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विज्ञान और तकनीक / Sci and Tech

प्रिंटिंग-स्याही की गुणवत्ता बढ़ाने की नयी तकनीक विकसित

 

नयी दिल्ली। मुद्रण की प्रक्रिया में नन्हीं बूंदों के टूटने से अवांछित धब्बे, रेजोल्यूशन में ह्रास और पर्यावरण प्रदूषण जैसी समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। सेंटर फॉर नैनो साइंस एंड इंजीनियरिंग, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बैंगलोर के शोधकर्ताओं ने सतह पर गिरने के दौरान बूंदों के टूट जाने की प्रक्रिया से जुड़ा अध्ययन किया है जिसके कारण मुद्रण, स्प्रेइंग और कोटिंग जैसे विभिन्न दैनिक अनुप्रयोगों की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
सुंदर चित्रों और चमकदार पृष्ठ वाली पत्रिकाओं को देखकर हम इस बात का शायद ही अनुमान लगा पाते हैं कि वे मुद्रण-स्याही या पेंट की लाखों छोटी बूंदों से बने हैं। यदि ये बूंदें ठीक से नहीं बनती हैं और सतह से टकराने पर टूट जाती हैं, तो अंतिम उत्पाद की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
शोधकर्ताओं ने सुपर हाइड्रोफोबिक (पानी के लिए प्रतिकारक) सतहों पर पार्टिकल-कोटेड बूंदों और उनके व्यवहार की जांच की। उन्होंने पाया कि बूंदें किसी सतह से टकराने पर टूट कर बिखर सकती हैं, जो छपाई या छिड़काव जैसे अनुप्रयोगों के लिए उपयुक्त नहीं है। यदि नन्हें हाइड्रोफोबिक कणों के साथ बूंदों की कोटिंग कर दी जाय तो उन्हें टूटने से रोका जा सकता है।
‘यह कोटिंग, सतह पर गिरने के दौरान बूंदों के व्यवहार को महत्वपूर्ण रूप से बदल देती है। बूंदों पर कोटिंग उसके सतह पर गिरने के प्रभाव को किस प्रकार बदल सकती है, इसके अध्ययन द्वारा हम छोटी बूंदों को टूटने से रोकने और उससे प्रभावित होने वाले विभिन्न अनुप्रयोगों में सुधार करने के तरीके खोज सकते हैं’, प्रमुख शोधकर्ता डॉ. प्रोसेनजीत सेन बताते हैं।
इस प्रयोग द्वारा टीम ने यह समझने का लक्ष्य रखा था कि टूटने के मामले में कैसे ये विशेष बूंदें नियमित बूंदों की तुलना में भिन्न होती हैं और विभिन्न संभावित अनुप्रयोगों में किस प्रकार उनका लाभ उठाया जा सकता है।
डॉ सेन कहते हैं-हमारे इस अध्ययन के निष्कर्ष सेल्फ क्लीनिंग सतहों, बर्फ-रोधी प्रणालियों और यहां तक कि पौधों में बीमारियों के प्रसार जैसे संदर्भों में भी उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।
अध्ययन के दौरान, सामान्य बूंदों की तुलना में लेपित बूंदों ने सतह पर अधिक बल के साथ टकराने पर भी टूटने में अधिक प्रतिरोध प्रदर्शित किया। टीम ने लेपित बूंदों की सतह पर शीघ्र घटित होने वाली एक विशेष अंतरफलकीय अस्थिरता को भी रेखांकित किया। सामान्य बूंदों के विपरीत, यह अस्थिरता बूंदों पर ऊंगलीनुमा संरचना बना देती है जिससे वे अधिक स्थिर हो जाते हैं और सतह से टकराने पर उनके टूटने की संभावना कम हो जाती है।
‘हमने इस अस्थिरता को कारित करने वाले विभिन्न भौतिक कारकों जैसे कि रिम बॉन्ड नंबर, सतह की विसंगतियाँ, और पार्टिकल्स के जमाव आदि पहलुओं का भी अध्ययन किया जो यह समझाने में मदद करते हैं कि यह अस्थिरता होती क्यों है। यह अस्थिरता एक सुरक्षात्मक तंत्र के रूप में कार्य करती है, जो उच्च वेगों पर भी छोटी बूंदों को टूटने से रोकती है। स्थिर उंगलियों की उपस्थिति, टकराने के बाद पलटने के क्रम में बूंदों के टपककर टूटने की संभावना को कम करती है,” शोधकर्ता बताते हैं।
डॉ. सेन कहते हैं-यह एक अप्रत्याशित घटना है जो सतह पर कोटिंग द्वारा प्रदान की गई उल्लेखनीय स्थिरता को उजागर करती है।
इस अध्ययन के, कोटिंगयुक्त सतहों की गतिशीलता को समझने के महत्व को उजागर करने, जैव-रिएक्टर डिजाइन, डिजिटल माइक्रोफ्लुइड तकनीक, सेल्फ क्लीनिंग तकनीकों और परागयुक्त बूंदों के माध्यम से पौधों में फैलने वाली बीमारी जैसे अनुप्रयोगों के लिए व्यापक निहितार्थ हो सकते हैं। प्रोसेनजीत सेन के अलावा टीम में रुत्विक लठिया और चंदनतारू डे मोदक शामिल थे। अध्ययन के निष्कर्ष जर्नल ऑफ कोलाइड एंड इंटरफेस साइंस में प्रकाशित हुए हैं।

इंडिया साइंस वायर से साभार

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