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संपादकीय: जारी रहे हेल्थ इंस्योरेंस में कैशलेस इलाज की सुविधा

संपादकीय: जारी रहे हेल्थ इंस्योरेंस में कैशलेस इलाज की सुविधा

अजय वर्मा

गरीब हो या दौलतमंद, हेल्थ संबंधी समस्या आने पर डॉक्टर से लेकर अस्पताल तक दौड़ लगाता है। गरीबों के लिए नीम—हकीम टाइप डॉक्टर और सरकारी अस्पताल उपलब्घ होते हैं तो अमीरों के लिए सुविधासंपन्न प्राइवेट अस्पताल। सेहत बचाने की जद्दोजहद में गरीब और मध्यम वर्ग सारी जमापूंजी तक गंवा देते हैं। खेत—जमीन तक गिरवी रखनी होती है। हालांकि 2014 के बाद केंद्र सरकार ने आयुष्मान योजना चालू की जिसके तहत 5 लाख का मुफ्त इलाज दिया जाने लगा। इसके अलावा सस्ते दर पर दवा उपलब्घ कराने के लिए जनऔषधि केंद्रों के माध्यम से जेनरिक दवा पहुंचाई जाने लगी ताकि उपचार का भार कम हो।
कुछ प्रतिशत अमीरों के लिए बीमारी कोई समस्या ही नहीं रही। डॉक्टर से लेकर टेस्ट, दवा आदि में होने वाले खर्च की उनको चिंता नहीं रहती। उन्हें कर्ज लेने या घर—जमीन बेचने की नौबत भी नहीं आती।
रह जाती है मध्यम वर्ग की बात। सीमित संसाधन की वजह से सेहत मामलों में उनकी परेशानी तब बढ़ जाती है जब उनके परिवार को कोई सदस्य बीमार हो जाता है। जल्द राहत पाने के लिए महंगे अस्पतालों में जाना उनकी मजबूरी हो जाती है क्योंकि उपेक्षा के चलते सार्वजनिक क्षेत्र के अस्पताल अपना भरोसा खो चुके हैं। प्रैक्टिशनर डॉक्टरों से भी उनका वास्ता पड़ता है। ऐसे में हेल्थ इंस्योरेंस जैसे बिजनेस का पदार्पण हुआ। इस वर्ग में आयुष्मान योजना की पात्रता वाले कम ही लोग हैं इसलिए उन्हें उपचार के अचानक बड़े खर्च की पूर्ति के लिए हेल्थ इंस्योरेंस का सहारा मिला। इसमें उन्हें कैशलेस इलाज की सुविधा मिलने लगी। इलाज के बाद कुल खर्च का 15 से 20 फीसद ही जेब से लगाना होता है। इसके लिए उन्हें हर महीने प्रीमियम भरनी होती है। यानी थोड़ा—थोड़ा हर माह जमा करें जो संकट की घड़ी में काम आ सके। इसमें भी इंस्योरेंस बेचने वाली कंपनियों के नित नए निर्देश उन्हें झेलने होते हैं।
हाल ही इसमें एक लोचा तब आया कि जब उन कंपनियों ने कैशलेस इलाज की सुविधा बंद करने की तैयारी की। उन्होंने यह प्रावधान जोड़ा कि आप पहले अपने खर्च पर इलाज करा लो। अस्पताल से बाहर आने पर कंपनी में क्लेम करें और वह छानबीन कर पैसा आपको वापस देगी। इस आधार पर कुछ बड़े अस्पतालों ने यह नोटिस भी निकाल दी कि उपचार इंस्योरेंस कार्ड के भरोसे नहीं होगा।
इसके बाद ही हेल्थ इंस्योरेंस की उपयोगिता को लेकर बहस छिड़ गई। यह मध्य वर्ग के लिए झटका था। यानी पहले पैसा दो, वरना इलाज नहीं होगा। कैशलेस सुविधा स्वास्थ्य बीमा की रीढ़ है।
यह केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है। यह इंसानियत पर हमला है। यह केवल मेडिकल सेक्टर की गड़बड़ी नहीं है। यह जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। सरकार कहती है “आयुष्मान भारत”, “जन आरोग्य योजना”, “सभी को स्वास्थ्य सुविधा” लेकिन सच्चाई यह है कि आज जनता के पास इंश्योरेंस कार्ड है, लेकिन अस्पताल में दाख़िला नहीं मिल रहा। सच्चाई यह है कि जनता का पैसा तो कंपनियों ने खा लिया, लेकिन इलाज के वक्त जनता को ठुकरा दिया जा रहा है। यह तो जनता की सेहत पर हमला है। अगर यह ट्रेंड नहीं रोका गया, अगर अस्पताल और बीमा कंपनियों की यह मनमानी यूं ही चलती रही, तो आने वाले दिनों में बीमा पॉलिसी होते हुए भी लोगों को इलाज नहीं मिलेगा। गरीब तो पहले ही व्यवस्था से हारा हुआ है, अब मध्यमवर्ग भी बर्बादी की कगार पर खड़ा होगा।
ऐसे में सरकार को आदेश जारी करना चाहिए कि देश के किसी भी अस्पताल में कैशलेस इलाज से इनकार नहीं किया जाएगा। जो अस्पताल और बीमा कंपनियां इस नियम का उल्लंघन करे, उनके लाइसेंस रद्द किए जाएं। स्वास्थ्य मंत्रालय को जनता को गारंटी देनी होगी कि बीमा पॉलिसी सिर्फ़ कागज पर नहीं, बल्कि अस्पताल के गेट पर काम करेगी। यह देश के हर उस परिवार की आवाज़ है, जो इलाज के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है। क्या सरकार गरीब और मध्यमवर्ग की ढाल बनेगी या अस्पतालों और इंश्योरेंस कंपनियों की मुनाफाखोरी को समर्थन देगी?
स्वास्थ्य का अधिकार जनता का हक़ है। बीमा का पैसा जनता का है और इलाज का अधिकार जनता से छीना नहीं जा सकता।

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