विश्व जनसंख्या दिवस (11 जुलाई) पर विशेष
दयानिधि
नयी दिल्ली। विश्व जनसंख्या दिवस हर साल 11 जुलाई को मनाया जाता है। यह संयुक्त राष्ट्र की एक पहल है जिसका उद्देश्य दुनिया भर में जनसंख्या वृद्धि की चुनौतियों और अवसरों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। विश्व की जनसंख्या अब 8.2 अरब से अधिक हो गई है। यह दिन सतत विकास, संसाधनों तक समान पहुंच, प्रजनन अधिकारों और लैंगिक समानता के महत्व को सामने लाता है। 11 जुलाई, 1987 को पांच अरब जनसंख्या दिवस के प्रति लोगों की रुचि को देखते हुए, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा 1989 में विश्व जनसंख्या दिवस की शुरुआत की गई थी। दिसंबर 1990 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने जनसंख्या संबंधी मुद्दों और पर्यावरण एवं विकास से उनके संबंधों की समझ को बढ़ावा देने के लिए हर साल विश्व जनसंख्या दिवस मनाने का निर्णय लिया।
पहला विश्व जनसंख्या दिवस 11 जुलाई, 1990 को 90 से अधिक देशों में मनाया गया था। तब से, कई संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) कार्यालय और अन्य समूह इस दिवस को मनाने के लिए सरकारों और समुदायों के साथ मिलकर काम करते हैं। विश्व जनसंख्या संबंधी चिंताओं में गरीबी, मातृ स्वास्थ्य, आर्थिक तंगी और कई अन्य मुद्दे शामिल हैं। चीन और भारत दुनिया के दो सबसे अधिक आबादी वाले देश हैं, जिनकी जनसंख्या एक अरब से अधिक है और दुनिया भर की जनसंख्या का लगभग 18 फीसद है।
दुनिया भर में प्रजनन दर गिर रही है, जिससे ‘जनसंख्या पतन’ की चेतावनियां दी जा रही है। लेकिन यूएनएफपीए की विश्व जनसंख्या स्थिति रिपोर्ट दर्शाती है कि असली समस्या प्रजनन क्षमता की कमी है, बहुत से लोग, खासकर युवा, अपनी मनचाही संख्या में संतान पैदा नहीं कर पा रहे हैं।
विश्व जनसंख्या दिवस 2025 इस चुनौती पर प्रकाश डालता है और युवाओं की अब तक की सबसे बड़ी पीढ़ी पर आधारित है। ‘युवाओं को एक निष्पक्ष और आशावान दुनिया में अपने मनचाहे परिवार बनाने के लिए सशक्त बनाना’ विषय यह सुनिश्चित करने का आह्वान करता है कि युवाओं के पास अपने भविष्य को आकार देने के अधिकार, साधन और अवसर हों। 20वीं सदी के मध्य से दुनिया की आबादी तीन गुना से अधिक बढ़ गई है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, जुलाई 2025 तक पृथ्वी पर 8.2 अरब लोग थे। 2080 के दशक के मध्य तक जनसंख्या 10.4 अरब के शिखर पर पहुंचने का अनुमान है, जो 2050 में 9.7 अरब तक पहुंच जाएगी।
2100 तक 10.9 अरब होगी दुनिया की आबादी
संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक भारत की जनसंख्या 2025 तक 1.46 अरब तक पहुंचने का अनुमान है, जिससे यह दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाले देश के रूप में अपनी स्थिति बनाए रखेगा। रिपोर्ट यह भी बताती है कि देश की कुल प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे गिर गई है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की जून 2025 में जारी 2025 विश्व जनसंख्या स्थिति रिपोर्ट में कहा गया है कि जनसंख्या लगभग 1.7 अरब तक बढ़ने की उम्मीद है, जिसके बाद लगभग 40 सालों में इसमें गिरावट शुरू होगी। चीन की जनसंख्या इस साल 1.41 अरब तक पहुंचने का अनुमान है।
यूएनएफपीए के मुताबिक, भविष्य के बारे में आशंकाएं-जैसे जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण क्षरण, युद्ध और महामारी प्रजनन संबंधी निर्णयों को प्रभावित कर रही हैं, लगभग पांच में से एक व्यक्ति का कहना है कि इन चिंताओं के कारण उन्हें अपनी इच्छा से कम बच्चे पैदा करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। आर्थिक कारक, जिनमें आवास, बच्चों की देखभाल पर खर्च और नौकरी की असुरक्षा शामिल हैं, परिवार के आकार पर प्रमुख सीमाएं हैं। 39 फीसद लोगों ने बताया कि वित्तीय मुद्दे उनकी वांछित संख्या में बच्चे पैदा करने की क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं।
दुनिया भर में गर्भधारण की औसत आयु लगातार बढ़ रही है और अब 28 वर्ष हो गई है। प्रजनन आयु के लगभग 20 फीसद वयस्कों को लगता है कि वे अपनी इच्छित संख्या में बच्चे पैदा नहीं कर पाएंगे। प्रजनन स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच एक चुनौती बनी हुई है, जहां 18 फीसद लोगों को गर्भनिरोधक या प्रजनन संबंधी सेवाएं हासिल करने में कठिनाई हो रही है। भारत की जनसंख्या दुनिया भर के देशों की तुलना में सबसे अधिक है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, भारत की आबादी 142.57 करोड़ है, जिसमें सबसे ज्यादा जनसंख्या हिंदुओं की है और उसके बाद मुसलमानों की है।
संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि हाल के दिनों में प्रजनन दर और जीवन प्रत्याशा में भारी बदलाव देखने को मिले हैं। 1970 के दशक की शुरुआत में, महिलाओं के औसतन 4.5 बच्चे थे, 2015 तक, दुनिया भर में कुल प्रजनन दर प्रति महिला 2.5 बच्चों से कम हो गई थी। इस बीच, औसत वैश्विक जीवन काल 1990 के दशक की शुरुआत में 64.6 वर्ष से बढ़कर 2019 में 72.6 वर्ष हो गया है।
इसके अलावा दुनिया भर में शहरीकरण का स्तर बहुत अधिक है तथा प्रवासन भी तेजी से बढ़ रहा है। 2007 पहला साल था, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों में अधिक लोग दर्ज किए गए थे तथा 2050 तक विश्व की लगभग 66 प्रतिशत जनसंख्या के शहरों में रहने का पूर्वानुमान है।
इन बढ़ते रुझानों के दूरगामी प्रभाव हैं। वे आर्थिक विकास, रोजगार, आय के वितरण, गरीबी और सामाजिक सुरक्षा पर असर डालते हैं। वे स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, आवास, स्वच्छता, पानी, भोजन और ऊर्जा तक सभी की पहुंच सुनिश्चित करने के प्रयासों को भी प्रभावित करते हैं। लोगों की जरूरतों को अधिक स्थायी रूप से हल करने के लिए, नीति निर्माताओं को यह समझना चाहिए कि धरती पर कितने लोग रह रहे हैं, वे कहां हैं, उनकी उम्र कितनी है और उनके बाद कितने लोग आएंगे। “किसी को पीछे न छोड़ें, सभी की गिनती करें” विश्व जनसंख्या दिवस 2024 की थीम थी। वेबसाइट के हवाले से संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा कि “इस वर्ष की थीम मुद्दों को समझने, उनका समाधान करने और प्रगति को आगे बढ़ाने के लिए आंकड़ों के संग्रह में निवेश के महत्व पर प्रकाश डालता है। वित्तीय निवेश भी महत्वपूर्ण है। मैं देशों से आग्रह करता हूं कि वे इस साल भविष्य के शिखर सम्मेलन का लाभ उठाएं ताकि सतत विकास के लिए सस्ती पूंजी को सभी के लिए खोला जा सके।”
क्या आप जानते हैं?
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) के मुताबिक, दुनिया भर में 40 प्रतिशत से अधिक महिलाएं यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य तथा प्रजनन अधिकारों पर निर्णय नहीं ले पाती हैं। कम और मध्यम आय वाले देशों में मात्र चार में से एक महिला ही अपनी वांछित प्रजनन क्षमता हासिल कर पाती है। गर्भावस्था या प्रसव के कारण हर दो मिनट में एक महिला की मृत्यु हो जाती है, जबकि संघर्ष की स्थिति में, मृत्यु की संख्या दोगुनी हो जाती है। लगभग एक तिहाई महिलाओं ने अपने साथी द्वारा हिंसा, गैर-साथी द्वारा यौन हिंसा या दोनों का अनुभव किया है। केवल छह देशों में संसद में 50 प्रतिशत या उससे अधिक महिलाएं हैं। दुनिया भर में 80 करोड़ लोग जो पढ़ नहीं सकते उनमें से दो तिहाई से अधिक महिलाएं हैं।
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