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गांधीजी की वैचारिक हत्या

बापू की पुण्यतिथि पर विचारोत्तेजक और मनन योग्य आलेख
धीप्रज्ञ द्विवेदी

गांधी जी को श्रद्धांजलि, सादर नमन। गांधीजी की शारीरिक हत्या तो नाथूराम ने की थी जिसके लिए उससे अगर 50 बार फांसी पर चढ़ाया जाए तो कम होगा।
लेकिन गांधी जी के विचारों की हत्या किसने की?
गांधी जी के विचारों की हत्या का प्रारंभ 1930 के दशक में हो चुका था जब उन्हें मजबूरी में अपने आप को और अपने विचारों को बचाने के लिए कांग्रेस से इस्तीफा देना पड़ा और अपने प्रिय साबरमती आश्रम को विसर्जित करना पड़ा। इसके बाद जब उन्होंने वर्धा एजुकेशन प्लान को जनता के सामने रखा तो बड़े पैमाने पर कांग्रेस में उसका विरोध हुआ और उसके अग्रदूत थे डॉक्टर जाकिर हुसैन जो आगे चलकर भारत के राष्ट्रपति बने। और उस विरोध के बारे में गांधीजी ने कहा कि यह लोग जिस अमेरिकी विचारक के कॉपी करने के आधार पर मेरा विरोध कर रहे हैं मैं तो उनको जानता भी नहीं हूं। कांग्रेस ने जाकिर हुसैन जी को वर्धा एजुकेशन कमेटी का चेयरमैन बनाया और जाकिर हुसैन साहब ने भारत में दो महत्वपूर्ण संस्थाओं की नींव रखी। एक जामिया मिलिया इस्लामिया और दूसरा डीपीएस दिल्ली पब्लिक स्कूल।
वैसे जामिया मिलिया इस्लामिया को लेकर एक महत्वपूर्ण बात यह है इसके संस्थापकों में 3 नाम आता है जिसमें एक व्यक्ति मुस्लिम लीग के संस्थापक थे, दूसरे जाकिर हुसैन और तीसरे महात्मा गांधी। आजादी के समय महात्मा गांधी के विचारों को आधार बनाकर उड़ीसा में एक विद्यालय चल रहा था जिसे आजादी के ठीक बाद केंद्र सरकार के आदेश के अनुसार बंद कर दिया गया और इस प्रकार महात्मा गांधी के शिक्षा संबंधी विचारों की हत्या हुई।
महात्मा गांधी के शिक्षा संबंधी विचारों की हत्या के बाद उनके स्वास्थ्य, उद्योग संबंधी विचारों और साथ ही साथ पर्यावरण संबंधी विचारों की हत्या आजादी के समय तक हो चुकी थी।
आजादी के बाद नेहरू जी ने भारत में जो आर्थिक व्यवस्था लागू की, गांधीजी उसके सख्त विरोधी थे। गांधीजी का यह मानना था कि यह पूरी व्यवस्था प्रकृति, पर्यावरण और पृथ्वी, तीनों के विरुद्ध है। उन्होंने लगातार प्रकृति आधारित विकास का समर्थन किया जो भारतीय व्यवस्था के अनुरूप थे। उनका यह मानना था कि भारतीय समाज मुख्य रूप से औद्योगिक समाज है, कृषि आधारित समाज नहीं है अर्थात भारतीय समाज में हर व्यक्ति अपना उद्योग करने में सक्षम है और वह चाहते थे कि मुस्लिम शासन और ब्रिटिश शासन के दौरान लोगों से जो औद्योगिक एप्टिट्यूड समाप्त कर दिया गया था, उसे वापस स्थापित किया जाए और इसके लिए उन्होंने स्किल डेवलपमेंट की बात की थी। जबकि नेहरू जी की आर्थिक व्यवस्था में स्किल्ड पर्सन के लिए कोई जगह नहीं थी। विजय स्क्रीन प्रसन्न होगा, वह मजदूर नहीं बनेगा और आजादी के बाद लागू की गई आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह से मजदूर आधारित व्यवस्था थी।
ठीक है, ऐसे ही गांधी जी की स्वास्थ्य को लेकर अपने विचार और वह विचार आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के बिल्कुल उलट है। उनका यह मानना था कि प्राकृतिक चिकित्सा को प्राथमिकता देनी चाहिए और जहां तक सभी चिकित्सा की बात है, आधुनिक चिकित्सा की बात है तो उसके उपयोग को सीमित करना चाहिए क्योंकि उसके माध्यम से आप अपने शरीर में बहुत सारे बाहरी रसायन लेते हैं जो स्वास्थ्य और प्रकृति दोनों के लिहाज से उचित नहीं है और इसी के लिए उन्होंने खुद पर प्रयोग करके प्राकृतिक चिकित्सा पुस्तक भी लिखी। लेकिन आजादी के बाद उनके इन विचारों को भी महत्व नहीं दिया गया। हम देखते हैं कि उनके स्वास्थ्य संबंधी विचारों की भी हत्या कर दी गई।
अगर हम थोड़ा और व्यापक संदर्भ में देखें तो हम पाते हैं कि गांधीजी की शारीरिक हत्या तो नाथूराम ने 30 जनवरी 1948 को तत्कालीन बिरला हाउस में प्रार्थना के दौरान कर दी थी लेकिन उनका नाम लेकर आगे बढ़ने वाले लोगों ने उनके विचारों की लगातार हत्या की।
एक सामान्य सी बात है कि भारतीय समाज एक ऐसा समाज है जहां पर विचारों में विभिन्नता को पर्याप्त स्थान दिया जाता रहा है और साथ ही हम हमेशा यह मानते हैं कि इस संसार में कोई व्यक्ति आलोचना से परे नहीं है। हमारे यहां तो भगवान श्री राम भगवान, श्री कृष्ण जैसे महापुरुषों की आलोचना भी होती है और उस आलोचना को सामाजिक रूप से स्थान मिलता है और इसके असंख्य उदाहरण है। कोई आवश्यक नहीं है कि हर व्यक्ति गांधीजी के हर विचार से सहमत हों। गांधीजी भी मानव ही थे तो हमें उनके विषय में विचार करते समय इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि उस समय की तत्कालीन परिस्थितियां क्या थी। उस समय की स्थितियां क्या थी और उन स्थितियों में उनके द्वारा उठाए गए कदम क्या रहे और उसके दूर दीर्घकालीन परिणाम क्या रहे।
गांधी जी की हत्या एक रूप में और हुई कि उनके व्यक्तित्व के अन्य सभी पहलुओं को दबा दिया गया और केवल अहिंसा शब्द को ही उनके साथ जोड़ कर रख दिया गया। सत्य भी नहीं। क्यों न केवल अहिंसा कहने के लिए हम कहते हैं कि सत्य और अहिंसा लेकिन गांधीजी का जो व्यक्तित्व है और उनके जो काम है, वह केवल सत्य और अहिंसा तक ही सीमित नहीं है। उसके बाद भी है और सत्य और अहिंसा को लेकर अगर हम गांधीजी के खुद के विचारों का अध्ययन करें, उनकी पुस्तकों का, उनकी आत्मकथा का और उनके समय के बाकी डाक्यूमेंट्स का अध्ययन करें तो आप पाते हैं कि गांधीजी अहिंसा को एक सीमा तक ही महत्व देते थे। एक बहुत महत्वपूर्ण चीज हैं कि बात जब देश की आती हो तो समय गांधी जी के लिए अहिंसा महत्व नहीं रखती थी और एक बहुत बड़ा उदाहरण है गांधी जी ने बोअर युद्ध के समय अंग्रेजों की सेना में शामिल होकर अंग्रेजों की सहायता की थी और उन्हें इसके लिए आर्डर ऑफ मेरिट मिला लेकिन गांधीजी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि उन्हें डच किसानों के विरुद्ध अंग्रेजी सेना की सहायता का मलाल था क्योंकि डच किसान अपने स्थान पर सही थे। इसके बाद भी उन्होंने अंग्रेजी सेना की सहायता की क्योंकि वह अंग्रेज राज में रहते थे। और यह विचार इतना महत्वपूर्ण है कि आप जिस देश में रहते हैं, जिस भूमि पर रहते हैं, उस भूमि की सुरक्षा आपका पहला दायित्व है, लेकिन गांधीजी को मानने वाले और गांधी का नाम लेने वाले लोगों ने गांधी जी के इस विचार की भी बारंबार हत्या की।
आज भारत की आलोचना करने वाले लोग अपने आप को गांधी जी का मानस पुत्र मानते हैं। उनकी वास्तविकता यह है कि महात्मा गांधी ने कभी भी मातृभूमि की आलोचना को प्रश्रय नहीं दिया बल्कि हर मौके पर उसका विरोध किया है।
महात्मा गांधी के बारे में लिखने के लिए और भी बातें हैं लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि हम महात्मा गांधी को केवल दो शब्दों-सत्य और अहिंसा में नाबाद हैं, बल्कि उनके विचार, उनके लेखन में शामिल अन्य विषयों पर भी अपना ध्यान केंद्रित करें और देखें कि हमारे समाज के विकास में वह चीजें किस तरह से सहयोगी हो सकती हैं।

(लेखक पर्यावरण विज्ञान में स्नातकोत्तर और नेट क्वालिफाइड हैं। पर्यावरण पर लेखन, पठन और पाठन करते हैं। ये सभ्यता संवाद नामक शोध पत्रिका के कार्यकारी संपादक हैं और स्वास्थ्य विषयक जागरूकता फैलाने वाली संस्था स्वस्थ भारत न्यास के संस्थापक न्यासी हैं।)

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