नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। न्यू मैक्सिको विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक नया टीका विकसित किया है जो अल्ज़ाइमर के असली कारण—मस्तिष्क कोशिकाओं के अंदर मौजूद विषैले टाउ प्रोटीन—को लक्षित करता है। केवल लक्षणों को नियंत्रित करने वाले उपचारों के विपरीत, यह टीका प्रतिरक्षा प्रणाली को उन हानिकारक प्रोटीनों पर हमला करने और उन्हें नष्ट करने के लिए प्रशिक्षित करता है। पशु परीक्षणों में, इसने न केवल इसके निर्माण को कम किया, बल्कि मस्तिष्क कोशिकाओं को क्षति से बचाने में भी मदद की। टीम अब मानव परीक्षणों की तैयारी कर रही है। लॉन्गिट्यूडिनल एजिंग स्टडी ऑफ इंडिया के आंकड़ों की मानें तो भारत में लगभग 8.8 मिलियन लोग अल्जाइमर से पीड़ित हैं और भविष्य में इन आंकड़ों में बढ़ोतरी हो सकती है जबकि विश्व में करीब 55 मिलियन लोग इस बीमारी की चपेट में हैं।
अल्ज़ाइमर : मस्तिष्क-केंद्रित स्थिति
दशकों से, अल्ज़ाइमर रोग को विषाक्त बीटा-एमिलॉइड प्लेक के जमाव के कारण होने वाली एक मस्तिष्क-केंद्रित स्थिति माना जाता था। लेकिन टोरंटो विश्वविद्यालय के डॉ. डोनाल्ड वीवर का नया शोध एक क्रांतिकारी बदलाव का प्रस्ताव करता है कि अल्ज़ाइमर वास्तव में एक स्व-प्रतिरक्षी विकार हो सकता है, जहाँ मस्तिष्क की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से खुद पर ही हमला कर देती है। इस उभरते सिद्धांत के अनुसार बीटा-एमिलॉइड कोई असामान्य अपशिष्ट उत्पाद नहीं है—यह एक प्राकृतिक प्रतिरक्षा अणु है जो मस्तिष्क को रोगजनकों या चोट से बचाने के लिए बनाया गया है। तो यह गलत कैसे होता है? सूक्ष्मजीवों और न्यूरॉन्स के बीच संरचनात्मक समानताओं के कारण, प्रतिरक्षा प्रणाली मस्तिष्क कोशिकाओं को विदेशी आक्रमणकारियों के साथ भ्रमित कर सकती है, जिससे दीर्घकालिक आत्म-आक्रमण शुरू हो जाता है। यह अल्ज़ाइमर को एक अलग न्यूरोडीजेनेरेटिव स्थिति के रूप में नहीं, बल्कि स्व-प्रतिरक्षी रोगों के एक व्यापक वर्ग के हिस्से के रूप में पुनर्परिभाषित करता है। अगर यह सच है, तो यह प्लेक को लक्षित करने के बजाय प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं को विनियमित करके—डिमेंशिया के इलाज और रोकथाम के तरीके में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। दुनिया भर में प्रभावित लाखों लोगों के लिए इसके निहितार्थ बहुत बड़े हैं।
अल्ज़ाइमर: न्यूरोडीजेनेरेटिव विकार
एक्सपर्ट के मुताबिक याददाश्त खोने और डेली रूटीन की कई कामों में बाधा बनता है अल्जाइमर रोग। कुछ दवाओं को छोड़ कर अब तक इस बीमारी के लिए जरूरी टीके की खोज नहीं हो पाई है। यह रोग एक न्यूरोडीजेनेरेटिव विकार है, जो डिमेंशिया के कारण होने वाला सबसे सामान्य रूप है। एक अनुमान के मुताबिक 60 फीसद से 80 फीसद मामलों के लिए यह जिम्मेदार है। अमेरिका के बोस्टन में अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के बेसिक कार्डियोवास्कुलर साइंसेज साइंटिफिक सेशन 2023 में अल्जाइमर रोग पर शोध किया गया था। इस शोध में इससे जुड़ी सूजन वाली ब्रेन सेल्स को लक्षित कर टीके की खोज करने की कोशिश की गई। इस रिसर्च में पहले की जा चुकी स्टडी के निष्कर्ष को भी शामिल किया गया। टोक्यो के जुंटेंडो यूनिवर्सिटी ग्रेजुएट स्कूल ऑफ मेडिसिन में भी इस रोग पर अध्ययन किया गया था। यहां चूहों में उम्र से संबंधित बीमारियों से निपटने के लिए टीके विकसित किए गये थे। अब टीम ने अपना ध्यान अल्जाइमर पर केंद्रित कर दिया है।
अल्जाइमर : टीके से कई रोगों में सुधार
वहां शोधकर्ताओं ने एज सेल को खत्म करने के लिए एक टीका सेनेसीन एसोसिएटेड ग्लाइकोप्रोटीन (senescence-associated glycoprotein –SAGP) विकसित किया। इस टीके से चूहों में एथेरोस्क्लेरोसिस और टाइप 2 डायबिटीज सहित उम्र से संबंधित कई बीमारियों में सुधार देखा गया। अल्जाइमर रोग से पीड़ित लोगों की ग्लियाल कोशिकाओं में एसएजीपी अभिव्यक्ति एक उल्लेखनीय खोज बन सकती है। इसके प्रमुख अध्ययन लेखक चीह-लुन हसियाओ के अनुसार दुनिया भर में डिमेंशिया के 50 से 70 फीसद मरीज अल्जाइमर रोग से पीड़ित हैं। चूहों पर हुए अध्ययन में खोजा गया नया टीका बीमारी को रोकने या संशोधित करने के संभावित तरीके की ओर इशारा करता है। यदि टीका मनुष्यों में सफल साबित होता है, तो यह बीमारी की प्रगति को रोक सकता है। इस बीमारी की रोकथाम की दिशा में यह एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।
