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Rare case: जब मरीज के गले की नस फट गई

Rare case: जब मरीज के गले की नस फट गई

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के राहुल कुमार जांगड़े के साथ एक ऐसा हादसा हो गया जो दुर्लभ (Rare) है। ऐसा दुर्लभ कि दुनिया में इसके सिर्फ दस केस मिले। हुआ यूं कि 1 दिसंबर की सुबह ब्रश करने वक्त एक हिचकी आई और लगा जैसे गले के दाहिनी ओर भीतर कोई गुब्बारा तेज़ी से फूल रहा हो। कुछ ही मिनटों में गला पूरी तरह सूज गया और दर्द से आंखों के आगे अंधेरा छा गया। मामला छत्तीसगढ़ के रायपुर का है।

Rare case: 6 घंटे सर्जरी

परिजन उसे तत्काल डॉक्टर भीमराव आंबेडकर अस्पताल ले गए। डॉक्टरों ने अनुसार यह किसी चोट या बीमारी के कारण नहीं हुआ था बल्कि एक दुर्लभ घटना थी। इसमें गले में स्थित दिमाग तक रक्त पहुंचाने वाली नस (आर्टरी/ धमनी) अपने आप फट गई थी। इसे स्पॉन्टेनियस कैरोटिड आर्टरी रप्चर कहा जाता है और यह छत्तीसगढ़ में हुआ पहला मामला था। वहां के हार्ट, चेस्ट एवं वैस्कुलर सर्जरी विभाग के डॉक्टरों ने लगभग 6 घंटे की जटिल सर्जरी के बाद उसकी जान बचा ली। BBC की रिपोर्ट के अनुसार इसी विभाग के एचओडी डॉक्टर कृष्णकांत साहू ने बताया कि गर्दन की नस फट जाना एक जानलेवा घटना होती है। अगर इसका इलाज़ न किया जाए तो कुछ ही मिनटों में मौत हो सकती है। ऐसा ज़्यादातर गंभीर एक्सीडेंट वाले मामलों या फिर गले के कैंसर जैसी बीमारियों में होता है। यह बहुत रेयर मामला है कि अपने आप ही बिल्कुल साधारण आदमी के गले की नस फट जाए।

Rare case: खतरा था बड़ा

मेडिकल जांच में सामने आया कि राहुल की दाहिनी कैरोटिड आर्टरी फट चुकी थी। गले में मौजूद दाहिनी और बाईं कैरोटिड आर्टरी ही इंसान के दिल से दिमाग तक ऑक्सीजनयुक्त खून पहुंचाती है। डॉक्टरों के अनुसार ज़्यादातर मामलों में शरीर में कहीं भी कटना या फटना तभी जानलेवा होता है जब इस दौरान दिल से खून पहुंचा रहीं इन आर्टरीज या धमनियों को चोट पहुंचे और इनसे खून बाहर बहने लगे क्योंकि दिल से अन्य हिस्सों तक रक्त ले जा रही इन आर्टरीज़ में काफ़ी ज़्यादा दबाव से रक्त बहता है इसलिए बहुत जल्द बहुत ज़्यादा रक्त शरीर से निकल सकता है। डॉक्टर कृष्णकांत साहू ने बताया कि स्पॉन्टेनियस कैरोटिड आर्टरी का बिना किसी चोट, संक्रमण, कैंसर या पहले से मौजूद बीमारी के इस तरह से फटना रेयर मामला है। राहुल की गर्दन में दाहिनी कैरोटिड आर्टरी के फटने से गर्दन के भीतर तेज़ी से खून भर गया और आर्टरी के इर्द गिर्द खून भरने से एक गुब्बारे जैसी संरचना बन गई जिसे मेडिकल भाषा में स्यूडोएन्यूरिज़्म कहा जाता है।

Rare case: खुद फटी थी आर्टरी

डॉक्टर साहू बताते हैं कि आम भाषा में समझाया जाए तो कैरोटिड आर्टरी में रुकावट आने से स्ट्रोक हो सकता है लेकिन राहुल के केस में समस्या इससे भी ज़्यादा खतरनाक थी। आर्टरी खुद फट चुकी थी। अगर वहां बना खून का छोटा सा थक्का भी दिमाग तक पहुंच जाता तो लकवा मारने की संभावना बहुत ज़्यादा थी। खून के ज़्यादा बड़े थक्के या ज़्यादा मात्रा में थक्के दिमाग तक पहुंचने पर पूरा दिमाग क्षतिग्रस्त हो सकता था या मरीज़ ब्रेन डेड भी हो सकता था। सर्जरी से पहले और उसके दौरान दोनों ही समय आर्टरी के दोबारा फटने का खतरा बना हुआ था। ऐसा होने पर अनियंत्रित रक्तस्राव से कुछ ही मिनटों में मरीज़ की मौत हो सकती थी। राहुल को जब अस्पताल लाया गया तब उसके गर्दन के भीतर इतना खून जमा हो चुका था कि सर्जरी के दौरान आर्टरी को पहचानना भी बेहद मुश्किल था। गर्दन के इस हिस्से में बोलने, हाथ पैर चलाने और दिल की धड़कन नियंत्रित करने वाली कई अहम नसें होती हैं। अगर सर्जरी में ज़रा सी भी चूक होती तो मरीज़ के लिए यह जीवन भर की अपंगता या मौत की वजह भी हो सकती थी। करीब डेढ़ घंटे तो सिर्फ आर्टरी को ढूंढने और उस पर नियंत्रण पाने में लग गए। फटी हुई आर्टरी को ठीक करने के लिए गाय के हृदय की झिल्ली यानी बोवाइन पेरीकार्डियम पैच का इस्तेमाल किया गया। डॉक्टर साहू ने कहा कि राहुल को होश आने के बाद सबसे पहले हमने उनसे बात करके उनकी आवाज जांची। फिर हाथ पैर की हरकत और फिर चेहरे की हरकत जांची ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि खून का कोई थक्का दिमाग तक नहीं पहुंचा है और सर्जरी के दौरान किसी अहम नस को चोट नहीं पहुंची है।

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