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नहीं होंगी दवाएं महंगी!

जीवन रक्षक दवाइयों की खरीद पर कंपनियों को सीमा शुल्क में मिलने वाली छूट न मिलने के बावजूद दवाइयां महंगी नहीं हो सकेंगी…पढ़ें क्यों?

भारत जैसे विकासशील देश का दवा बाजार धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा है। बीमारों की संख्या बढ़ती जा रही है। प्रत्येक दूसरा-तीसरा भारतीय को किसी न किसी रूप में दवाइयों का उपभोग करना पड़ रहा है। ऐसे में जब यह खबर आती है कि सरकार ने जीवन रक्षक दवाइयों पर से सीमा शुल्क में मिलने वाली छुट को खत्म कर लिया है तो बाजार व आम लोगों में चिंता की लकीर खींचना स्वभाविक है। ऐसा करने से दवा कंपनियों का कॉस्ट ऑफ प्रोडक्शन निश्चित रूप से बढ़ेगा। शायद यहीं कारण है कि मीडिया में इस बात पर पुरजोर चर्चा हो रही है कि जरूरी दवाइयों की कीमतों में अब ईजाफ़ा होकर ही  रहेगा। यह डर स्वाभाविक भी है।
Swasth Bharat Abhiyanडरने से पहले यह जानना जरूरी है कि किसी भी राष्ट्रीय जरूरी दवा सूची में शामिल दवा की कीमत दवा कंपनियाँ अपने मन से नहीं बढ़ा सकती हैं। इसके लिए सरकार ने एक नियामक का गठन किया है जिसका नाम है नेशनल फार्मास्यूटिक्लस प्राइसिंग ऑथोरिटी (एनपीपीए)। एनपीपीए द्वारा मूल्य निर्धारण के बाद ही कोई कंपनी जरूरी सूची की दवा की कीमत तय कर सकती है। ऐसे में यहां पर आमलोगों को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि एक्साइज ड्यूटी का शुल्क हटते ही दवाइयां महंगी हो जायेंगी।
दूसरी तरफ बाजार के जानकारों का यह भी कहना है कि सरकार के इस पहल से एक ओर जहां ‘मेक इन इंडिया’ को बल मिलेगा वहीं भारत दवाइयों के कच्चे उत्पाद के उत्पादन के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर होगा। जिसे भविष्य के लिहाज से बेहतर कहा जा सकता है।

दवा उद्योग पर पैनी नज़र रखने वाले जानकारों की माने तो दवा बाजार में पहले से ही आर्थिक मोर्चे पर बहुत लचीलापन है। इस बावत जाने माने न्यूरो सर्जन व लेखक डॉ. मनीष कुमार का मानना है कि यदि सरकार ‘मेक इन इंडिया’ के कॉन्सेप्ट को बढावा देने के लिए एक्साइज ड्यूटी में दी जाने वाली छूट को हटा रही है तो इसे प्रथमदृष्टया सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है लेकिन ध्यान रहे किसी भी सूरत में दवाइयों कीमत न बढ़ने पाए। उपभोक्ताओं को इसका नुक्सान न उठाना पड़े।

वहीं स्वस्थ भारत अभियान से जुड़ धीप्रज्ञ द्विवेदी का मत है कि जब दवा कंपनियां पहले से ही 1000 प्रतिशत तक मुनाफा कमा रही हैं ऐसे में उन पर देश हित में थोड़ा अधिभार पड़ भी जाए तो क्या बुरा है। धीप्रज्ञ द्विवेदी ने यूपीए सरकार के समय जून 2012 में जारी उस रिपोर्ट का हवाला दे रहे थे जिसमें कहा गया था कि, बड़ी दवा कंपनियां दवाओं को लागत से 1100 फीसदी अधिक कीमत पर बेचकर खुलेआम लूट खसोट मचा रही है। तब कारपोरेट मामलों के मंत्रालय के एक अध्ययन में यह खुलासा हुआ था। मंत्रालय की लागत लेखा शाखा ने अपने अध्ययन में पाया था कि ग्लेक्सोस्मिथलाइन की कालपोल फाईजर की कोरेक्स कफ सीरप, रैनबैक्सी ग्लोबल की रिवाइटल, डॉ. रेड्डी लैब्स की ओमेज, एलेमबिक की एजिथराल और अन्य कंपनियों की दवाओं को उनके लागत मूल्य से अप टू 1123 फीसदी अधिक कीमत पर बेचा जा रहा है। तब कारपोरेट मामलों के मंत्री एम वीरप्पा मोइली ने दवा कंपनियों की इस लूट खसोट को रोकने के लिए रसायन एवं ऊवर्रक मंत्री एम के अलागिरी और स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी अजाद को पत्र भी लिखे थे और इस अध्ययन की प्रतियां इन मंत्रियों को भी थी।
यहां ध्यान देने वाली बात तह भी है कि राष्ट्रीय दवा सूची-2015 में इस समय कुल 376 दवाइयां हैं, जिनमें 30 थिरैपियुटिक समूह कि 799 फार्मुलेशन्स हैं। फार्मा ट्रैक डाटा बेस के अनुसार देश का घरेलु दवा बाजार 2015 में 96000 करोड़ रुपये का है जो कि 2010 में 62000 करोड़ का व 2005 में 32000 करोड़ रुपये का था।
 
 

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