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एनएमसी बिल 2017ः चोर-चोर मौसेरे भाइयों के चंगुल में देश की स्वास्थ्य शिक्षा

मेडिकल कॉउंसिल ऑफ इंडिया

एनएमसी बिल-2017: राह नहीं आसान

आशुतोष कुमार सिंह

यह सप्ताह स्वास्थ्य के लिहाज से बहुत ही महत्वपूर्ण रहा। मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से मर रहे बच्चों से संदर्भित अपना हलफनामा बिहार एवं केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया। बिहार सरकार ने कहा कि उसके पास सृजित चिकित्सकीय पदों में से 57 फीसद पद खाली हैं, दूसरी तरफ केन्द्र सरकार ने कहा कि वो राज्य सरकार को हर संभव मदद पहुंचा रही है। डॉक्टरों की कमी के कारण मर रहे नौनिहालों की जब बात हो रही है तो इसके मूल जड़ में जो भ्रष्टाचार काम कर रहा है और जो गंगोत्री बह रही है उसकी चर्चा करना जरूरी है। ताकि देश समझ सके कि किस तरह उनके नौनिहाल मर रहे हैं और देश के नेता पार्टी का चंदा इकट्ठा करने के लिए माफियाओं के हाथ में मेडिकल शिक्षा को गिरवी रख रहे हैं।

भ्रष्ट एमसीआइ बहुत मजबूत है

अगर देश में हो रही मौतों के कारणों का पता लगाए तो एक सबसे बड़ा कारण है  एमसीआइ! यानी भ्रष्ट एमसीआइ। एक बड़ा दानव! देश में डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने की जिम्मेदारी इसी पर रही है। लेकिन यह संस्था केतन देसाई जैसे बड़े भ्रष्टाचारियों की चाटुकारिता में लिप्त रही और बहुत हद तक आज भी है।

आज भी केतन देसाई जैसे मेडिकल माफियाओं के तार भारतीय राजनीति के शीर्ष सफेदपोशों तक जुड़े हुए हैं। यह बात मैं नहीं कह रहा हूं। यह सार्वजनिक डोमेन में है। चारो ओर यह चर्चा है कि किस तरह केतन देसाई को एनडीए एवं यूपीए सरकार में मदद मिलती रही है। कहा तो यहां तक जाता है कि जिन दिनों संयुक्त मोर्चा की सरकार थी, उन दिनों तत्कालिन प्रधानमंत्री को अपने नजदीकी को एक मेडिकल कॉलेज का एक्रीडिएशन दिलाने के लिए केतन देसाई के अहमदाबाद स्थित घर पर खुद जाना पड़ा था।

यह ग्रुप इतना ताकतवर है कि मोदी-1 में डॉ. हर्षवर्धन को स्वास्थ्य मंत्री से हटवाने में सक्रिय भूमिका निभाई। माना जाता है कि डॉ. हर्षवर्धन एमसीआइ के भ्रष्टाचार को पोलियो की तरह समाप्त करना चाहते थे। और इसके लिए उन्होंने कई बार आवाज भी उठाई थी। अब जब एक बार फिर डॉ. हर्षवर्धन स्वास्थ्य मंत्री बने हैं तो यह लॉबी सक्रिय है। हालांकि डॉक्टर हर्षवर्धन एनएमसी बिल को लेकर बहुत ही सकारात्मक दिख रहे हैं। उनका कहना है कि यह बिल इस सत्र में नहीं तो अगले सत्र में संसद के पटल पर सरकार लेकर आएगी। जिससे एमसीआई का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो सके।

एमसीआइ का वेंटिलेटर क्यों बने हैं नेता

जिस संस्था का दशको पहले अंतिम संस्कार कर देना चाहिए था, वह वेंटिलेटर के माध्यम से आज तक जीवित है। और इस वेंटिलेटर के ऑक्सिजन देने वाले कोई और नहीं बल्कि आपके-हमारे बीच के सफेदपोश हैं। यह बात मेरी अपनी नहीं है। 4 जुलाई, 2019 को राज्यसभा में पेश हुए एवं पास हुए इंडियन मेडिकल कॉउंसिल अमेंडमेंट बिल-2019 की बहस को देख लीजिए। आपको दूध का दूध और पानी का पानी समझ में आ जाएगा। दरअसल हम भारतीयों को संसदीय कार्यवाहियों को देखने की फूर्सत नहीं मिलती है। हम तो बस क्रिकेट, क्राइम और कॉमर्स में इस कदर डूब गए हैं कि देश के हित में अथवा अहित में क्या हो रहा है, इस पर हमारी नज़र ही नहीं पड़ती है।

राज्यसभा में खुली एमसीआइ की पोल

4 जुलाई, 2019 दोपहर 3 बजे के आस-पास उपसभापति हरिवंश जी के कहने पर आइएमसी अमेंडमेंट बिल-2019 को केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने पेश किया। सबसे पहले समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रो.रामगोपाल इस बिल पर बोले। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि, ‘मुझसे कहा गया कि एमसीआइ मामले में संसद-पटल पर कोई रिपोर्ट रखा ही नहीं जा सकता है! इसके पूर्व रखा ही नहीं गया है। मुझे बताया गया था कि एमसीआइ की पैठ बीजेपी, कांग्रेस, बीएसपी के साथ-साथ मेरी अपनी पार्टी एसपी में भी है। इसे मैं मानता भी हूं। उन्होंने कहा कि उन्हें हेल्थ कमेटि के चेयरमैन के नाते मैंने अपनी रिपोर्ट तय समय में दी। इसको लेकर मुझे बहुत कुछ झेलना पड़ा लेकिन मैंने किसी की परवाह नहीं की और यह रिपोर्ट संसद पटल पर रख दी। देशहित में हम उस रिपोर्ट को लाने का फैसला किए। जिसे बाद में पीएमओ के रास्ते इसे नीति आयोग भेज दिया गया। और नीति आयोग ने भी एमसीआइ को भंग करने की सिफारिश कर दी।

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जयराम रमेश ने बिल नहीं पास कने को लेकर सरकार को घेरा

प्रो. रामगोपाल की बात को आगे बढाते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा कि 1990 के दौर से भारत में दो ऐसी संस्थाएं हैं जिनको लेकर सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा है। एक है एमसीआइ और दूसरी है बीसीसीआई। उन्होंने कहा कि एनएमसी बिल अभी तक तो पास हो जाना चाहिए था। लेकिन नहीं हुआ क्योंकि सरकार के फैसलों को एमसीआइ प्रभावित करने में सफल रही है। उन्होंने कहा कि 29 दिसंबर 2017 को एनएमसी बिल लोकसभा में रखा गया।  और डॉक्टरों के दबाव में उसे स्टैंडिंग कमेटि को भेजने का निर्णय लिया गया। जबकि स्टैंडिंग कमेंटी में भेजने के लिए सरकार पर विपक्ष की ओर से कोई दबाव नहीं था। 4 जनवरी को इस मामले को स्टैंडिंग कमेटी को भेजा गया और 20 मार्च,2018 को स्टैंडिंग कमेटी ने अपनी रिपोर्ट भी दे दी। 28 अप्रैल को कैबिनेट की मंजूरी भी मिल गई। बावजूद इसके सरकार इस बिल को अभी तक क्यों नहीं लेकर आई।

वहीं दूसरी तरफ महाराष्ट्र से बीजेपी के सांसद डॉ. विकास महात्मे ने आइइएमसी (अमेंडमेंट) बिल पर कहा कि एमसीआइ का भ्रष्टाचार इस कदर बढ गया था कि वो सिर्फ और सिर्फ निजी मेडिकल कॉलेजों के पक्ष में काम कर रही थी। 100 वर्ष पुराने सरकारी कॉलेज जहां पर हजारों की संख्या में मरीज आते हैं, वहां पर मेडिकल सीट न बढ़ाकर निजी मेडिकल कॉलेजों का सिट बढ़ाती रही, जहां पर ओपीडी मरीजों की संख्या कम थी। उन्होंने इस भ्रष्टाचार की पोल खोलते हुए आगे कहा कि मेडिकल कॉलेजों को पोलिटिकल फंडिंग का बेहतर साधन के रूप में उपयोग किया गया। पार्टी लाइन देखकर पार्टी कार्यकर्ता को मेडिकल कॉलेज खोलने की अनुमति मिली। अगर कोई एमसीआइ अधिकारी इसका विरोध करता तो अगले साल वह एमसीआइ का सदस्य नहीं बना रह सकता था। इतना ही नहीं एमसीआइ ने निजी कॉलेजों को आगे बढाने के लिए सर्जरी एवं पोर्स्टमाटम की शिक्षा देना उचित नहीं समझा। इन कॉलेजों से जो डॉक्टर निकले उन्होंने कभी पोर्स्माटम किया ही नहीं। फिर वे बाहर निकलकर बेहतर सेवा कैसे दे सकते थे? इतना ही नहीं अनइथिकल प्रैक्टिस के लिए 2010 के पहले महज 8-10 चिकित्सकों को एमसीआइ की ओर सो दोषी ठहराया गया जबकि 2012 में यह संख्या 124 पर पहुंची। 8 लाख डॉक्टरों में क्या इतने ही लोगों ने अनइथिकल प्रैक्टिस की। निश्चित रूप से राज्यसभा सांसद डॉक्टर विकास ने जो सवाल उठाए, या प्रो. रामगोपाल या जयराम रमेश जो कह रहे हैं उसकी गहराइयों में जाया जाए तो समझ में आएगा कि किस तरह से एमसीआइ-राजनीतिक दल एवं मेडिकल कॉलेजों के बीच में एक आर्थिक लाइन जुड़ती है और देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ करती है।

आइएमसी (अमेंडमेंट ) बिल -2019 की क्यों पड़ी जरूरत

लोकसभा एवं राज्यसभा में आइएमसी (अमेंडमेंट) बिल-2019 ध्वनि मत से पास कर दिया गया है। अब सितंबर 2020 तक एमसीआई की शक्तियां निरस्त रहेंगी। इस दौरान सरकार नेशनल मेडिकल कॉउंसिल बिल को पास कराएगी। जिसके बाद एमसीआइ जैसी भ्रष्ट संस्था से देश के स्वास्थ्य शिक्षा को छुटकारा मिल जाएगा। इस बावत स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन का कहना है कि यह सर्वविदित है सत्य है कि एमसीआइ भ्रष्टाचार का गढ़ बन चुका था। उन्होंने कहा कि बोर्ड ऑफ गवर्नस अच्छा काम कर रहा है और इसमें अच्छे डॉक्टर इंटरेस्ट दिखा रहे हैं। सरकार बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के काम में हस्तक्षेप नहीं कर रही है लेकिन उनके कामों को सूक्ष्मतापूर्क ऑबजर्व जरूर करती है। बीओजी के कार्यों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि 2018-19 में जहां 19 नए मेडिकल कॉलेज सैंक्शन किए गए वहीं 2019-20 में इनकी संख्या 27 है। पीजी मेडिकल कोर्स में सीटों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। 2018-19 में 33422 से बढ़कर इस वर्ष इसकी संख्या 35327 हो गई है। भ्रष्टचार के मामलों में व्यवस्था से 59 लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि 12 जून 2019 को इंडियन मेडिकल अमेंडमेंट बिल 2019 को मंत्रीमंडल की मंजूरी मिली थी जो कि एमसीआइ की शक्तियों को 2 वर्षों तक सुपरसिड करेगा। 26 सितंबर, 2018 से यह अवधि शुरू होकर 26 सिंतबंर 2020 तक बोर्ड ऑफ गवर्नस इसे चलाएगी। नए संसोधन में अब इस बोर्ड में 7 की जगह 12 सदस्य होंगे।

गौरतलब है कि 6 दशक पहले भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम,1956 के अंतर्गत मेडिकल कॉउंसिल ऑफ इंडिया का गठन किया गया था। इसके ऊपर देश की चिकित्सा सेवा एवं व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय मानको के अनुरूप रखने की जिम्मेदारी थी। लेकिन कालांतर में यह संस्था भ्रष्टाचार के गिरफ्त में आ गई और मेडिकल कॉलेजों से ऐसे लोग पास होकर निकलने लगे, जिनकी चिकित्सकीय योग्यता कटघरे में रही। हद तो उस समय हुई जब इस संस्था का अध्यक्ष एक मेडिकल कॉलेज को मान्यता देने के बदले घुस लेने के आरोप में सीबीआई के हाथों पकड़ा गया। 23 अप्रैल, 2010 का वह दिन एमसीआइ के इतिहास का काला दिन साबित हुआ। उस दिन अध्यक्ष केतन देसाई के संग-संग एमसीआइ का ही एक पदाधिकारी जेपी सिंह एवं उक्त मेडिकल कॉलेज का प्रबंधक भी गिरफ्तरा हुआ। एमसीआइ भ्रष्टाचार की कहानियां मीडिया में खूब सूर्खियों में रही। दूसरी ओर देश के कोने-कोने से एमसीआइ को भंग करने की मांग की जाने लगी। आगे चलकर एमसीआइ को भंग करना पड़ा। और आज यह कहानी आइएमसी अधिनियम-1956 की जगह एनएमसी बिल,2017 के रूप में अपने अंतिम निष्कर्ष की ओर है।

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