिल मौसम प्रणाली है, जो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र के सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने के कारण उत्पन्न होती है।
पारंपरिक चक्र में व्यवधान: सामान्य परिस्थितियों में, प्रशांत महासागर का गर्म जल व्यापारिक पवनों (Trade Winds) के कारण एशिया और ऑस्ट्रेलिया की ओर प्रवाहित होता है। परंतु एल नीनो के दौरान ये पवनें कमजोर हो जाती हैं, जिससे गर्म जल पूर्व की ओर यानी दक्षिण अमेरिका (पेरू के तट) की तरफ विस्थापित हो जाता है।
वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण में परिवर्तन: महासागरीय ऊष्मा के इस स्थानांतरण के कारण वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण (Walker Circulation) पूरी तरह असंतुलित हो जाता है। इसका सीधा दुष्प्रभाव भारतीय मानसून और ग्रीष्मकालीन तापमान पर पड़ता है।
जलवायु परिवर्तन और एल नीनो का घातक संयोजन (Double Whammy)
यद्यपि एल नीनो एक प्राकृतिक और आवधिक (Periodic) परिघटना है, परंतु वर्तमान में जलवायु परिवर्तन (Climate Change) ने इसकी तीव्रता और आवृत्ति को कई गुना बढ़ा दिया है। इसे वैज्ञानिक भाषा में “सम्बर्धित एल नीनो प्रभाव” कहा जा सकता है।
1. ऊष्मा का संचय: मानवीय गतिविधियों (जैसे जीवाश्म ईंधनों का दहन और तीव्र औद्योगीकरण) के कारण उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसें वैश्विक तापमान को निरंतर बढ़ा रही हैं। जब यह पहले से गर्म वातावरण एल नीनो के प्रभावों के साथ मिलता है, तो तापमान में अप्रत्याशित उछाल आता है।
2. कमजोर और अनिश्चित मानसून: एल नीनो के सक्रिय होने से भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर उच्च वायुदाब का क्षेत्र बनने लगता है, जो दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाओं को कमजोर करता है। मानसून के आगमन में देरी या उसकी विफलता के कारण भूमि की नमी समाप्त हो जाती है, जिससे शुष्कता बढ़ती है और ग्रीष्म लहर (Heatwaves) की अवधि लंबी हो जाती है।
3. स्थानीय स्तर पर प्रभाव: भारत के गंगा के मैदानी भाग, मध्य उच्च भूमि और प्रायद्वीपीय पठार इस दोहरी मार के कारण भीषण सूखे और ‘हीट डोम’ (Heat Dome) जैसी स्थितियों का सामना कर रहे हैं, जहाँ गर्म हवाएं एक ही स्थान पर संचित होकर तापमान को लगातार बढ़ाती रहती हैं।

3-4 वर्षों में भारत की जलवायु स्थिति

वर्तमान संकट अचानक उत्पन्न नहीं हुआ है, बल्कि यह पिछले कुछ वर्षों से लगातार संचित हो रहे जलवायु असंतुलन का परिणाम है। यदि हम पिछले 3-4 वर्षों के आंकड़ों और मौसमी घटनाओं पर दृष्टि डालें, तो भारत में जलवायु परिवर्तन का पैटर्न अत्यंत आक्रामक, अप्रत्याशित और अनिश्चित रहा है:
वर्ष 2022 (असमय तीव्र गर्मी): इस वर्ष भारत ने पिछले 122 वर्षों में सबसे गर्म मार्च का महीना दर्ज किया था। मार्च के मध्य से ही देश का एक बड़ा हिस्सा भीषण लू की चपेट में आ गया था, जिसने गेहूं की खड़ी फसलों को भारी नुकसान पहुँचाया और भारत के कृषि निर्यात को प्रभावित किया।
वर्ष 2023 (रिकॉर्ड-तोड़ वैश्विक ऊष्मा और चक्रवात): वर्ष 2023 को वैश्विक स्तर पर इतिहास का सबसे गर्म वर्ष दर्ज किया गया। भारत में मानसून की अनिश्चितता चरम पर थी; जहाँ एक ओर अगस्त का महीना दशकों में सबसे सूखा रहा, वहीं दूसरी ओर जुलाई में उत्तर भारत (विशेषकर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड) में बादल फटने और अप्रत्याशित बाढ़ (Flash Floods) ने तबाही मचाई। इसी वर्ष चक्रवात ‘बिपर्जॉय’ ने अरब सागर में लंबे समय तक बने रहकर मौसम विज्ञानियों को चौंका दिया था।
वर्ष 2024 (अल नीनो का चरम प्रभाव): वर्ष 2024 की शुरुआत से ही अल नीनो का प्रभाव चरम पर था। देश के कई हिस्सों, विशेषकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) और पूर्वी भारत में पारा 49-50 डिग्री सेल्सियस के ऐतिहासिक स्तर को छू गया था। सर्दियों के मौसम का छोटा होना और पहाड़ों पर कम बर्फबारी होना इस वर्ष की मुख्य चिंता रही।
वर्ष 2025 (चरम मौसमी घटनाओं की बारंबारता): पिछले वर्ष भारत ने ‘कंपाउंडिंग क्राइसिस’ (मिश्रित संकट) का सामना किया, जहाँ एक ही समय में देश के कुछ हिस्से (जैसे असम और केरल) बाढ़ से जलमग्न थे, तो दूसरी ओर मध्य और पश्चिमी भारत सूखे तथा जल स्रोतों के सूखने की मार झेल रहा था।
मौसमी चक्र का पूर्ण विचलन: मरुस्थल में अतिवृष्टि और हिमालय में भूस्खलन
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने न केवल तापमान में वृद्धि देखी है, बल्कि मौसम के पारंपरिक भूगोल में भी एक खतरनाक उलटफेर (Climate Inversion) देखा है। प्रकृति का स्थापित संतुलन इस प्रकार बिगड़ रहा है कि जहाँ पानी की प्रचुरता थी वहाँ सूखा पड़ रहा है, और जो क्षेत्र अपनी शुष्कता के लिए जाने जाते थे, वे बाढ़ से त्रस्त हैं।
1. शुष्क क्षेत्रों का ‘अति-आर्द्र’ होना (राजस्थान में अप्रत्याशित वर्षा): जलवायु परिवर्तन के कारण भारत के मानसून प्रतिरूप (Monsoon Pattern) में व्यापक बदलाव आया है। पिछले समय में यह देखा गया कि थार मरुस्थल और राजस्थान के वे शुष्क जिले, जहाँ ऐतिहासिक रूप से न्यूनतम वर्षा होती थी, वहाँ सामान्य से कई गुना अधिक वर्षा दर्ज की गई।
कारण और प्रभाव: अरब सागर के गर्म होने के कारण वहाँ से उठने वाले चक्रवात और मानसूनी हवाएं अब भारत के पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में अधिक नमी लेकर पहुँच रही हैं। इसके परिणामस्वरूप राजस्थान के कई हिस्सों में बाढ़ जैसी अभूतपूर्व स्थितियां उत्पन्न हुईं, जिससे वहाँ का स्थानीय जनजीवन, कृषि और पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह प्रभावित हुआ।
2. नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का क्षरण (वृहत स्तर पर भूस्खलन): इसके विपरीत, भारत का मस्तक कहा जाने वाला हिमालयी क्षेत्र वैश्विक तापन की सबसे संवेदनशील मार झेल रहा है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर भूस्खलन (Landslides) और हिमस्खलन की घटनाएं हुई हैं।
कारण और प्रभाव: तापमान बढ़ने के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और पहाड़ों पर ‘क्लाउड बर्स्ट’ (बादल फटने) तथा ‘शॉर्ट-ड्यूरेशन हाई-इंटेंसिटी रेनफॉल’ (कम समय में अत्यधिक तीव्र वर्षा) की घटनाएं बढ़ी हैं। जब यह अत्यधिक जल पहाड़ों की नाजुक मिट्टी और चट्टानों पर गिरता है, तो वे अपनी पकड़ खो देते हैं। मानवीय हस्तक्षेप (अवैज्ञानिक निर्माण, सड़कों का चौड़ीकरण और वनों की कटाई) ने इस संकट को और अधिक संवेदनशील बना दिया है, जिससे न केवल अमूल्य मानव जीवन की हानि हो रही है बल्कि संपूर्ण पर्वतीय अवसंरचना ध्वस्त हो रही है।

पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन को रोकना क्यों अनिवार्य है?

अक्सर यह समझा जाता है कि जलवायु परिवर्तन केवल वैज्ञानिकों या नीति-निर्माताओं की बहस का विषय है, परंतु वास्तव में पर्यावरण का संरक्षण हमारे अस्तित्व, अर्थव्यवस्था और सभ्यता की निरंतरता के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुका है। इसके निम्नलिखित मुख्य कारण हैं:
1. मानव स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा: बढ़ता तापमान सीधे तौर पर मानव जीवन के लिए खतरा है। ‘वेट-बल्ब तापमान’ (Wet-Bulb Temperature) का बढ़ना, जहाँ अत्यधिक आर्द्रता और गर्मी के कारण मानव शरीर अपना तापमान नियंत्रित नहीं कर पाता, जानलेवा साबित हो रहा है। इसके अतिरिक्त, पर्यावरण क्षरण से वायु प्रदूषण, शुद्ध पेयजल की कमी और संक्रामक व नए वेक्टर-जनित रोगों (जैसे डेंगू, मलेरिया और अज्ञात वायरस) का प्रसार तेजी से बढ़ रहा है।
2. आर्थिक स्थिरता और खाद्य सुरक्षा: भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ की आधी से अधिक आबादी आज भी आजीविका के लिए मानसून और प्रकृति पर निर्भर है। जलवायु परिवर्तन के कारण फसलों का नष्ट होना, समुद्र का जलस्तर बढ़ने से तटीय शहरों (जैसे मुंबई, कोलकाता, चेन्नई) का डूबना और बुनियादी ढांचे का विनाश भारत की जीडीपी (GDP) को भारी क्षति पहुँचा सकता है। पर्यावरण संरक्षण वास्तव में हमारी आर्थिक रीढ़ को सुरक्षित रखना है।
3. सामाजिक न्याय और विस्थापन (Climate Refugees): जलवायु परिवर्तन की सबसे क्रूर मार समाज के सबसे गरीब और वंचित वर्ग (जैसे छोटे किसान, दैनिक मजदूर और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोग) पर पड़ती है, जिनके पास गर्मी या बाढ़ से बचने के साधन नहीं हैं। जल संकट और कृषि की विफलता के कारण बड़े पैमाने पर ग्रामीण आबादी शहरों की ओर पलायन कर रही है, जिससे ‘जलवायु शरणार्थियों’ (Climate Refugees) की एक नई सामाजिक समस्या जन्म ले रही है।
4. जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र की संप्रभुता: मनुष्य इस धरती पर अकेला नहीं है। हमारे अस्तित्व के लिए मधुमक्खियों से लेकर सूक्ष्मजीवों और विशाल वनों तक, हर एक कड़ी का जीवित रहना आवश्यक है। पर्यावरण का विनाश इस पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) को नष्ट कर रहा है, जिससे भोजन की श्रृंखला (Food Chain) टूट रही है। यदि प्रकृति समाप्त होगी, तो मनुष्य भी स्वतः समाप्त हो जाएगा।

समाधान की राह: समयबद्ध ‘जलवायु कार्यवाही’ की आवश्यकता

विश्व पर्यावरण दिवस 2026 की थीम *”जलवायु कार्यवाही” (Climate Action)* हमें इस संकट से उबरने का मार्ग दिखाती है। भारत को इस दिशा में अल्पकालिक और दीर्घकालिक रणनीतियों पर अत्यंत तीव्रता से कार्य करना होगा:
1. प्रकृति-आधारित समाधान (Nature-based Solutions): थीम के अनुरूप, हमें प्रकृति से प्रेरणा लेनी होगी। व्यापक स्तर पर वनीकरण (Afforestation), पारंपरिक जल निकायों (जैसे तालाबों और बावलियों) का पुनरुद्धार और शहरी क्षेत्रों में ‘मियावाकी’ पद्धति से वनों का विकास करना अनिवार्य है ताकि स्थानीय तापमान को नियंत्रित किया जा सके।
2. अनुकूलन और शमन रणनीतियाँ (Adaptation & Mitigation): ऊष्मा कार्य योजना (Heat Action Plans): प्रत्येक राज्य और जिला स्तर पर प्रभावी ‘हीट एक्शन प्लान’ को लागू किया जाना चाहिए, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर पेयजल, शेल्टर और चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित हो।
जलवायु-अनुकूल कृषि (Climate-resilient Agriculture): किसानों को कम पानी और अधिक तापमान सहने में सक्षम फसलों (जैसे मोटे अनाज या श्रीअन्न/Millets) की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
पर्वतीय क्षेत्रों का संधारणीय विकास: हिमालयी क्षेत्रों में किसी भी बड़े निर्माण कार्य से पूर्व वहाँ की पारिस्थितिक वहन क्षमता (Carrying Capacity) का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाना अनिवार्य होना चाहिए।
3. नवीकरणीय ऊर्जा और ‘लाइफ’ (LiFE) मिशन: जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करते हुए सौर और पवन ऊर्जा के लक्ष्यों को तीव्र गति से प्राप्त करना होगा। इसके साथ ही, भारत सरकार द्वारा प्रतिपादित ‘मिशन लाइफ’ (Lifestyle for Environment) के अंतर्गत व्यक्तिगत स्तर पर संधारणीय (Sustainable) जीवनशैली को अपनाना होगा।

निष्कर्ष

भारत में वर्तमान में महसूस की जा रही अत्यधिक गर्मी, एल नीनो का प्रकोप, मरुस्थल में बाढ़ और हिमालय का दरकना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि प्रकृति का संतुलन पूरी तरह डगमगा चुका है। विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और तात्कालिक धरातलीय सुधार का आह्वान है। यदि हम आज “प्रकृति से प्रेरित” होकर ठोस “जलवायु कार्यवाहियों” को लागू नहीं करते, तो “हमारे भविष्य” को सुरक्षित रख पाना असंभव होगा। समय आ गया है कि नीतियां केवल फाइलों तक सीमित न रहकर जन-आंदोलन का रूप लें, क्योंकि पर्यावरण का संरक्षण अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारे जीवित रहने की एकमात्र शर्त है।

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