नई दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। टीबी के खिलाफ लड़ाई में WHO ने अपनी नई जांच तकनीकों के लिए गवाही तैयार करने संबंधी विशेष दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इनका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि टीबी की नई जांच मशीनों, नमूनों और जांच की रणनीतियों को उगाहने से पहले उनके फायदे और सीमाओं की अच्छी तरह नदियों की जाए। यह नई गाइडलाइन सहयोगियों, वैज्ञानिकों, जांच तकनीकों को विकसित करने वाली कंपनियां, वित्तीय सहायता देने वाली गतिविधियां और स्वास्थ्य नीति बनाने वालों के लिए उपयोगी साबित होगी। इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि किसी नई जांच तकनीकों को स्वास्थ्य सेवाओं में शामिल करने से पहले किस तरह के वैज्ञानिक प्रमाण जुटाए जाने चाहिए।
पहली बार टीबी जांच पर खास दिशा-निर्देश
दयानिधि की रिपोर्ट के अनुसार WHO की यह गाइडलाइन संगठन की गवाही तैयार करने संबंधी श्रृंखला का तीसरा दस्तावेज है। इससे पहले टीबी के इलाज के नए तरीके और टीबी से बचाव के लिए दिए जाने वाले निवारक उपचार से जुड़े दिशा-निर्देश जारी किए जा चुके हैं। अब पहली बार टीबी की जांच पर विशेष ध्यान दिया गया है। इस पहल का सीधा संबंध पशुओं को सही समय पर बीमारी की पहचान और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने से है। टीबी की जल्द और सटीक पहचान होने से पशुओं का इलाज समय पर शुरू करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, बीमारी के फैलाव को रोकने की कोशिशों को भी बढ़ाना मिल सकता है।
पशुओं को फायदा भी जरूरी
इस गाइडलाइन का एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि किसी जांच तकनीक की सफलता को केवल इस आधार पर नहीं परखा जाना चाहिए कि वह बीमारी की पहचान कितनी विशिष्टताओं से करती है। यह देखना भी जरूरी है कि उस जांच से विद्यार्थियों को वास्तविक जीवन में कितना लाभ मिलता है। इसके लिए प्रतिभागियों को अध्ययन की सही रूपरेखा तैयार करने, उपयुक्त प्रतिभागियों का चयन करने, जरूरी मॉडल आकार तय करने और परिणामों की पूरी जानकारी देने पर ध्यान देना होगा। इसके अलावा जांच की लागत, उसकी उपलब्धता, उपलब्ध संसाधनों में उसे लागू करने की पद्धति और समाज के अलग-अलग व्यक्तियों तक उसकी पहुंच जैसे पहलुओं का भी मूल्यांकन करना होगा। खास बात यह है कि जांच के लाभ उन लोगों तक भी पहुंचना चाहिए, जिन्हें स्वास्थ्य सेवाएं हासिल करने में सबसे ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
पुरानी कमियों को दूर करने की कोशिश
डब्ल्यू नेट के अनुसार टीबी की नई जांच तकनीकों पर पहले किए गए कई विकास में जरूरी जानकारियों की कमी रही है। कुछ शोधों में केवल जांच की पैकेट पर ध्यान दिया गया, जबकि मजदूरी के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर, खर्च और व्यावहारिक उपयोग जैसे पहलुओं को पर्याप्त महत्व नहीं मिला। कई विकास में कमजोर और संवेदनशील विशिष्टताओं के लोगों को शामिल नहीं किया गया। वहीं, कुछ शोधों के नतीजे अधूरे या अलग-अलग तरीकों से पेश किए गए, जिससे उनकी तुलना करना और एक साथ उनका विश्लेषण करना मुश्किल हो गया। नई गाइडलाइन का उद्देश्य इन कमियों को दूर करना है, ताकि वैज्ञानिक शोध के नतीजे स्वास्थ्य सेटिंग्स बनाने में ज्यादा प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किए जा सकें।
जांच से इलाज तक पर नजर
इस दस्तावेज में एक नया आरोप वाला ढांचा भी शामिल किया गया है। इसके माध्यम से यह समझने में मदद मिलेगी कि टीबी की कोई जांच रोगी की देखभाल की पूरी प्रक्रिया में कहां और किस तरह भूमिका निभानी है। इसमें जांच के बाद होने वाले अगले चक्कर और रोगी को मिलने वाले संभावित बोझ पर भी ध्यान दिया जाएगा। डब्ल्यूएचओ के एचआईवी, टीबी, हेपेटाइटिस और यौन संचारित संक्रमण विभाग की निदेशक तेरेजा कासाएवा ने कहा कि मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण प्रभावी नुकसान की बुनियाद हैं। उनके अनुसार, नई गाइडलाइन परीक्षाएं, तकनीक विकसित करने वालों और वित्तीय सहायता देने वाली उल्लिखित को यह स्पष्ट दिशा मिलेगी कि नई टीबी जांच लागू करने के लिए जरूरी प्रमाण कैसे जिम्मेदारियां करें जाएं। टीबी के निदान और दवा प्रतिरोध की पहचान के लिए डब्ल्यूएन एचआईवी के लक्ष्य-आधारित उत्पाद प्रोफाइल के साथ यह नई गाइडलाइन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इससे नई जांच लागू करने के विकास और उनके व्यावहारिक इस्तेमाल के बीच की दूरी कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
