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देश में बनी MRI मशीन, दिल्ली के एम्स में लगेगी

देश में बनी MRI मशीन, दिल्ली के एम्स में लगेगी

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। भारत ने अपनी पहली स्वदेशी ‘मैग्नेटिक रेज़ोनेंस इमेजिंग'(MRI) मशीन विकसित की है। दिल्ली एम्स में यह इसी साल इसका ट्रायल शुरू हो जाएगा लेकिन अक्टूबर से इसका इस्तेमाल होने लगेगा। इस मशीन से कैंसर जैसी कई गंभीर बीमारियों की जांच सस्ती हो सकेगी। इसको लेकर एम्स और इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत आने वाला सोसायटी फॉर एप्लाइड माइक्रोवेव इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग एंड रिसर्च (समीर आरएनडी) के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हो चुका है। इससे उपचार लागत और आयातित चिकित्सा उपकरणों पर निर्भरता कम हो सकेगी।

स्वदेशी MRI : दो साल पहले भी प्रयास

जानकारी के अनुसार यह दो साल पहले तब हासिल हुआ था, जब केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने एक और स्कैनर लॉन्च किया था, जिसका दावा यही था। अगस्त 2023 में सिंह ने वॉक्सेलग्रिड्स इनोवेशन प्राइवेट लिमिटेड द्वारा विकसित 1.5 टेस्ला हाई-फील्ड एमआरआई स्कैनर लॉन्च किया जिसे हल्का, अल्ट्रा-फास्ट और सस्ता बताया गया था। कहा गया थाकि इससे आम आदमी को न केवल खर्च कम लगेगा बल्कि आयात पर निर्भरता कम होगी और विदेशी मुद्रा बचेगी। उधर वॉक्सेलग्रिड्स ने लॉन्च के समय 2023 में CDSCO की मंजूरी हासिल की और तब से अपने 1.5 टेस्ला स्कैनर की तीन इकाइयाँ बना ली। चंद्रपुर में टाटा कैंसर फाउंडेशन में एक इकाई स्थापित की गई है पर बिजली की समस्या के कारण इसकी नैदानिक शुरुआत में देरी हो रही है। एक अन्य इकाई व्हाइटफील्ड, बेंगलुरु में सत्य साईं इंस्टीट्यूट ऑफ हायर मेडिकल साइंसेज में लगाई जा रही है और तीसरी कंपनी की विनिर्माण सुविधा में बनी हुई है।

स्वदेशी MRI : एक श्रेष्ठ उपकरण

इधर दिल्ली एम्स के निदेशक डॉ. एम श्रीनिवास का कहना है कि स्वदेशी MRI मशीन का लाभ यह होगा कि हम सर्वोत्तम वैश्विक उपकरणों का उपयोग करते हुए, स्वेदशी मशीन के प्रदर्शन पर प्रतिक्रिया दे सकेंगे। इससे मशीन बनाने वाली कंपनी समीर आरएनडी और संबंधित संस्थानों को आवश्यक परिवर्तन करने में मदद मिलेगी, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि हमारे पास दुनिया के सर्वश्रेष्ठ उपकरण हैं। मालूम हो कि MRI स्कैन के लिए शक्तिशाली चुंबकों, रेडियो किरणों और कंप्यूटर का प्रयोग किया जाता है, जिसकी मदद से शरीर की जानकारी को विस्तृत तस्वीरों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। इसका उपयोग हड्डियों, मांसपेशियों, मस्तिष्क पदार्थ, जोड़ों, धमनियों और बहुत कुछ को देखने के लिए किया जा सकता है। यह सबसे कम हानिकारक परीक्षणों में से एक है और इसका उपयोग दुनिया भर के डॉक्टर सटीक निदान और उपचार योजना बनाने के लिए करते हैं।

स्वदेशी MRI : स्कैन के खतरे भी

उधर वैज्ञानिकों को पता चला है कि MRI स्कैन में इस्तेमाल होने वाली एक जहरीली धातु गैडोलिनियम इंसानी शरीर के अंदर जाकर छोटी-छोटी धातु कणों (नैनोपार्टिकल्स) का रूप ले सकती है। यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मैक्सिको के शोधकर्ताओं ने गैडोलिनियम से होने वाले स्वास्थ्य खतरों का अध्ययन करते समय यह पाया कि ऑक्सैलिक एसिड जो कई खाद्य पदार्थों में पाया जाता है, गैडोलिनियम से मिलकर शरीर में नैनोपार्टिकल्स बना सकता है। इस शोध को मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। प्रोफेसर ब्रेंट वैगनर के नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया. उनका कहना है कि ये नैनो कण शरीर के अंगों जैसे गुर्दों और फेफड़ों में गंभीर समस्याएं पैदा कर सकते हैं।

स्वदेशी MRI : हेल्थ के लिए खतरनाक

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार आगे उन्होंने कहा कि MRI कंट्रास्ट एजेंट्स से होने वाली सबसे खराब बीमारी नेफ्रोजेनिक सिस्टमिक फाइब्रोसिस है। एक ही खुराक के बाद लोग इसकी चपेट में आ गए हैं। यह आमतौर पर शरीर से बाहर निकल जाता है और ज्यादातर लोगों को कोई नुकसान नहीं होता। MRI स्कैन से पहले गैडोलीनियम आधारित कंट्रास्ट एजेंट को इंजेक्ट किया जाता है, जिससे क्लियर स्कैन बनाने में मदद मिलती है लेकिन कुछ मामलों में यह धातु शरीर में रह जाती है। यहां तक कि उन लोगों में भी, जिन्हें कोई लक्षण नहीं होते। यह धातु सालों बाद भी खून और मूत्र में पाई जा सकती है।

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