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मन की बात / Mind Matter

विधवाओं की सुध लेने की जरूरत

अरविंद जयतिलक

गत दिवस पहले भारतीय जनता पार्टी से संबद्ध मनोनीत सदस्य डॉ. नरेंद्र जाधव की यह पहल तारीफ योग्य है कि उन्होंने राज्यसभा में शून्यकाल में वृंदावन में रह रही विधवाओं की हालात पर चिंता व्यक्त करते हुए सरकार से अनुरोध किया कि वह उनकी स्थिति में सुधार के लिए आवश्यक कदम उठाए। उन्होंने सरकार को सूचित करते हुए कहा कि चूंकि अनेक विधवाएं शिक्षित नहीं हैं और साथ ही उनके पास स्थायी पते का अभाव है, लिहाजा उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है। उन्होंने कहा कि कोविड काल में इन विधवाओं के टीकाकरण की ओर किसी का ध्यान नहीं गया और उनके टीकाकरण के आंकड़े भी नहीं है। ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि सरकार द्वारा कल्याणकारी योजनाओं के जरिए उनकी सुध ली जानी चाहिए। उम्मीद किया जाना चाहिए कि सरकार माननीय संसद सदस्य की भावना का सम्मान करेगी।

सुप्रीम कोर्ट भी उठा चुका है सवाल

यह पहली बार नहीं जब विधवाओं की समस्याओं की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है। याद होगा गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय ने वृंदावन सहित देश के अन्य शहरों में रह रही विधवाओं के मसले पर सुनवाई करते हुए गंभीर टिप्पणी की थी। उसने कम उम्र की विधवाओं के आश्रमों में रहने पर चिंता जताते हुए सरकार से जानना चाहा था कि विधवा विवाह को कल्याणकारी योजनाओं का हिस्सा क्यों नहीं होना चाहिए। तब न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर व न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा था कि विधवाओं के पुनर्वास की बात तो की जाती है लेकिन उनके विवाह के बारे में कोई बात नहीं करता। सर्वोच्च अदालत ने दो टूक कहा था कि सामाजिक बंधनों से मुक्त होकर विधवाओं के पुनर्वास से पहले उनके विवाह को प्रोत्साहन देने की जरूरत है। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के सॉलिसिटर जनरल के इस आश्वासन पर कि विधवाओं के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना है और विधवा गृहों में रहने वाली महिलाओं के लिए वोकेशनल टेªनिंग की योजना है, पर नाराजगी जताते हुए कहा था कि आपकी योजनाएं सिर्फ कागजों पर दिखती हैं। जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही है। सर्वोच्च न्यायालय ने महिला सशक्तीकरण नीति 2001 की असफलता पर भी सवाल दागते हुए सरकार को ताकीद किया था कि वह महिला सशक्तीकरण की नीति में बदलाव करे। न्यायालय ने सुझाव दिया कि विधवा गृहों में रह रही महिलाओं को पास के बाल सुधार गृह और वृद्धा आश्रमों में मौका दिया जाना चाहिए।

वृंदावन के मंदिरों में आश्रय

उल्लेखनीय है कि देश में सर्वाधिक विधवाएं राधा-कृष्ण की नगरी वंृदावन में रहती हैं। उन्हें अपनी जीविकोपार्जन के लिए मंदिरों में भजन-कीर्तन करने के अलावा अन्य कई कार्य करने पड़ते हैं। ध्यान दें तो भजन-कीर्तन के एवज में उन्हें महज पांच रुपए से पचास रुपए तक मिलते हैं और वे इन पैसों से बमुश्किल अपनी जरूरतें पूरी कर पाती हैं। कई स्वयंसेवी संगठनों ने अपने सर्वेक्षण में पाया है कि विधवाऐं अपनी भूख मिटाने के लिए न सिर्फ भीख मांगती हैं बल्कि कुछ विधवाएं तो अपनी जरूरत पूरा करने के लिए कई घरों में चौका-बर्तन भी करती हैं। भरपेट भोजन न मिलने से वे एक जिंदा लाश के रूप में तब्दील होती जा रही हैं।

अधिकांश को कोई न कोई रोग

इसी का कुपरिणाम है कि उन्हें कई तरह की गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। गत वर्ष पहले फोग्सी फेडरेशन ऑफ ओब्स्टेट्रिक एंड गायनकोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया द्वारा स्वास्थ्य परीक्षण शिविर में पाया गया कि वृंदावन में वास कर रही विधवा माताओं में तकरीबन 25 प्रतिशत महिलाओं में कैल्सियम की भारी कमी है और उनकी हड्डियां खोखली हैं। 10 प्रतिशत डायबिटिज और 60 प्रतिशत एनेमिक हैं। 98 प्रतिशत विधवाएं रक्तचाप से पीड़ित हैं और 60 प्रतिशत पेट संबंधी गंभीर बीमारियों की चपेट में हैं। वृंदावन धार्मिक नगरी है और मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। वृंदावन का शाब्दिक अर्थ है तुलसी का वन। लेकिन आज इस नगरी की पहचान विधवाओं की नगरी के रूप में हो रही है। यहां आश्रमों में हजारों की तादाद में विधवाएं रहती हैं। यहां के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर का इलाका हो अथवा इस्कॉन मंदिर का इलाका, माथे पर तिलक और गले में कंठी धारण किए कम उम्र व उम्रदराज विधवाएं देखी जा सकती हैं। आमतौर पर माना जाता है कि यहां रह रही विधवाएं कृष्ण भक्त हैं और मोक्ष के लिए आयी हैं। लेकिन एक सच यह भी है कि इनमें से कई ऐसी भी हैं जो स्वयं से यहां नहीं आयी हैं। अधिकांश परित्यक्ताएं हैं जो या तो अकेले होने के कारण या घरवालों के खराब व्यवहार के कारण परेशान होकर यहां आकर बस गयी हैं। ज्यादतर के परिवार में या तो कोई सदस्य नहीं बचा है या उनके परिवार वाले उनकी देखभाल को तैयार नहीं हैं।

दकियानूसी समाज उत्थान में बाधक

समाज के रिश्ते-नातों और दुनिया के रंगों से अलग कर दी गयी ये विधवाएं बदलते वक्त के साथ समाज की मुख्य धारा में लौटना चाहती हैं। इन विधवाओं में कई के मन में विवाह बंधन में बंधने की लालसा भी है। लेकिन समाज की दकियानुसी बेड़ियों के कैद से मुक्त हो पाना इनके लिए पहाड़ लांघने जैसा है। लेकिन वेदों की मानें तो वह एक विधवा को सभी अधिकार देने एवं दूसरा विवाह करने का अधिकार प्रदान करता है। वेदों में कहा गया है-
उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकम गतासुमेपमुप शेष एहि,
हस्त ग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सम्बभूथ।
अर्थात पति की मृत्यु के बाद उसकी विधवा उसकी स्मृति में अपना सारा जीवन व्यतीत कर दे, ऐसा कोई धर्म नहीं कहता। उस स्त्री को पूरा अधिकार है कि वह आगे बढ़कर किसी अन्य पुरुष से विवाह करके अपना जीवन सफल बनाए।

अंग्रेजों ने भी की थी पहल

ऐसा नहीं है कि विधवाओं के जीवन को सुधारने और सम्मान योग्य बनाने की पहल नहीं हुई। 1856 में ब्रिटिश सरकार ने विधवाओं पर होने वाले अत्याचार को रोकने और उनका मानवीय अधिकार वापस दिलाने के लिए हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 पारित किया। यह अधिनियम विधवाओं को पुनर्विवाह की इजाजत देता है। इस अधिनियम में स्पष्ट कहा गया है कि यदि दूसरे विवाह के समय किसी स्त्री के पति की मृत्यु हो चुकी है तो ऐसा विवाह वैध है। इस अधिनियम के मुताबिक ऐसे विवाह से उत्पन सभी संतानें भी वैध मानी जाएगी। ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि भारतीय समाज विधवाओं को उचित सम्मान व आदर दे तथा सरकार भी ऐसे विधवाओं को पुनर्विवाह के लिए प्रेरित करे। विशेषकर वे जो कम आयु की हैं। अच्छी बात यह है कि सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं इस दिशा में सराहनीय पहल कर रही है। इसके बावजूद भी विधवाओं को लेकर समाज का नजरिया दकियानूसी बना हुआ है। आज भी विधवाओं को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मसलन वे क्या करती हैं, कहां जाती हैं और उनके यहां कौन आता-जाता है ऐसे ढ़ेरों सवालों का सामना करना पड़ता है। उनकी गरिमा पर भी सवाल दागा जाता है। यही नहीं सामाजिक-धार्मिक कार्यक्रमों में भी उन्हें शिरकत करने से रोकने की कोशिश होती है। गौर करें तो उनके लिए केवल पति की मृत्यु का शोक ही त्रासदी नहीं होता। बल्कि उन्हें कट्टर रीति रिवाजों के अनुसार जीवन भी गुजारना पड़ता है। यह उचित नहीं है। यह सोच और प्रवृत्ति अमानवीय और मानवता के खिलाफ है।

देश में 5 करोड़ से अधिक विधवायें

एक आंकड़े के मुताबिक देश में 5 करोड़ से भी अधिक विधवाएं हैं। उन्हें परंपरा और रीति-रिवाज की आड़ लेकर अधिकारों से वंचित और बेदखल कर दिया गया है। कुछ साल पहले एक स्वयं सेवी संस्था ने उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल कर विधवाओं की दयनीय हालत सुधारने और उन्हें आवास उपलब्ध कराने की मांग की। सर्वोच्च अदालत ने इस पर गौर फरमाते हुए सरकार को निर्देशित किया कि वह विधवाओं को आवास उपलब्ध कराए और उनके जीवन निर्वाह के लिए निश्चित धनराशि मुकर्रर करे। सर्वोच्च अदालत के इस निर्देश के बाद सरकार ने वृंदावन में एक हजार विधवाओं के रहने के लिए आवास बनवाने का भरोसा दिया और बजट आवंटित किया। यह स्वागत योग्य पहल है। आज जरूरत इस बात की है कि सरकार के साथ-साथ समाज भी विधवाओं के प्रति मानवीय और उदार बने। विधवाओं के जीवन को सुगम बनाने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार के कंधे पर ठेलकर निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता।

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