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काशिफ….तुम जिंदा हो!

स्मृतिशेष

तुम्हारे मुस्कुराते चेहरे को भूला नहीं पा रहा हूं। तुम्हारे मुंह से निकले ‘आशुतोष जी’ शब्द सुनने को मन तरस रहा है। तुम्हारे चुलबुलापन, फक्कड़पन एवं बिंदासपन को कैसे भूला दूं! राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण परिवार का हिस्सा बने वैसे तो बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ था, लेकिन इस परिवार के सबसे चहेता तुम थे।
तुम्हारे साथ गुजारे गए एक-एक पल सामने गुजर रहे हैं। तुम्हें किस रूप में याद करूं, समझ से परे है। तुम्हारी बेबाकी का तो मैं कायल था ही, तुम्हारे काम के बारे में मैंने पिछले हफ्ते ही कहा था कि ओगिल्वी के क्रिएटिव टीम की कमी को तुमने लगभग पूरा कर दिया है।
तुमसे कई बार मीठी झड़प हुई लेकिन तुम्हारे तर्कों के आगे एक शब्द बोलने का मन नहीं हुआ। कई बार तुम्हें जब काम करने का मन नहीं होता था तब किस तरह तुम हौले से आकर कहते थे-आशुतोष जी, इसे मैं घर से जाकर कर दूंगा…मैं भी समझ जाता था अभी तुम्हारा मन थोड़ा कम क्रिएटिव है।
एक जीवंत व्यक्तित्व के उदाहरण थे मेरे भाई। तुम्हारे जीवन में, परिवार में एवं सेहत को लेकर तमाम झंझावातों के बीच तुम कभी किसी को यह जाहिर नहीं होने देते थे कि तुम अंदर से कितने द्वंदों से गुजर रहे हो। जीवन के तमाम द्वंदों को खुद से ही हल कर लेने की तुम्हारी जीजिवीषा को देखकर मैं नतमस्तक था।
कल जब आइसी ग्रुप में यह सूचना मिली कि तुम नहीं रहे…इस वाक्य के ‘नहीं’ वाले शब्द पर विश्वास कर पाना मुश्किल था, और अभी भी मुश्किल ही है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं लग रहा है कि तुम अब हमारे बीच नहीं’ हो। तुम्हारी हंसी, तुम्हारे एहसास, तुम्हारे मजाक सब के सब चीख-चीख कर कह रहे हैं कि तुम जिंदा हो…तुम जिंदा हो…तुम्हारी हर कलाकारी जिंदा है…हमारी यादों के संदूक में तुम्हारी हर हंसी-हर खुशी बंद है…हमने तुम्हे सहेज लिया है…तुम्हें संभाल लिया है…
काश! तुम देख पाते कि हम सब तुम्हें किस कदर चाहते थे…मुझे यह एहसास हो रहा है कि तुम जुगनुओं के माध्यम से जरूर देख रहे होगे…हम तुम्हे भूले नहीं, तुम्हारी यादों को बिखरने नहीं दिए…सबको समेट लाए हैं और एक पोटली में बांधकर अपने दिलों में सहेज लिए हैं।
कल तुम्हारे मम्मी-पापा और परिवार के अन्य सदस्यों से हम मिले थे…कितना प्यार करते हैं वो सब तुम को…इतनी जल्दी तुम्हें नहीं जाना था…
अपने जनाजे पर लेटे हुए तुमको देखकर यह लग रहा था कि तुम मजाक कर रहे हो…अब उठोगे और कहोगे कि अरे आशुतोष जी! आपलोग क्यों परेशान हुए…मैं तो बस ऑफिस आ ही रहा था…तुम्हारे चेहरे की मासूमियत को कैसे शब्द दूं…शब्द कम पड़ रहे हैं…
तुम्हारे अल्लाह से बस इसी बात की शिकायत है कि तुमको वे अपने साथ ले गए…अभी तुम्हारे साथ, तुम्हारे रंगों के साथ, तुम्हारी क्रिएटिविटी के साथ हमें तमाम ईद-बकरीद, होली-दिवाली मनानी थी…लेकिन तुम अपने अल्लाह के घर को रौशन करने चले गए।
कोई बात नहीं, लेकिन तुमसे एक दरख्वास्त है- अगले जन्म में तुम मेरे भाई के रूप में जन्म लेना…हम दोनों बचे हुए रंगों को एक साथ मिलकर दुनिया में बाटेंगे…आ जाओ….मेरे द ग्रेट कासिफ…!
सादर नमन!

आशुतोष कुमार सिंह

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